उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, नदियों और प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं
है, बल्कि यहां की समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों से भी है, जिनसे सदियों से लोग अपने जीवन यापन के साथ एक मजबूत स्थानीय आर्थिकी की अवधारणा को भी मूर्त रूप देते रहे हैं।
यहां के मेहनतकश लोगों ने सदियों पहले इस कठोर पहाड़ को जीवंत बनाते हुए सीढ़ीदार खेतों का निर्माण कर इसे अपनी आजीविका का सबसे बड़ा साधन बनाया। उन्होंने अपने कृषि, पशुपालन और जंगल आधारित संसाधनों को ही अपनी आर्थिकी सबसे बड़ा साधन माना और उसे विकसित भी किया। कृषि, पशुपालन और वन आधारित उपजों से उन्होंने हिमालय की उस मूल अवधारणा को भी जिंदा रखा, जिसने ‘पहाड़ बसाओ’ नारे के रूप में हिमालय की हिफाजत के लिए उप्रेरक का काम भी किया।
आजादी से पहले और अंग्रेजों के राज के समय यहां जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए लगातार आंदोलन चलते रहे। लोगों का माना था कि स्थानीय लोगों को जब तक स्थानीय संसाधनों पर अधिकार नहीं मिलेगा, उनका आर्थिक रूप से विकास नहीं हो पाएगा। दुर्भाग्य अंग्रेजी शासन में लगातार जंगलात और लगान कानूनों ने लोगों को उनके स्थानीय संसाधनों से अलग ही रखा। आजादी के बाद भी कमोवेश यही स्थिति रही।
सत्तर के दशक में जल, जंगल और जमीन को लेकर आंदोलन चलते रहे। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के पीछे भी यही उत्प्रेरण थी कि अपने संसाधनों पर लोगों को कैसे रोजगार से जोड़ा जा सकता है। पलायन को रोकने के लिए स्थानीय रोजगार की जरूरत पर ही ज्यादा जोर दिया गया। चार दशक तक चले आंदोलन और 42 शहादतों के बाद 9 नवंबर, 2000 में उत्तराखंड राज्य बन गया। सरकार राज्य स्थापना की ‘रजत जयंती’ अपने तरीके से मना रही है, लेकिन अभी स्थानीय संसाधनों पर रोजगार के सवाल और तल्ख होकर हमारे सामने हैं।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद लोगों को लगता था कि सरकारें ऐसी नीतियां बनाएंगी कि स्थानीय संसाधनों से रोजगार मिल सके, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। (चरू तिवारी)

