पहाड़ में अनवरत चलते हैं शराब के खिलाफ आंदोलन, लेकिन सरकार के कानों में जूं भी नहीं रैंगती

उत्तराखंड वह प्रान्त है जहां हर मौसम में किसी न किसी क्षेत्र में शराब के खिलाफ आंदोलन चल ही रहा होता है। यदि 75 वर्षों के इतिहास की ओर पलट कर सरसरी सी नजर भी दौड़ाएं तो उत्तराखंड में शराब के खिलाफ आंदोलन की एक लंबी फेहरिस्त दिखाई देती है। इस फेहरिस्त में 1984 मैं “नशा नहीं रोजगार चाहिए, जीने का अधिकार चाहिए” नारे के साथ चला तत्कालीन छात्रों का आंदोलन तब की सत्ता के जबरदस्त और क्रूरतम दमन चक्रों की इबारत के साथ इतिहास में मौजूद मिलता है।

वर्तमान उत्तराखंड सरकार ने दूसरे या तीसरे साल में शराब के ठेके उठाने की नई पद्धति विकसित कर ली है, वरना पूर्व में प्रतिवर्ष शराब के ठेके उठाए जाने का प्रचलन था। तब मार्च के अंतिम सप्ताह में जब भी शराब के ठेके उठते थे, तब संपूर्ण उत्तराखंड में आंदोलनों की बाढ़ जैसी आ जाती थी। इन आंदोलनों की बहुत बड़ी जमीन भले ही नहीं होती थी, लेकिन जनता अपना गुस्सा सरकार के सामने छलका ही देती थी।

किसी नए क्षेत्र में कोई नई शराब की दुकान खोली जाती थी तो उस क्षेत्र में लोग दुकान के खिलाफ उग्र होते थे, सड़कों पर उतरते थे, विरोध करते थे, इक्का-दुक्का प्रकरणों को छोड़कर प्रायः नयी दुकान खुल ही जाती थी।

उत्तराखंड में सरकार के नियंत्रण वाली व्यावसायिक शराब की बिक्री के इतिहास को टटोलते हैं तो वर्ष 1905 से यहां सरकारी शराब बिकने के शुरुवाती प्रमाण मिलते हैं। सरकारी शराब बेचने के लिये सरकारी नियम बनाने भी जरूरी थे और नियम तभी बन सकते थे जब शराब बेचने के लिए एक नीति स्पष्ट होती। तब की सरकार ने उत्तराखंड के पहाड़ों में शराब बेचने की नीति को इस पंक्ति को केंद्र में रखकर परिभाषित किया –

“क्योंकि यहां लोगों में शराब बनाने और पीए जाने का प्रचलन है इसलिए सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह इस क्षेत्र में अच्छी से अच्छी शराब लोगों को उपलब्ध करवाए”

क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत को अपनी कंपनियों में बनाई जाने वाली शराब के सभी कंपीटीशनों को खत्म भी करना था, इसलिए यहां इक्का-दुक्का क्षेत्र/समाज में बनने वाली शराब को भी बंद करवाने के लिए शराब नीति को यहां के लोगों के स्वास्थ्य के केन्द्र में रखकर क्षेत्रीय स्तर पर बनाकर पीने और पिलाई जाने वाली शराब को भी कानून के बल पर रोकने के रास्ते खोले गए।

यहां इस बात को कहा जा सकता है कि 1905 के बाद ही उत्तराखंड में कानून बनाकर सरकारी नियंत्रण में शराब बेची जाने और क्षेत्रीय स्तर पर बनने वाली शराब को कानून की ताकत से रोकने का प्रावधान प्रारंभ होता है।

यहां इस बात को भी प्रकाशा में लाया जाना चाहिए कि क्षेत्रीय स्तर पर गुड़ या चावल या मडुवा या यहां मिलने वाले फलों को सड़ा कर जो शराब बनती थी वह एक प्रकार से वाइन ही होती थी, जिसके दुष्परिणाम भी नहीं के बराबर थे।

वर्तमान भारत में सिर्फ उत्तराखंड राज्य ही नहीं वरन् देश के सभी राज्यों की सरकारें इस बात को खुलकर प्रचारित प्रसारित करती है कि शराब से मिलने वाला राजस्व राज्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। यही राजस्व ऐसी लकीर है जो शराब के खिलाफ उठने वाले आंदोलन को कुचलने का मार्ग भी खोलता है।

उत्तराखंड में हर गली, मोहल्ले, गांव में कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जो प्रमाणित करते हैं कि शराब की वजह से कितने लोगों की मृत्यु हो चुकी है, कितने परिवार उजड़ गए हैं या परिवारों की अर्थव्यवस्था को किस तरीके से शराब प्रभावित कर रही है। इसके विपरीत सरकार या सामाजिक समितियों/संस्थाओं की ओर से ऐसे कोई शोध या परीक्षण नहीं करवाए गए जो बता सकते हों कि सरकार द्वारा बेची जाने वाली शराब किस हद तक उत्तराखंड के लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही है और किस प्रकार से घरों की अर्थव्यवस्थाओं को चौपट कर रही है।

उत्तराखंड में सरकार शराब को बेचने के लिए किस स्तर तक समझौता कर रही है का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद के बागेश्वर नगर मुख्यालय में सिर्फ सवा वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में देसी और विदेशी शराब की दो बड़ी-बड़ी दुकानों के अलावा शराब के 16 बारों (शराब पीने पिलाने के होटल नुमा रेस्टोरेंट) के लाइसेंस आवंटित किए गए हैं तथा कई नयी दुकानें तथा नए बार खुलवाने के सरकारी प्रयास जारी हैं।

उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को समझने वाले तथा बेहतर अर्थव्यवस्था के पैरोकार दबी हुई ज़ुबान से यह भी बता ही देते हैं कि उत्तराखंड में शराब के खिलाफ कुछ आंदोलन इसलिए तैयार करवाए जाते हैं ताकि यहां का समाज वाइन बनाने को कुटीर उद्योग के रूप में स्थापित करने की मांग ना उठाने लग जाएं।

-रमेश कृषक

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