देश की आर्थिक स्थिति कमजोर एवं भाजपा की मजबूत हुई है-( मदन मोहन बिजल्वाण)

वर्तमान समय में स्थिति यह है कि देश की अर्थव्यवस्था भले ही रसातल में जा रही हो किंतु इन बारह वर्षों में भाजपा की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हुई है, उसने पूरे देश में चार सौ से अधिक आलीशान कार्यालय बनाये हैं और इलक्ट्रोनिक वांड व अन्य माध्यमों से खरबों रुपये कमाये हैं। आर्थिक विशेषज्ञ बता रहे हैं कि भारत में सर्विस सेक्टर फैलने की जगह सिकुड़ने के खतरे से दो चार है और आर्थिक मंदी की आशंकाओं के मद्देनजर बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियां छूटने वाली हैं।

मौजूदा समय में देश के सर्विस सेक्टर का हाल बुरा है। जब सर्विस सेक्टर फैलने की जगह सिकुड़ने के खतरे से जूझ रहा हो और नौकरियां खत्म होने की आशंका से बाजार आक्रांत हो तो नए रोजगारों के सृजन की बात ही क्या करनी। रिपोर्ट्स बताते हैं कि भारत में गुणवत्ता हीन शिक्षा लेकर डिग्रीधारियों की जो फौज अकुशल मजदूर की शक्ल में रोजगार के बाजार में आ रही है वह रोजगार प्रदाताओं के किसी काम की साबित नहीं हो रही है, सिवाय बोझा ढोने और एक डंडा लेकर सिक्युरिटी गार्ड बनने के। कंपनियों का रोना है कि जो थोड़े बहुत रोजगार हैं भी, उनके लायक लोग उन्हें नहीं मिल पा रहे।

2014 में चुनाव जीतने के बाद भाजपा सरकार की देश भर में “कौशल विकास केंद्रों” को स्थापित कर युवाओं को बड़े पैमाने पर कौशल युक्त बनाने की योजना असफल होकर जमीन सूंघ रही है। आजकल मोदी जी स्वयं या उनके कोई सिपहसालार किसी भी राजनीतिक रैली में कौशल विकास केंद्रों की बातें करते सुनाई नहीं देते। वे तो रोजगार की बातें भी नहीं करते, यहां तक कि अपने भाषणों में ‘रोजगार’ शब्द का उच्चारण करने से भी बचते हैं। बोलने के लिये शब्दों की कमी थोड़े ही है। एक से एक शब्द हैं जिनके सतत उच्चारण से तालियां भी मिलती हैं, जयजयकार भी मिलता है। जैसे…राष्ट्र, पाकिस्तान, घुस कर मारा, औकात बता दिया, जय श्रीराम, वंदे मातरम, हिंदुत्व, मां भारती, तीन सौ सत्तर आदि।

अर्थशास्त्रियों का कहना था कि भारत के बाजार को अगर उत्पादन, क्रय शक्ति और रोजगार का सामंजस्य बिठाना है तो देश में औसतन दो करोड़ नौकरियां प्रतिवर्ष सृजित करनी होंगी। अर्थशास्त्रियों के इसी कथन को भारतीय जनता पार्टी के थिंक टैंक ने लपक लिया और नरेंद्र मोदी अपने पहले राष्ट्रीय चुनावी अभियान में दो करोड़ नौकरियां प्रतिवर्ष देने का वादा करते देश भर में घूमने लगे। इन वादों का जो कारुणिक हश्र हुआ उसने भारतीय अर्थव्यवस्था को उम्मीदों के उजाले से नाउम्मीदी के अंधेरों की ओर धकेलने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई।

देश आर्थिक रूप से कमजोर होता गया जबकि भारतीय जनता पार्टी आर्थिक रूप से मजबूत होती गई। रिपोर्ट्स बताने लगे कि राजनीतिक फंडिंग, थोड़े साफ शब्दों में कहें तो कारपोरेट की राजनीतिक फंडिंग का अधिकतम हिस्सा भाजपा की झोली में जाता रहा और सितम यह… कि देश के लोग यह सवाल भी नहीं पूछ सकते कि किस कारपोरेट घराने ने किस राजनीतिक पार्टी को कितना फंड दिया।
यह भी प्रायः रहस्य ही रह जाता है कि सरकार द्वारा किसी सार्वजनिक संपत्ति की बिक्री और किसी खास कारपोरेट घराने द्वारा उसकी खरीद के दौरान जिस प्रक्रिया को अपनाया जाता है वह कितनी स्वस्थ या अस्वस्थ है।

देश की आर्थिक बुनियाद कमजोर हो रही है, ऊपर के कुछ प्रतिशत लोगों को छोड़ बाकी तमाम देश वासियों की आर्थिक सेहत गिरती जा रही है लेकिन भाजपा की राजनीतिक बुनियाद आज भी इतनी मजबूत है कि कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर ही इसे आगामी आम चुनाव में सत्ता से बाहर कर सकता है।

भाजपा के पथ प्रदर्शक, प्रेरक मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मूलतः अपने विशिष्ट सांस्कृतिक चिंतन के लिए जाना जाता है। करोड़ों निर्धन देशवासियों की आर्थिक मुक्ति के संबंध में इसका जो ढीला- ढाला सा आर्थिक चिंतन है वह समय की शिला पर व्यावहारिक और प्रभावी साबित नहीं हो सका।

तभी तो संघ के दुलारे कहे जाने वाले गडकरी ने अभी पिछले दिनों कहा, “देश की जो भी आर्थिक वृद्धि हो रही हो लेकिन आम लोग और गरीब ही होते जा रहे हैं।” यही नहीं, संघ के बड़े ओहदेदार दत्तात्रेय होसबोले साहब ने भी हाल में ही कहा, “देश में बढ़ती आर्थिक असमानता चिंताजनक है।”
तो…गडकरी और होसबोले की बातों के मर्म को समझें तो समझ बनती है कि देश के आर्थिक विकास के अधिकतम लाभ ऊपर के ही कुछ लोगों की जेब में जाते रहे हैं।

नई सदी में दुनिया के बहुत सारे देशों में “नेशन फर्स्ट” टाइप की राष्ट्रवादी नारेबाजी करती पार्टियों का बोलबाला बढ़ा है। यूरोप के आधे दर्जन से अधिक देश इस राजनीतिक फेनोमिना से रूबरू हैं। फिलीपींस, ब्राजील आदि तो इस टाइप के बुखार से इतने ग्रस्त कर दिए गए कि वहां वैचारिक विरोध का कोई स्पेस नहीं रहने देने की तानाशाही पर नेता लोग उतर गए लेकिन, एक भी राजनीतिक दल, एक भी नेता इस नारेबाजी के साथ अपने देश का आर्थिक उद्धार नहीं कर सका। नतीजा, आज पूरी दुनिया आर्थिक आशंकाओं से ग्रस्त है।

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