(उत्तराखंड के जाने-माने और वरिष्ठ पत्रकार पूरन बिष्ट आजकल पुरानी खोई पड़ी किताबों में डूबे हुए हैं। पुरानी किताबों से अधिक से अधिक जो भी उड़ेल रहे हैं उस उड़ेले में से थोड़ा सा हिमालय के स्वर भी उनकी इजाजत के बाद उठाकर आप लोगों तक पहुंचा रहा है)
विलियम मूरक्रॉफ्ट उन्नीसवीं सदी के प्रख्यात अन्वेषक और पशु चिकित्सक थे। अक्टूबर 1819 में तिब्बत और मध्य एशिया के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापार संभावनाएं तलाशने और बेहतरीन माने जाने वाले तुर्कमान घोड़ों की नस्ल भारत लाने के लिए उन्होंने बुखारा तक की यात्रा की थी। वे गढ़वाल के नीति दर्रे से तिब्बत जाना चाहते थे। लेकिन बर्फबारी के कारण दर्रें पर आवाजाही बंद हो गई। इसलिए जोशीमठ में लंबा इंतजार करने के बाद वह श्रीनगर, टिहरी, देहरादून, नाहन, लद्दाख, कश्मीर होकर बुखारा पहुंचे। उनका यह रोचक यात्रा विवरण ट्रेवल्स इन द हिमालयन प्राविंस आफ हिंदोस्तान एंड पंजाब में प्रकाशित हुआ। पेश है मूरक्राफ्ट की आंखों देखी-
हिमालय-पार की यात्रा की तैयारियाँ पूरी होने के बाद, मैंने अक्टूबर 1819 के अंत में बरेली छोड़ा। मेरे सामान के लिए पहाड़ों की तलहटी तक सरकारी हाथी और ऊँट उपलब्ध कराए गए। पहाड़ में सामान मुख्यतः कुलियों द्वारा ढोया जाता था, जिन्हें जुटाने में कुमाऊँ के कमिश्नर ट्रेल ने हर संभव सहायता दी। यहीं हमने बारह गोरखा सिपाहियों का एक रक्षक-दल भी अपने साथ जोड़ा। इस पूरी यात्रा का व्यय मुझे वहन करना था।
मैं चाहता था कि, सर्दियों की बफबार्री के कारण बंद होने से पहले नीति दर्रे से हिमालय पार कर लूँ। अल्मोड़ा पहुँचने पर, सामान ढोने के लिए कुली और पशु जुटाने का जिम्मा जिस देसी एजेंट को दिया गया था, उसने कहा था कि, हमारे जोशीमठ पहुँचने तक सब तैयार मिलेगा। हम 15 दिसंबर को जोशीमठ पहुंचे। लेकिन दर्रा तब तक बंद हो गया था। इसलिए न पर्याप्त कुली मिले और न ही याक। हालांकि, इस दौरान भोटियाओं के कई दल दर्रे से नीचे आए, और 21 दिसंबर को हुनियों (तिब्बतियों) का एक जत्था उसी रास्ते अपने देश लौटा। मैंने प्रस्ताव रखा कि, सामान छोड़कर, कुछ लोगों के साथ दर्रा पार करने का प्रयास करूँ। परंतु गाइडों ने साथ चलने से इनकार कर दिया। अतः यह योजना त्यागनी पड़ी। अब या तो अगली गर्मी तक जोशीमठ में ही रुकना था, या लद्दाख जाने के लिए कोई दूसरा रास्ता अपनाना था।
अंतः मैंने निश्चय किया कि राजा रणजीत सिंह की अनुमति लेकर कुल्लू के रास्ते आगे बढ़ूँ, और इसी इरादे से हम श्रीनगर की ओर चले।
भूकंप और बाढ़ से आक्रांत श्रीनगर
गढ़वाल की पुरानी राजधानी श्रीनगर, अलकनंदा नदी के बाएँ किनारे पर स्थित है। कैप्टन हार्डविक की यात्रा के समय से यह काफी उजड़ चुका था। इस प्रांत को गोरखों ने 1803 में जीता था, और लगभग उसी समय राजधानी, भूकंप और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आई थी। हमारी यात्रा के समय तक श्रीनगर इन आपदाओं से उबर नहीं पाया था, और आधा से अधिक नगर खंडहर में बदल चुका था। महल, और कुछ इमारतें, लगभग तीन सदी पहले बनाई गई थी, परंतु भुरभुरे पत्थर से बनी होने के कारण समय और आपदा, दोनों से जर्जर होकर वीरान पड़ी थी। नगर में दो हिंदू मंदिर थे। परंतु धर्मशाला की हालत सबसे अच्छी थी। श्रीनगर का बाजार एक सड़क के दोनों ओर था। सड़क, लगभग एक चैथाई मील लंबी और पक्की थी। घर अधिकांशतः पत्थर के थे। ढलवाँ स्लेट की छतों वाले और दो मंजिला। जिनकी निचली मंजिल दुकान के तौर पर प्रयोग होती थी। व्यापार बहुत कम था। केवल घरेलू उपयोग के मोटे सूती ओर ऊनी कपड़े ही यहाँ बनते थे।
श्रीनगर में मछली पकड़ने का अनूठा तरीका
अलकनंदा में एक विशेष प्रकार की ट्राउट मछली पाई जाती है जो ब्रिटेन में पाई जाने वाली किस्मों से भिन्न है। इसे पकड़ने के लिए प्रयुक्त डोरियाँ, यहाँ मुरवा नामक बेल (सैंसेवियेरा जेलैनिका) के रेशों से बनाई जाती हैं। मछली पकड़ते समय, डोरी के ढीले सिरे पर एक छोटा पीला फूल बाँधा जाता है, और उसके चारों ओर सफेद घोड़े के बालों के कई फंदे लगाए जाते हैं। बीच में वजन डाला जाता है जिससे डोरी डूब जाती है। इस नई वस्तु से आकर्षित होकर ट्राउट उसके आसपास मंडराने लगती हैं, और फंदे में फँस जाती है।
अलकनंदा से सोना निकालने की वह तकनीक
नदी की रेत में, विशेषकर पास के पहाड़ों में भारी बर्फ या बारिश के बाद, कुछ मात्रा में सोना पाया जाता है। इसे निकालने का काम मुख्यतः नाहन (हिमाचल प्रदेश) के लोग करते हैं। उनके उपकरणों में एक लकड़ी का नाव-आकार का कुंड, लकड़ी की दो उथली ट्रे, बाँस की एक छलनी, आधा लौकी का खोल, थोड़ा पारा, चमड़े के कुछ टुकड़े, और तराजू-बाट शामिल होते हैं। सोना निकालने के लिए बनाया गया कुंड चार फुट लंबा, अठारह इंच चैड़ा और उतना ही गहरा होता है। इसके एक छोर के पास तल में एक छेद होता है। इसे नदी किनारे इस तरह रखा जाता है कि जिस छोर पर छेद है वह थोड़ा नीचा रहे। छलनी बाँस की सीधी पतली पट्टियों को पास-पास रखकर बनाई जाती है, और इसे कुंड के आर-पार रखा जाता है। दो व्यक्तियों में से एक ट्रे भर रेत, छलनी पर फैलाता है, और दूसरा उसके किनारे को इस तरह मोड़ता है कि रेत बहकर न जाए, और उस पर सूखी लौकी (तुमड़ा) से पानी डालता है। यह तब तक दोहराया जाता है जब तक बारीक कणों वाला पानी छलनी के छिद्रों से छनकर नीचे नहीं चला जाता, और पत्थर-कंकड़ तथा मोटे पदार्थ सतह पर रह जाते हैं। जब कुंड के तल में पर्याप्त मात्रा में यह छना हुआ मिश्रण जमा हो जाता है, तो पानी, नीचे के छेद से निकल जाता है, और बचे हुए कीचड़ को फिर से धोया जाता है। इसके लिए इसे लकड़ी की ट्रे में उठाकर ताजा पानी डाला जाता है। ट्रे को हाथ से घुमाया जाता है, और मोटे व हल्के हिस्सों को भारी व बारीक हिस्सों से अलग किया जाता है। इसके बाद सोने के बड़े कणों को निकालकर चमड़े के टुकड़ों में लपेट लिया जाता है। धातु के बारीक कणों को निकालने के लिए, शेष रेत को पारे के साथ घिसा जाता है। यह काम बहुत लाभदायक नहीं है, क्योंकि धोने वाले औसतन महीने में केवल चार रुपये ही कमा पाते हैं। पिघलाने के बाद सोने को छह रत्ती वजन फर्रुखाबादी रुपये के बराबर, या बारह माशा (लगभग एक सौ तिहत्तर ग्रेन) का एक तोला, सोलह रुपये में बेचा जाता है। जब मैं श्रीनगर में था तब इस काम में पंद्रह से अधिक व्यक्ति नहीं लगे थे। लेकिन उचित प्रोत्साहन मिलने पर यह सैकड़ों लोगों को लाभदायक रोजगार दे सकता है।
मलेथा में गेहूं, गन्ना और तम्बाकू की खेती
चार फरवरी, 1820 को दोपहर से कुछ पहले हमने श्रीनगर छोड़ा, और नगर के पश्चिमी छोर से कुछ दूरी पर एक झूला पुल से अलकनंदा पार की। इस पुल की रस्सियाँ एक प्रकार की घास से बनाई जाती हैं। नदी ऊँचे चट्टानी किनारों के बीच बहती थी और बीच में छत्तीस फुट गहरी थी। भारी वर्षा के बाद इसका जलस्तर इतना ही और बढ़ जाता है, और कभी-कभी कुल गहराई छियासी फुट तक पहुँच जाती है, जिसके कारण पुल को ऊँचे स्थान पर बनाना पड़ता है। नदी के प्रवाह-मार्ग में विशाल पत्थरों के खंड हैं, जो आसपास की चट्टानों से बिल्कुल भिन्न प्रकार के हैं, और स्पष्टतः किसी ऊँची चोटी से धारा के साथ बहकर आए हैं।
अलकनंदा के दाहिने किनारे पर एक संकरी, ऊबड़-खाबड़ और ऊँची-नीची पगडंडी थी। डेढ़ मील आगे, यह पगडंडी, मलेथा नामक एक छोटे कस्बे से गुजरती थी, जहां गेहूँ, गन्ना, तंबाकू और प्याज की खेती की जा रही थी। इसके बाद रास्ता नदी से हटकर, टकोली नाले के बाएँ किनारे के साथ उत्तरी दिशा में था। रास्ता बंजर और वीरान था, जिसमें ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों के दृश्यों की भव्यता का अभाव था। (जारी)
फोटो- 1789 में बनाई गई श्रीनगर के पास की एक पेंटिंग।






