पिथौरागढ़, बेलपट्टी क्षेत्र में 16 एवं 17 अक्टूबर को आयोजित दो दिवसीय श्री सिद्धनाथ देवता महोत्सव के अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता एवं उत्तराखण्ड एकता मंच, दिल्ली के प्रतिनिधि श्री डी. एस. सुगड़ा ने उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं, बढ़ते पलायन तथा स्थानीय समुदायों के संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया।
उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित करते हुए उत्तराखण्ड के लिए अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा एवं संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत संरक्षण की आवश्यकता और संभावित लाभों पर विस्तार से अपने विचार रखे।
जल, जंगल, जमीन और स्थानीय रोजगार पर अधिकार जरूरी
श्री सुगड़ा ने कहा कि उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों की संस्कृति, परंपराएँ, प्राकृतिक संसाधन और सामाजिक पहचान विशिष्ट हैं। इनके संरक्षण के लिए प्रभावी संवैधानिक एवं कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने से पात्र समुदायों को शिक्षा एवं सरकारी नौकरियों में आरक्षण सहित विभिन्न संवैधानिक सुविधाओं का लाभ मिल सकता है। वहीं, पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों के हितों, भूमि और संसाधनों के संरक्षण के लिए विशेष प्रशासनिक एवं कानूनी प्रावधान उपलब्ध हैं।
उन्होंने जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समुदायों के अधिकार, सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, स्थानीय रोजगार, महिलाओं की सुरक्षा और युवाओं के भविष्य को इस मांग के प्रमुख उद्देश्य बताया।
पहाड़ों के संसाधनों का दोहन, लेकिन स्थानीय लोगों को अपेक्षित लाभ नहीं
श्री सुगड़ा ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन हो रहा है, लेकिन स्थानीय निवासियों को रोजगार और आर्थिक विकास का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
उन्होंने कहा, “हमारे पहाड़ों से संसाधन तो लिए जा रहे हैं, लेकिन बदले में स्थानीय लोगों को रोजगार, समृद्धि और सुरक्षा के बजाय अनेक स्थानों पर पर्यावरणीय संकट, आपदाओं और विस्थापन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।”
पलायन से खाली होते गाँव और घटता प्रतिनिधित्व गंभीर चिंता
पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन को गंभीर समस्या बताते हुए श्री सुगड़ा ने कहा कि रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और बुनियादी अवसरों के अभाव में गाँवों की आबादी घट रही है तथा अनेक गाँव खाली हो रहे हैं।
उन्होंने आशंका व्यक्त की कि जनसंख्या में लगातार गिरावट का असर जनसंख्या-आधारित सरकारी योजनाओं, संसाधन आवंटन तथा भविष्य की परिसीमन प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।
“यदि समय रहते पहाड़ों से पलायन रोकने और स्थानीय रोजगार बढ़ाने के ठोस प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में पर्वतीय क्षेत्रों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कमजोर होने की आशंका है।”
उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक कठिनाइयों, सीमावर्ती स्थिति और कम जनसंख्या घनत्व को ध्यान में रखते हुए विकास योजनाओं तथा संसाधन आवंटन के लिए विशेष नीति बनाई जानी चाहिए।
जनजातीय क्षेत्रों की विशेष योजनाओं और उनके प्रभाव की जानकारी दी
अपने संबोधन में श्री सुगड़ा ने अनुसूचित जनजातियों तथा अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्रों के लिए उपलब्ध विभिन्न सरकारी योजनाओं, शैक्षणिक सुविधाओं, आजीविका कार्यक्रमों और संवैधानिक संरक्षण की व्यवस्था पर भी चर्चा की।
उन्होंने कहा कि जिन राज्यों और क्षेत्रों में ऐसे प्रावधान लागू हैं, वहाँ इनके क्रियान्वयन, स्थानीय रोजगार, आजीविका और समुदायों की आय पर पड़े प्रभाव का अध्ययन किया जाना चाहिए, ताकि उत्तराखण्ड के लिए तथ्यपरक और प्रभावी मांग प्रस्तुत की जा सके।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तराखण्ड एकता मंच, दिल्ली का उद्देश्य समाज को संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना, पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाना तथा जनसहभागिता के माध्यम से उनके समाधान के लिए प्रयास करना है।
संस्कृति और सामाजिक एकता के संरक्षण का भी दिया संदेश
श्री सुगड़ा ने श्री सिद्धनाथ देवता महोत्सव को क्षेत्र की धार्मिक आस्था, लोकसंस्कृति और सामाजिक एकता का महत्वपूर्ण प्रतीक बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और स्थानीय प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करते हैं।
उन्होंने महोत्सव के सफल आयोजन के लिए मेला समिति, कलाकारों, विद्यार्थियों, शिक्षकगणों, जनप्रतिनिधियों, स्वयंसेवकों और समस्त क्षेत्रवासियों का आभार व्यक्त किया।



