एक ऐसे समय में जब आज की पत्रकारिता और मुख्य धारा की पूरी मिडिया सत्ता के तलवे चटाने और मोदी जी के गुणगान में मशगूल है और जब पूरा देश भयावह साम्प्रदायिक उन्माद की चपेट में है, तब जनपक्षधर पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष और साम्प्रदायिक दंगे से जूझते हुए शहीद होने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी को जानना बेहद ज़रूरी है। आज की पत्रकारिता को इस आईने में देखना और उससे कार्यभार निकलना भी ज़रूरी है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षशील पत्रकारों में गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम अग्रणी है। आज़ादी की क्रांतिकारी धारा के पैरोकार विद्यार्थी जी अपने धारदार लेखन से तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता से टकराते रहे और कई बार जेल तक भी गये। उनका अख़बार ‘प्रताप’ हिंदी क्षेत्र के किसानों व मज़दूरों के अनवरत संघर्ष का वाहक बन गया था। वे आजीवन धार्मिक कट्टरता और उन्माद के खिलाफ आवाज उठाते रहे। यही धार्मिक उन्माद उनकी जिंदगी लील गया।
26 अक्टूबर 1890 को इलाहाबाद में जन्में गणेश शंकर विद्यार्थी की कर्मस्थली कानपुर बनी। ‘प्रताप’ व‘ प्रभा’ जैसी पत्रिकाएं आज़ादी की मुखर प्रवक्ता थीं। ‘प्रताप’ भारत की आज़ादी की लड़ाई का मुख-पत्र साबित हुआ। भगत सिंह को ‘प्रताप’ से विद्यार्थी जी ने ही जोड़ा था। विद्यार्थी जी ने राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा प्रताप में छापी, क्रान्तिकारियों के विचार व लेख प्रताप में निरन्तर छपते रहते। उनका प्रेस क्रान्तिकारियों के छिपने की जगह था।
विद्यार्थी जी का इलाहाबाद में पत्रकारिता व गंभीर लेखन का सफ़र प्रारंभ हुआ। ‘स्वराज’ अख़बार से उर्दू में लिखना शुरू किया। जबकि पंडित सुंदरलाल के सानिध्य में वह हिंदी की ओर आकृष्ट हुए।
एक लेखक और पत्रकार के रूप में उनकी वास्तविक शुरुआत 2 नवंबर 1911 से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ पत्रिका से हुई। द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ के सानिध्य में उन्हें अपने साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्कारों को विकसित करने का अवसर मिला तो मदन मोहन मालवीय के अखबार ‘अभ्युदय’ के ज़रिये अपने राजनीतिक विचारों को आकार दिया। लेकिन ‘अभ्युदय’ में काम करते हुए साल भर भी नहीं हुआ था कि 23 सितंबर 1913 को अचानक उनका स्वास्थ्य ख़राब हो गया और उन्हें कानपुर जाना पड़ा। यहीं पर अन्य मित्रों के साथ ‘प्रताप’ की योजना बनी और 9 नवंबर 1913 को ‘प्रताप’ की नींव पड़ी। यह काम शिव नारायण मिश्र, गणेश शंकर विद्यार्थी, नारायण प्रसाद अरोड़ा और कोरोनेशन प्रेस के मालिक यशोदा नंदन ने मिलकर किया था।
विद्यार्थी जी ने लेखन को सामाजिक कर्म बनाया, उसे संवाद का माध्यम बनाया। पत्रकारिता के ज़रिये ऐसा सृजन किया कि पत्र-पत्रिकाएं आज़ादी के आंदोलन में कारगर हथियार बनीं। विद्यार्थी जी पत्रकारिता के निशाने पर ब्रिटिश शासन की गुलामी थी तो देसी सामंतों व् पूँजीपातियो के ज़ुल्म भी थे। वे धार्मिक कट्टरता व साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ भी संघर्षरत रहा। उनका दफ़्तर क्रांतिकारियों की शरणस्थली था तो युवाओं के लिए पत्रकारिता का प्रशिक्षण केंद्र भी। सत्याग्रह, जुलूस और सभाओं से लेकर दलीय चुनावी राजनीति में नेतृत्व संभाला, पर अपनी पत्रकारिता को दलीय राजनीति का मोहरा कभी नहीं बनने दिया।
क्रांतिकारी एवं मुखर राजनीतिक विचारों को लेकर ‘प्रताप’ हिन्दी प्रदेश का ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत का प्रमुख अखबार बना। उसका राजनीतिक स्वर क्रांतिकारी था, लेकिन इसके साथ कांग्रेस की नीतियों का भी पक्षधर था। अपनी इस पत्रकारिता के कारण उस पर छापे, जमानत, जब्ती, चेतावनी, धमकी एवं संचालकों को कारावास तक झेलना पड़ा। इन परिस्थितियों में भी विद्यार्थी जी आजादी की मशाल लिए पत्रकारिता के युद्ध क्षेत्र में डटे रहे।
विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता के खिलाफ सतत संघर्षरत रहे। भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव की शहादत के बाद जनभवनाओं को मोड़ने के लिए अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक ताक़तों से मिलकर कानपुर को हिन्दू-मुस्लिम दंगे की आग में झोंक दिया। इसी दंगे में निसहायों को बचाते हुए 25 मार्च 1931 में वे शहीद हो गये। देश और समाज के प्रति यह उनकी निर्भीक प्रतिबद्धता ही थी, जिसके चलते वह दिन-रात घूमकर कानपुर में भड़के साम्प्रदायिक दंगे की आग को बुझाने की कोशिश करते साम्प्रदायिक उन्मादी भीड़ के हाथों मारे गए। दंगों की भेंट चढ़ने वाले वह संभवतः पहले पत्रकार थे।






