ब्रिक्स संगठन के सभी देश ब्राजील , रूस , भारत , चीन , दक्षिण अफ्रीका , मिस्र , इथियोपिया , ईरान , सऊदी अरब , संयुक्त अरब अमीरात , इंडोनेशिया भारत में चल रहे वृक्ष सम्मेलन में मौजूद है।
क्योंकि वृक्ष संगठन उभरते हुए बाजारों का एक अनौपचारिक जैसा संगठन भी है इसलिए इस संगठन के सम्मेलनों और सम्मेलन के प्रस्तावों पर पश्चिम की नजर रहना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में पश्चिम का मीडिया इस सम्मेलन को किस रूप में देखता है महत्वपूर्ण हो जाता है।
पश्चिम की मीडिया ने ब्रिक्स को लेकर जो कुछ भी लिखा है उसमें आमोद प्रमोद तो कतई नहीं है लेकिन चौंकाने और चिंता करवाने वाला बहुत कुछ है। अमेरिका रूस और यूरोप के परस्पर विरोध को ध्यान में रखते हुए मेजबान देश भारत की ओर से प्रधानमंत्री श्री मोदी ने जो बयान दिया है वह स्पष्ट करता है कि ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं है। यह भारत का बयान हो सकता है लेकिन जहां तक ब्रिक्स में उपस्थित अन्य सभी सदस्य देशों का सवाल है तो चीन , रूस, ईरान की उपस्थिति के रहते इस सम्मेलन से पश्चिम की चिंता को मुक्त नहीं किया जा सकता है।
सम्मेलन को लेकर इजरायल अमेरिका ईरान के तनाव को केंद्र में रखकर न्यू यॉर्क टाइम्स ने जिनपिंग और मोदी के बीच खाई बनाने की पूरी कोशिश की है। अमेरिका के मीडिया के अनुसार चीन की कोशिश है कि ब्रिक्स मंच का स्तेमाल अमेरिका को चुनौती देने के लिए किया जाए। इस स्थिति को भांपते हुए भारत अपने पक्ष को ने दोहराने की कोशिश करता रहा कि यह मंच अमेरिका विरोधी मंच के रूप में सामने ना आए।
पश्चिम के नजरिए के आधार पर ब्रिक्स सम्मेलन को रूस और युक्रेन युद्ध से अलग हटा कर देखना जल्दी बाजी होगी।
पश्चिमी अखबारों की चिंता वर्ष 2024 में ब्रिक्स संगठन का सदस्य देश बने ईरान को लेकर भी है।
अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध तनाव के रहते इस सम्मेलन पर अमेरिका और इजरायल की नजरे गंभीरता से गढ़ी हुई हैं इस बात का आभास इसराइल और अमेरिका के मीडिया दे रहे हैं।
अमेरिकी मीडिया में अरब देशों की भी चिंता फ्रेम में है।
अमेरिका और इजरायल द्वारा ब्रिक्स के भीतर गहरे मतभेद पैदा किए जाने की अवस्थाओं को अल जजीरा भी मान ही रहा है। विदेशी मीडिया ने स्वीकारा है कि ब्रिक्स सम्मेलन में रूस और चीन खुलकर ईरान के साथ खड़े हैं जबकि भारत की स्थिति मुंह में छछूंदर वाली है।
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले को चीन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सझा हितों के खिलाफ बताया है। भारत अगर कोशिश करता तब भी ब्रिक्स सम्मेलन में समुद्री जल मार्ग के बीच के पड़ाव हौर्मुज पर चर्चा आने को रोक ही नहीं सकता था।
पश्चिमी मीडिया ने खबर यह भी छापी है कि ब्रिक्स सम्मेलन में टू स्टेट सॉल्यूशन पर जोर दिया जाना इसराइल पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने जैसा है।
ऐसे समय में जब पश्चिम के देशों में मन्दी का दौर साफ दिखाई देने लगा है तब ब्रिक्स सम्मेलन पर ब्रिटिश मीडिया कैसे चुप बैठ सकता है। ब्रिटिश मीडिया सम्मेलन को पश्चिमी देशों के हितों के नजरिए से देख रहा है। बीबीसी, गार्जियन, दि इंडिपेंडेंट ने ब्रिक्स सम्मेलन को पश्चिमी वैश्विक व्यवस्था के विस्तार और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने, डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ धमकी और यूक्रेन युद्ध के साथ जोड़कर देखा है। ब्रिटिश मीडिया ने भारत में इस सम्मेलन को भारत के लिए कठिन कूटनीतिक परीक्षा के रूप में भी देखा है।
समीक्षा के रूप में यह कहा जा सकता है कि वृक्ष सम्मेलन पश्चिम को कड़ा संदेश देने में पूरी तरह से नाकामयाब साबित हुआ है, लेकिन यह सम्मेलन अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान को नैतिक समर्थन देता हुआ इसलिए दिखाई दे रहा है कि सम्मेलन में रूस और चीन बड़ी ताकत के रूप में मौजूद हैं तथा ईरान के पक्ष में तानकर खड़े हुए हैं।
सम्मेलन में ईरान की गम्भीर चुप्पी इसराइल और अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध के प्रतिउत्तर में ईरान द्वारा किए गए हमलों की कार्रवाई को ईरान के पक्ष में ले जाने में कामयाब हुई है।







