सवाल तो प्रशासन और सरकार से है कि जिस इलाके में इनर लाइन परमिट के बिना कोई भी नहीं जा सकता, वहां कोई गुजरात का ट्रस्ट, राजस्थान से ट्रक लेकर पहुंच कैसे गया ? ये ट्रस्ट किसका है, किसकी शह पर काम कर रहा है ? धामी जी तो बड़ी डींगें हांक रहे थे कि उत्तराखंड के तीर्थों के नाम पर राज्य के बाहर किसी को कुछ नहीं करने देंगे, यहां तो आदि कैलाश के नाम पर गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली वाले ट्रस्ट बना कर दुनिया भर में चंदा बटोर रहे हैं और धड़धड़ाते हुए सीमा तक पहुंच जा रहे हैं और कोई पूछने वाला नहीं ?
सामरिक दृष्टि से संवेदनशील इस इलाके में बिना जांच- परख के किसी को भी जा कर कुछ भी करने की अनुमति कैसे दी जा सकती है ?
पारिस्थितिकी और पर्यावरण के लिहाज से भी यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है, वहां इतना भारी- भरकम निर्माण किसी भी सूरत में नहीं होना चाहिए।



