उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव सामने खड़े हैं और भाज पार्टी राज्य की खस्ताहाली से अपनी सत्ता खोने की कगार पर पहुँची हुई है लेकिन मुख्यमंत्री को कोई परवाह नहीं है। इसका एक उदाहरण बिन्दुखत्ता राजस्व गाँव का बड़ा मुद्दा है।
उत्तराखंड के नैनीताल जिले में वनभूमि पर पीढ़ियों से बसे बिन्दुखत्ता को वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत राजस्व में परिवर्तित करने की कार्यवाही शासन स्तर पर दो साल से लंबित है और राज्य सरकार लोगों को उनका अधिकार देने को तैयार नहीं है।
इस अधिनियम के तहत जिला प्रशासन की देख-रेख में ग्रामीणों द्वारा गठित वनाधिकार समिति, बिन्दुखत्ता द्वारा प्रस्तुत सामूहिक दावा जिला स्तरीय वनाधिकार समिति ने 19 जून, 2024 को स्वीकृत कर राजस्व परिषद, देहरादून को भेज दिया था लेकिन तब से मामला अज्ञात कारणों से वहीं पर रुका हुआ है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उनके तमाम विभागीय सचिवों से अधिसूचना जारी करने के लिए बार-बार अनुरोध करने पर भी राज्य सरकार ने पत्रावली पर न तो कोई आपत्ति जताई है और न ही राजस्व गाँव बनाने की अधिसूचना जारी कर रही है।
कुमाऊं के चंदवंशी राजाओं के कालखंड से भी पहले से बसे हुए बिन्दुखत्ता की कारुणिक कहानी बहुत लंबी है। कुमाऊं आयुक्त और बाद में मुख्य सचिव रहे आर.एस. टोलिया की एक रिपोर्ट इस ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि करती है।
इस गाँव की ताज़ा स्थिति इस तरह से है—
1- कुल 32 वनग्रामों की समेकित वनभूमि लगभग 3,400–3,500 हेक्टेयर,
2- कुल परिवारों की संख्या 11,703 है,
3- कुल जनसंख्या लगभग 54,000,
4- वनाधिकार अधिनियम की सभी शर्तों को पूरा करते हुए सामूहिक दावा पेश किया गया है,
5- गाँव में लगभग 35,000 मतदाता हैं, जो विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव में मतदान करते हैं लेकिन वे अपनी ग्राम पंचायत का गठन करने को अधिकृत नहीं हैं।
6- विकास कार्य केवल सांसद/विधायक क्षेत्रीय विकास निधि पर निर्भर हैं।
7- ग्रामीणों को केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा संचालित किसी भी योजना का लाभ नहीं मिलता।
8- जिला प्रशासन ने बिन्दुखत्ता के सरकारी पेंशनधारकों के अभ्यावेदन सत्यापित/संस्तुति करने का काम वनाधिकार समिति, बिन्दुखत्ता को सौंप रखा है।
9- क्षेत्र में निजी क्षेत्र को अपने व्यावसायिक विस्तार के लिए सरकार वनाधिकार समिति से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लाने को कहती है।
10- राज्य स्तर पर अभी तक केवल 3 गाँव जिला नैनीताल और 3 गाँव जिला हरिद्वार में वनाधिकार अधिनियम के अंतर्गत राजस्व में परिवर्तित किए हैं। जबकि सरकारी दस्तावेजों में राज्य के कुल क्षेत्रफल की 74% जमीन वनों से आच्छादित है। तो स्वाभाविक रूप से यहाँ पीढ़ियों से वनभूमि पर आश्रित आजीविका चलाने वालों की संख्या देश में सर्वाधिक है लेकिन इस पर भी राज्य सरकार वनों में रहने वाले अथवा उन पर आश्रित आजीविका वालों की इस गंभीर स्थिति पर ध्यान नहीं दे रही है।
इस प्रकरण में बिन्दुखत्ता के ग्रामीण एक वर्ष से आंदोलन चला रहे हैं लेकिन सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं होता। अभी दो दिन पहले कुछ ग्रामीणों ने जब देहरादून जाकर मुख्यमंत्री से अधिसूचना जारी करने का अनुरोध किया तो उन्होंने कहा कि आंदोलन करने से कुछ नहीं होता। धरने पर बैठे-बैठे थक जाओगे, हासिल कुछ भी नहीं होगा। चुनाव में एक सीट हार भी जाएँ तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा।



