नैनीताल शहर में प्राकृतिक सौंदर्य ही नहीं, अपितु उत्तराखंड की सामाजिक-सांस्कृतिक व बौद्विक चेतना, जनसंघर्षों और वैचारिक आंदोलनों की अनेक स्मृतियां भी बसी हैं। यह शहर साहित्य, रंगमंच, पत्रकारिता और जनपक्षधर विचारों के आदान-प्रदान का भी महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। यहां से उठने वाले स्वर पहाड़ के दूर दराज के गांवों तक पहुंचते रहे और उन गांवों के सवाल यहां की बौद्धिक चर्चाओं का हिस्सा भी बनते रहे ।
पिछले दिनों 24 से 26 अक्टूबर 2026 तक आयोजित ‘सफरनामा 25-50-75’ ने इसी पुराने नैनीताल से संवाद करते हुए वर्तमान उत्तराखंड के सामने खड़े सवालों को नए सिरे से समझने का अवसर दिया।
यह आयोजन कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों का साझा उत्सव था। हिमालयविद और घुमक्कड़ प्रो. शेखर पाठक पचहत्तर वर्ष की आयु पार कर चुके हैं। नैनीताल समाचार के संपादक और जनआंदोलनों से जुड़े राजीव लोचन साह अपने जीवन के पचहत्तरवें वर्ष में हैं। महिला स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए निरंतर संघर्षशील प्रो. उमा भट्ट भी पचहत्तरवें वर्ष में प्रवेश की तरफ हैं।
यही नहीं शहर नैनीताल में जनसरोकारों को पत्रकारिता का आधार बनाने वाली पाक्षिक पत्र नैनीताल समाचार के निरंतर प्रकाशन के पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं. वहीं शहर की प्रतिष्ठित नाट्य संस्था युगमंच ने रंगकर्म के पचास वर्ष पूरे किए हैं। इन सबके मध्य उत्तराखंड राज्य गठन के पच्चीस वर्ष भी इसी पृष्ठभूमि में उपस्थित हैं। इन पड़ावों ने मिलकर स्मृतियों, अनुभवों और भविष्य की चुनौतियों पर विचार करने का एक सार्थक मंच तैयार किया।
नैनीताल समाचार और पहाड़ जैसी पत्रिकाओं ने उत्तराखंड की जनपक्षधर पत्रकारिता तथा शोधपरक लेखन की परंपरा को समृद्ध किया है। नैनीताल समाचार ने पर्वतीय समाज के उन सवालों को लगातार उठाया, जिन्हें मुख्यधारा की पत्रकारिता अक्सर हाशिये पर छोड़ देती थी। गांवों की समस्याएं, वनाधिकार, विस्थापन, पलायन, रोजगार, शिक्षा और जनआंदोलनों की खबरें इसके लिए महज समाचार नहीं, बल्कि समाज के प्रति प्रतिबद्धता का विषय थीं। वहीं, पहाड़ पत्रिका ने इतिहास, समाज, पर्यावरण, संस्कृति और लोकजीवन को शोधपरक दृष्टि से समझने की परंपरा विकसित की। इन प्रयासों ने पहाड़ को केवल प्राकृतिक सौंदर्य के रूप में देखने के बजाय एक जीवंत समाज, उसकी जटिलताओं और आकांक्षाओं के साथ समझने की दृष्टि दी।
युगमंच की दीर्घ रंगयात्रा भी इसी सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण अध्याय है। रंगमंच ने मनोरंजन से आगे बढ़कर समाज के अंतर्विरोधों, मानवीय संवेदनाओं और राजनीतिक प्रश्नों को अभिव्यक्ति दी।
चिपको, नशा नहीं रोजगार दो, उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति आंदोलन जैसे जनआंदोलनों के दौर में नैनीताल शहर संवाद, प्रतिरोध और वैकल्पिक विचारों का साक्षी बना। इन आंदोलनों ने लोगों को अपने अधिकारों के प्रति सजग किया और यह भरोसा पैदा किया कि संगठित जनभागीदारी से व्यवस्था को चुनौती दी जा सकती है। ‘सफरनामा’ में इन सभी अनुभवों को याद करना अतीत का गुणगान भर नहीं था, बल्कि यह जानने का प्रयास भी था कि उन संघर्षों से आज क्या सीखा जा सकता है।
चर्चाओं में पिछली सदी के जनआंदोलनों की उपलब्धियों, सीमाओं, गलतियों और अधूरे रह गए उद्देश्यों पर विचार हुआ। उत्तराखंड राज्य आंदोलन की स्मृतियों के साथ राज्य गठन के बाद की परिस्थितियों का आकलन भी स्वाभाविक था। जिस राज्य की कल्पना जनता ने अपने संसाधनों, अधिकारों, सम्मान और बेहतर भविष्य के लिए की थी, उसके सामने आज भी पलायन, बेरोजगारी, असमान विकास, पर्यावरणीय संकट और जनभागीदारी के सवाल सामने खड़े हैं।
बातचीत में पर्यटन के नाम पर पहाड़ों में बढ़ती पर्यावरणीय चुनौतियां, धर्म व जातिगत हिंसा, दलित विमर्श, खनन, सड़क, रेल, व तीव्र विकास के नाम पर हिमालय के संवेदनशील पर्यावरण पर बढ़ते दबाव और प्रतिरोध के सामूहिक स्वरों दबाने के प्रयास जैसे गंभीर चिंता के बिन्दु भी प्रमुखता से उभर कर आये । सामाजिक समरसता व सौहार्द के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने जैसे विषयों के अहम सवाल इस विमर्श में प्रमुखता से छाये रहे।
निश्चय ही दो दिनों की यह बातचीत, पुराने साथियों का मिलना, दशकों पुरानी स्मृतियों का साझा होना, संघर्षों के गीत गाना और अनुभवों को नई पीढ़ी के सामने रखना अपने आप में महत्वपूर्ण रहा।





