Category हिमालयी समाज एवं संस्कृति

‘कंतारा’, ‘बाहुबली’ और ‘हनुमान अंश’ के बीच ‘बाला गोरिया’-(वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी)

अभी एक फिल्म आई है’ ‘हनुमान अंश’। यह फिल्म नीम किरौली बाबा के जीवन और चमत्कारों पर आधारित है। इस फिल्म का कई नामी-गिरामी लोगों ने अपनी तरह से प्रचार किया है। लगभग दो करोड़ की लागत से बनी यह…

गिर्दा को याद करने का आपके लिए क्या मतलब है?-(नवीन जोशी की पोस्ट)

गिर्दा को याद करते हो, खूब याद करते हो। 22 अगस्त को तो अवश्य ही याद करते हो। बहुत अच्छी बात है। लेकिन गिर्दा को इतना याद क्यों करते हो? क्या उस गिर्दा को याद करते हो, जो हाड़-मांस का…

पीरियड्स को लेकर बनी दकियानूसी परम्पराओं ने एक लड़की की जान ले ली!- (शिवानी पाण्डेय की पोस्ट)

इस दौर में जब दुनिया के एक कोने से महिलाओं के चाँद पर पहुँचने की खबरें आ रही है, जब विज्ञान और तकनीक की ऊँचाइयाँ महिलाओं के नाम दर्ज हो रही हैं, तब इसी धरती के एक छोटे से गाँव…

मैंने गिर्दा को कैसे जाना-(इन्द्रेश मैखुरी)

बात 1994 की है. उत्तराखंड आंदोलन पूरे ज़ोर पर था. इसी बीच में उत्तराखंड आंदोलन पर नरेंद्र सिंह नेगी जी का कैसेट आया. आन्दोलन पर 7-8 गीत उसमें थे. उन्हीं में से एक गीत था-ततुक नी लगा उदेख,घुनन मुनई नि…

हम नहीं होंगे, फिर भी हम होंगे जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ के स्मृति दिवस (22 अगस्त, 2010) पर विशेष “ततुक नी लगा उदेख, घुनन मुनई न टेक, जैंता एक दिन तो आलो दिन य दुनि में” -(चारू तिवारी)

उनके गीतों में एक नई सुबह की उम्मीद के साथ निराशा से बाहर निकलने की चेतना है। इतिहास के अनुभवों, वर्तमान के संघर्षों और सुखद भविष्य की परिकल्पना की यह उम्मीद वे कई पीढ़ि़यों में देखते हैं। एक व्यक्ति, समाज…

रं समाज की पहल और एकजुटता स्वागत योग्य है

सवाल तो प्रशासन और सरकार से है कि जिस इलाके में इनर लाइन परमिट के बिना कोई भी नहीं जा सकता, वहां कोई गुजरात का ट्रस्ट, राजस्थान से ट्रक लेकर पहुंच कैसे गया ? ये ट्रस्ट किसका है, किसकी शह…

पहाड़ में अनवरत चलते हैं शराब के खिलाफ आंदोलन, लेकिन सरकार के कानों में जूं भी नहीं रैंगती

उत्तराखंड वह प्रान्त है जहां हर मौसम में किसी न किसी क्षेत्र में शराब के खिलाफ आंदोलन चल ही रहा होता है। यदि 75 वर्षों के इतिहास की ओर पलट कर सरसरी सी नजर भी दौड़ाएं तो उत्तराखंड में शराब…