मीरजाफर, जगतसेठ, अमीरचन्द्र और नन्दगोपाल जैसे गद्दार अंग्रेजों से मिल गये थे इस कारण भारत 190 वर्षों तक अंग्रेजों का गुलाम बना रहा -(मदन मोहन बिजल्वाण)

23 जून 1757 को सामन्ती शासक वर्गों की फूट गद्दारी और 20 लाख रूपये की रिश्वतखोरी के कारण लार्डक्लाइव की 500 बन्दूक धारी सेना से प्लासी के मैदान में बिना युद्ध किये आधे घंटे में हार गयी और भारत की 18 हजार सेना खड़ी की खड़ी रह गयी। क्योंकि सेनापति मीरजाफर, जगतसेठ, अमीरचन्द्र और नन्दगोपाल जैसे गद्दार अंग्रेजों से मिल गये थे इस कारण भारत 190 वर्षों तक अंग्रेजों का गुलाम बना रहा।
हम भारतवासियों के दो प्रमुख राष्ट्रीय पर्व है। एक 15 अगस्त 1947 जिसे स्वतन्त्रता दिवस कहा जाता है, यह असल में सत्ता हस्तान्तरण दिवस के साथ-साथ भारत का विभाजन दिवस भी है। दूसरा 26 जनवरी

1950 जिसे गणतंत्र दिवस कहा जाता है। यह वास्तव में संविधान दिवस है।
1857 भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 15 अगस्त 1947 तक भारत की जनता ने अभूतपूर्व शहादत के साथ संघर्ष किया था। क्रान्तिकारियों ने बलिदान और कुर्बानी की परम्परा कायम की। हजारों लोग फांसी के फन्दे पर पर चढ़ गये थे। लाखों गोलियों से भून दिये गये थे। करोड़ों लोग बार-बार जन आन्दोलनों के दौरान जेल गये, यातनायें सही तब जाकर 15 अगस्त 1947 के दिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद हारकर भारत छोड़ने के लिए बाध्य हुआ था।

भारत के विभाजन का प्रस्ताव-10 जुलाई 1947 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने पारित किया था। पंडित नेहरू द्वारा लिखित, सरदार पटेल द्वारा समर्थित और गाॅंधी जी द्वारा अनुमोदित था। क्या कहीं कोई देशभक्त अपने देश के विभाजन के लिए प्रस्ताव पारित करता है? ऐसी मिशाल विश्व इतिहास में नहीं मिलती है। यह बेमिशाल है। जहाँ गुलाम बनाने वाली ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति का प्रतिनिधि वायसराय महारानी विक्टोरिया का पोता लार्ड माउन्टबेटन ही सत्ता हस्तान्तरण के लगभग 10 महीने बाद तक भारत का वायसराय बना रहा।

भारत जो पूर्णसामंती और पूर्ण औपनिवेशिक देश था वह अर्द्धसामंती, अर्द्धऔपनिवेशिक में बदल गया। सत्ता हस्तान्तरण के बाद ब्रिटिश राजसत्ता और व्यवस्था सेना, पुलिस, नौकरशाही, ब्रिटिश का ही कानून कायदे सत्ता और व्यवस्था का पुराना ढाँचा आज भी कायम है।

आज स्थित यह है कि देश का सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि इस देश को कोई सरकार नहीं है, इस देश को भगवान चला रहे हैं। वहीं निवार्चन आयोग का अध्यक्ष कहता है कि लोग पैसा कमाने के लिए रोज-रोज नई पार्टियाँ बना रहे हैं।

राजनीति अर्थनीति की धुरी है। अर्थनीति का चक्कर राजनीति लगाती है। किन्तु वतर्मान समय में समाज में राजनैतिक दरिद्रता छा गयी है। विचारधारा और सिद्धान्तविहीन राजनीति हो गयी है, इसीलिए निजी स्वार्थ के लिए एक पार्टी से दूसरे पार्टी में जाने के लिए भागदौड़ मची हुयी है। शोषणतंत्र को छिपाने के लिये संसदीय लोकतंत्र का ब्रिटिश प्रणाली को 15 अगस्त 1947 के पहले से ही गवर्मेन्ट आफ इण्डिया एक्ट 1935 के जरिये ऊपर से लाद दिया गया था ताकि पूरी स्थिति की जानकारी भारत की जनता को होने ही न पावे।

भारत में झूठ बोलने की आजादी को ही अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कहा जाता है। भारत का संसदीय लोकतंत्र इसी झूठ का नमूना है, जैसा कि सभी राजनीतिक पार्टियों के चुनावी वादों और नारों को केन्द्र या राज्यों के सरकारों के रवैये से पता चलता है।

हमारा देश कृषि प्रधान देश है, यहाँ 70 प्रतिशत लोग गांवों में निवास करते हैं और खेती करते हैं। उनकी जीविका कृषि से ही चलती है, उन्हीं को अन्नदाता भी कहते है। भारत में 40 प्रतिशत लोग भूमिहीन हैं। तेलंगाना किसान संघर्ष के ताप से डरके 1952 में जमीन्दारी उन्मूलन हुआ कुछ किसानों को जमीनें मिली। जो खुद काश्त थे सरकार को दस गुना लगान देकर भूमिधर हो गये और जमीन के मालिक हो गये। जो दस गुना लगान नहीं दे पाए वे खुद काश्त करने के बावजूद भी भूमिहीन हो गए। जिनके नाम से खुद काश्त नहीं रहा मगर खेती करते थे वे भूमिहीन हो गए। इस प्रकार जोतने वाले को जमीन नहीं मिल पायी।

1952 के पहले जमीन के मालिक राजा-रजवाडे, व जमीन्दार ही होते थे आम जनता का जमीन पर कोई अधिकार नहीं था। गांव में भी लोग जमीन्दारों या राजाओं के आदेश पर बसते थे और मकान बनाते थे। 1952 के बाद भी उन्होंने हजारों-हजारों एकड़ जमीन देवी-देवताओं, तथा मन्दिर के नाम दर्ज करा लिया है। क्योंकि जमीन्दारों, राजाओं-महराजाओं के नाम आज भी जमीन्दारी कायम है। भोजन, वस्त्र और मकान का निदान जमीन से जुड़ा हुआ है। जब जमीन से खेती होगी भोजन की समस्या हल होगी। जमीन से मकान की समस्या और जमीन से ही वस्त्र की समस्या हल होगी, किन्तु खेद की बात है किसी भी सरकार ने ऐसा नहीं किया कि जमीन जोतने वाले को जमीन मिले।

2020 में किसान विरोधी तीन काले कानून बने जो जमीन छीनकर पूंजीपतियों के हक में अडानी, अम्बानी के हाथ गिरवी करने की साजिश थी। जिसके लिये गत वर्ष तीन काले कानून बनाये गये थे जिसे किसानों के अथक संघर्ष के बाद सरकार को वापस लेना पड़ा।

किसी देश की स्वतन्त्रता का तात्पर्य है उस देश की जनता के आत्म निर्णय के अधिकार से होता है। दूसरे शब्दों में किसी देश के आर्थिक राजनैतिक मामले को खुद उस देश की जनता द्वारा समाधान करने का अधिकार होता है। वास्तव में इसी को स्वतन्त्रता कहा जाता है, जो अपने देश में नहीं हुआ।
हमारे महान क्रान्तकारियों सरदार भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, असफाक उल्ला खाॅ, सुखदेव, राजगुरू, बटुकेश्वर दत्त, के सपने आज भी अधूरे हैं जिन्हें एक बड़ा जनांदोलन साकार कर सकता है।

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