(उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव तक हिमालय के स्वर अपने पाठकों के लिए चुनाव वोट, जनतंत्र, राजनीतिक दल, चुनाव विषय पर जन पक्ष में कुछ ना आंखर परोसता रहेगा)।
संसदीय लोकतंत्र में पार्टियों को अपने अस्तित्व के लिए पूंजीपतियों पर निर्भर रहना होता है, उनको पैसे पूंजीपति देता है और पूंजीपतियों का मीडिया ही उनका प्रचार करता है। ऐसे में अगर कोई दल यह दावा करता है कि वह आम जनता के लिए कुछ अच्छा करेगा तो वह लोगों को बेवक़ूफ़ बना रहा है और लोग बेवक़ूफ़ बन रहे हैं।
पूंजीवादी विकास के केंद्र में पूँजीपतियों का विकास होता है। बुनियादी ढांचे मूलतः उसके लिए ही विकसित किये जाते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में आम जनता का भी बाईडिफ़ॉल्ट लाभ होता रहता है। यहाँ फिर एक बात गौर करने की है कि आम आदमी की समृद्धि फिर बैंकों के ज़रिए पूंजीपतियों के लाभ में ही इस्तेमाल होती है। कुछ वापस बैंकों में आ जाता तो कुछ और अधिकांश रकम एन पी ए हो जाती है तो कुछ खास पूंजीपति मित्रों का ऋण सरकार माफ़ कर देती है। इन बारह सालों में पूंजीपतियों का ऋण रिकार्ड 16 लाख करोड़ माफ किया गया।
जब तक पूंजीपतियों के विकास के साथ आम जनता का भी थोड़ा बहुत भला होता रहता है तब तक सब ठीक लगता है, लेकिन जब व्यवस्था पूंजीपतियों के लाभ के साथ आम लोगों का हित करने लायक नहीं रह जाती तब संकट पैदा होता है।
ऐसे में जनता को गैरज़रूरी मुद्दों पर लड़वाया जाता है और पूंजीपतियों को लूटने की छूट दी जाती है। आज देश इन्हीं हालात से गुज़र रहा है। संसदीय लोकतंत्र में कोई भी दल सत्ता में रहे उसके हाथ में इससे इतर करने के लिए कुछ नहीं है। इसलिए कांग्रेस को मत कोसिए कि वह सो रही है, आज जो कुछ हो रहा है उसमें उनकी सहमति है। यही नहीं, अगर उनके पास या किसी भी संसदीय दल के पास कोई विकल्प या प्रोग्राम होता तो वह अब तक आपसे साझा कर चुके होते।
तो करें क्या, एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण जिसका आधार मुट्ठी भर लोगों का मुनाफ़ा नहीं व्यापक जनता की ज़रूरत हो। होगा कैसे, पहले तो इस पर सोचिये, फिर चर्चा कीजिये, आगे का रास्ता यहीं से निकलेगा।





