अब ऐसे हिम्मत वाले जज नजर नहीं आते हैं-(मदन मोहन बिजल्वाण)

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने राज नारायण बनाम इंदिरा गांधी,( 1971 के रायबरेली लोकसभा चुनाव) में चुनावी भ्रष्ट आचरण माना। यशपाल कपूर की सरकारी सेवा के दौरान सहायता लेना, यशपाल कपूर प्रधानमंत्री के सचिवालय में राजपत्रित अधिकारी थे। उन्होंने 13 जनवरी 1971 को इस्तीफा दिया था, लेकिन उसका प्रभावी होना उस समय कानूनी रूप से विवादित था। हाईकोर्ट ने माना कि सरकारी सेवा में रहते हुए उन्होंने इंदिरा गांधी के चुनाव अभियान में उनकी मदद की और इंदिरा गांधी ने उनकी सहायता प्राप्त की।

इसे Representation of the People Act, 1951 की धारा 123(7) के तहत corrupt practice माना गया। हाईकोर्ट ने पाया कि रायबरेली के जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, PWD के अधिशासी अभियंता, हाइडिल के आदि की सहायता से चुनावी सभाओं के लिए रोस्ट्रम/मंच बनवाए गए, लाउडस्पीकर के लिए बिजली की व्यवस्था की गई,पुलिस/बैरिकेड आदि की व्यवस्था चुनावी कार्यक्रमों के संदर्भ में की गई।

अदालत ने इसे सरकारी अधिकारियों की सहायता लेकर चुनावी prospects बढ़ाने का मामला माना—फिर से Section 123(7) के तहत इन दो सिद्ध आरोपों के आधार पर उनका 1971 का चुनाव अवैध घोषित किया गया और उस समय के कानून के अनुसार छह वर्ष के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्यता लगाई गई।

क्या, किसी भी कोर्ट में आज वर्तमान सत्ताधीश के खिलाफ ऐसा निर्णय पारित करने की हिम्मत हैं?

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