2004 से 2014 के बीच दस सालों तक कांग्रेस की गठबंधन सरकार थी। इन दस सालों का आँकड़ा देखें तो डीजल, पेट्रोल, दूध का दाम लगभग दोगुना हो गए थे। जहाँ 2004 में डीजल 24.16 रूपये, पेट्रोल 36.81 रूपये प्रतिलीटर, दूध 16 रूपये प्रति किलोग्राम था वहीं सन् 2014 में डीजल 57 रूपये, पेट्रोल 71 रूपये प्रतिलीटर, दूध 32 रूपये प्रति लीटर हो गया।
2014 से 2025 तक भाजपा गठबंधन की सरकार में डीजल 57 रूपये से बढ़कर तकरीबन 100 रूपये हो गया, पेट्रोल 71 रूपये से बढ़कर 102 रूपये प्रतिलीटर हो गया, दूध 25 रूपये से बढ़कर 70 रूपये प्रति लीटर, रसोई गैस 414 से बढ़ कर 1000 रूपये हो गयी। इस तरह देखा जाए तो भाजपा की गठबंधन सरकार ने दस साल में चीजों के दाम डेवढ़ा या दोगुना कर दिया है। रफ्तार यही रही तो रसोई गैस का दाम तो तिगुना से भी ज्यादा हो जायेगा।
19 मार्च 1998 से 1 जून 2004 तक अटल विहारी वाजपेयी की सरकार थी। कुछ लोग कहते हैं अटल जी की सरकार बहुत बढ़िया थी, मगर आँकड़े तो भयावह हैं- 1997 में डीजल 10.25 रूपये प्रतिलीटर था और जून 2004 तक बढ़कर 22.74 रूपये हो गया। 1998 में जो पेट्रोल 23.94 रूपये प्रति लीटर था वो जून 2004 तक बढ़कर 35.71 रूपये प्रतिलीटर हो गया। रसोई गैस का दाम 1998 में लगभग 146 रूपये था जो 2004 में बढ़कर 261.60 रूपये हो गया। महज 6 साल में जिस अनुपात में भयानक मँहगाई बढ़ी, अगर अटल जी चार साल और प्रधानमंत्री रहे होते तो मँहगाई दो गुना हो गयी होती।
बीते 76 साल के आँकड़ों पर गौर करें तो औसतन हर आठ-दस साल बीतते-बीतते डीजल, पेट्रोल, गैस जैसी बुनियादी चीजों के दाम दोगुना होते रहे हैं, इस दौरान, चाहे भाजपा की सरकार रही हो या काँग्रेस की या जनता पार्टी अथवा जनता दल की, सभी सरकारों ने मँहगाई बढ़ाया है। किसी भी नयी सरकार ने अपने पूर्ववर्ती सरकार द्वारा बढ़ायी गयी मँहगाई को वापस नहीं लिया। डीजल पेट्रोल का दाम बढ़ने से सभी चीजों के दाम बढ़ते रहे हैं।
बीते 76 साल में सिर्फ मँहगाई ही नहीं बेरोजगारी और भ्रष्टाचार में भी बढ़ोत्तरी होती रही है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि सरकार भाजपा की है या काँग्रेस की। आज भाजपा कह रही है कि ‘भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार नहीं है। मगर आम जनता जान रही है कि हर विभाग में घूसखोरी बढ़ी है, फाइलों को खिसकाने का रेट बीते आठ साल में लगभग दस से बीस गुना हो चुका है। कांग्रेस सरकार में संवैधानिक संस्थायें सुरक्षित थी, भाजपा शासन में इन संवैधानिक संस्थाओं का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है। वर्तमान सरकार सार्वजनिक उपक्रमों को बेचती जा रही है जिससे बेरोजगारी में बेतहाशा वृद्धि हो रही है।
मंहगाई के साथ-साथ मूल्य सूचकांक के आधार पर कर्मचारियों का मंहगाई भत्ता तो निरंतर बढ़ता जाता है। सांसदों, विधायकों एवं मंत्रियों के भत्तों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। इस कमरतोड़ मंहगाई में आम आदमी कैसे जीवन यापन कर रहा है, इस बारे में किसी भी सरकार ने सोचने की आवश्यकता ही नहीं समझी।





