बीते दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मजदूर आंदोलन का समर्थन करने के लिए रासुका एवं अन्य धाराओं में जेल भेजी गयी दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानि एनएसए लगाए जाने को पूरी तरह असंगत पाया और इसके लिए गौतमबुद्धनगर की डीएम मेधा रूपम पर कठोर टिप्पणी करते हुए, उन समेत एनएसए लगाने में शामिल सभी अधिकारियों पर 5 लाख रुपए जुर्माना लगाने का आदेश कर दिया. सनद रहे कि मेधा रूपम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस आदेश के खिलाफ गौतमबुद्धनगर की डीएम मेधा रूपम, उच्चतम न्यायालय आई. उच्चतम न्यायालय में इस मामले की सुनवाई का रोस्टर बदल दिया गया. यह केस न्यायमूर्ति नागरत्ना की बेंच को सुनना था, लेकिन अचानक रोस्टर में बदलाव करते हुए यह केस न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की बेंच को सौंप दिया गया. न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर स्टे लगा दिया.
पहले तो बेंच बदले जाने पर ही कई सवाल खड़े हुए. लेकिन नए खुलासे ने तो न्याय और न्यायालय की निष्पक्षता की अवधारणा पर ही गंभीर संशय उत्पन्न कर दिया है.
पता चल रहा है कि जिन न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की डीएम बेटी मेधा रूपम का केस सुना, उन न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा का बेटा मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में भारत निर्वाचन आयोग का यानि ज्ञानेश कुमार जी के आयोग का वकील है ! जब दो निर्वाचन आयुक्त कह चुके कि निर्वाचन आयोग में उनकी सुनवाई ही नहीं हो रही तो निर्वाचन आयोग को ज्ञानेश कुमार का आयोग कहना कोई अतिशयोक्ति तो नहीं समझी जानी चाहिए !
यह कैसी जुगलबंदी है मीलॉर्ड ! बेटे- बेटी की खातिर न्याय की पालिका में न्याय को परिवारवाद की पालकी में झूला झुला कर गहरी नींद सुला रहे हैं आप !





