जातीय विद्वेष घृणा नफरत का उत्तराखंड में न तो केतन एक अकेला पीड़ित है और जैसा समाज हम बन गए हैं तो न अन्तिम है ..(इन्द्रेश मैखुरी)

केतन की हत्या को लेकर कोई सन्देह की गुंजाईश ही नहीं थी पहले दिन से ही कि यह जातीय विद्वेष से उत्पन्न घृणा क्रोध हिंसा का परिणाम है । जातीय कोण (ऐंगल) न होने पर इसी तरह के प्रसंग और घटना के परिणाम कुछ और होते । समझाईश, डांट डपट या हद से हद मार पीट.. किन्तु हत्या तक और ऐसी शारीरिक यातना तक तो नहीं ही जाता ।

जातीय विद्वेष घृणा नफरत का उत्तराखंड में न तो केतन एक अकेला पीड़ित है और जैसा समाज हम बन गए हैं तो न अन्तिम है .. यह सिलसिला है..

2022/2023 में आन्दोलन के दौरान हमने इसे बहुत करीब से देखा जाना कि आपदा के एक समान प्रभावित होते हुए भी जातीय विभाजन उस प्रभाव को कितना अलग अलग तीक्ष्ण बना देता है । और आपदा के तीन साल बाद अब जो पीड़ित है वह सिर्फ आपदा से पीड़ित नहीं है.. उसकी पीड़ा को उसकी जातीय सामाजिक हैसियत और कई गुना बढ़ा देती है ।

धरने के 48घण्टे बाद सभा करते हुए हमने इस पर विस्तार से बात की । अपने वक्तव्य में। हमारे साथी ने किस तरह धरने से लौटते हुए रात को व्यक्तिगत अपमान झेला इसका भी जिक्र किया । सिर्फ इसलिए कि धरने में दलित लोग की संख्या ज्यादा है ।

केतन की हत्या के पीछे वजह बताई गई कि प्रेम प्रसंग था । और अब तो इसे और लेजिटिमाइज अथवा सही साबित करने के लिए लड़की के चरित्र को भी निशाना बनाया जाने लगा है । एक पूरा विमर्श खड़ा किया जा रहा है कि इसका जाति पाती से कोई लेना देना नहीं है । एक भगवा वेश धारी तो यहां तक ऐलान किए दे रहे हैं कि ऐसे लोगों का गला ही काट दिया जाना चाहिए ।

घृणा का नफरत का माहौल कितना गहरे तक व्याप्त है और समाज की तहों में कितने स्तरों पर कितने निम्नतम रूपों में यह व्याप्त है इसको टिहरी के ही एक गीतकार के वायरल ऑडियो से समझा जा सकता है .. उस ऑडियो को सुनते हुए लगता है किसी ने बजबजाते गटर का ढक्कन खोल दिया हो ।

घृणा और द्वेष का पूरा इकोसिस्टम बना बनाया चारों तरफ मौजूद है .. भीतर भीतर रोज यह बनता है और किसी दिन एक हल्के से उकसावे पर यह अपनी पूरी प्रतिहिंसा में बाहर फैल जाता है.. तब हम केतन जैसे जगदीश जैसे पंकज जैसे घटनाक्रम में इसके काले लाल निशान धब्बे देखते हैं ।

जोशीमठ हो या कोई अन्य आपदा सभी में समाज का सबसे निम्न तबका गरीब दलित वर्ग सर्वाधिक प्रभावित होता है.. एक तो आपदा की मार ऊपर से समाज की उपेक्षा तिस पर प्रशासनिक हंटर व्यवस्था की चालाकी.. इसको ऐसा बना देती है कि संघर्ष कई तरफा हो जाता है । सिर्फ सर्वाइवल ही एक पक्ष नहीं है । उसके पीछे सर्प के दंश की तरह के कितने ही दंश होते हैं जिन्हें बहुत बारीक देखने समझने महसूस करने पर ही आप पकड़ सकते हैं ।

जब तक सभी एक समान प्रभावित हैं और राजनीति को ज्यादा नुकसान नहीं है तब तक सब ठीक रहता है .. जैसे ही प्रभावितों को श्रेणी में बांट दिया जाता है और राजनीति को खासतौर सत्ता को नुकसान होने लगता है तब सबसे कमजोर पक्ष निशाने पर आ जाता है ।
केतन की हत्या के बहाने इस समय यह चर्चा विमर्श सतह पर है .. इसको आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है । हमारा समाज इस जकड़न में सदियों से है और इससे निकलने में भी समय लगेगा मगर ईमानदार शुरुआत तो हो । स्वीकार से शुरुआत होती किन्तु यहां तो पहले ही नकार है । किन्तु हम इस बहस को आगे ले जाने की हरचन्द कोशिश रुकनी नहीं चाहिए ।

जोशीमठ में हमने इस नफरत विद्वेष को पुनः देखा है जो समय असमय सतह पर आती ही है .. इसलिए इस बहस को आगे ले जाने के लिए हम पहल कर रहे हैं..

पूर्व में भी जब जोशीमठ क्षेत्र में ढोल बजाने के मामले में उत्पीड़न की बात आई तो हमने इस बहस को आगे ले जाने और तार्किक दिशा देने हेतु पंचायत का आयोजन किया था पुनः इसकी जरूरत है ।

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