भारतीय जनता पार्टी की सरकार उत्तराखंड में दसवां साल पूरा करने जा रही है। इन 10 सालों में भारतीय जनता पार्टी के पास खुद इतना नैतिक साहस नहीं है कि वह खुली बहस जनता के बीच करवा सके कि उसने इन 10 सालों में समाज के लिए क्या किया, पहाड़ के लिए क्या किया, पहाड़ की नदियों के लिए क्या किया, पहाड़ के जंगलों के लिए क्या किया, पहाड़ की संस्कृति के लिए क्या किया।
बावजूद कुछ नहीं करने के भी सरकार अपने तरीके से पूरे प्रयास में लगी है कि लोग यह माने कि सरकार ने प्रदेश के लिए बहुत कुछ किया है। इसके उलट, जब सरकार से आंखों में आंखें डालकर पूछा जाता है कि बताइए आपने क्या किया है तब सरकार राष्ट्रवाद की चासनी में कुछ भी घोलकर जनता को पिलाने की कोशिश करने लगती है। जब सरकार की समझ में आ जाता है कि बात नहीं बन रही है तब हिंदू मुसलमान, वनभूल पुरा, चिन्यालीसौड़, थूक जेहाद और भी बहुत सारे धार्मिक मुद्दे सामने रख देती है।
एक बड़ी दुविधा अभी भारतीय जनता पार्टी के लिए है कि वह अपने ही कर्मों की वजह से माननीयों को बतौर वी आई पी समाज के बीच उतारने से डर रही है। जब माननीय हिम्मत जुटाकर जनता के बीच आने लगते हैं तब जनता एक ही सवाल माननीय से पूछती है कि वह वीआईपी कौन है जिसको लेकर पूरा पहाड़ सवाल पूछ रहा है। यही एक सवाल है कि माननीय भी खुलकर जनता के बीच में आने से डर रहे हैं कि जनता के इस सवाल का उत्तर क्या दें।
उहा पोह की स्थिति में सरकार स्व प्रसन्सा के कई छोटे छोटे मार्ग निकालने का प्रयास भी कर ही रही है। ऐसे ही प्रयासों में विगत दिवस बागेश्वर नगर में एक शिविर लगाने की कोशिश की गई। गोदी मीडिया इसको 15 सालों के बाद लगा एक बृहद शिविर के रूप में बताना चाह रहा था तो क्षेत्रीय मीडिया जो छोटे.छोटे सवाल पूछने की हिम्मत रखता है एक ही सवाल पूछ रहा था कि इस शिविर को लगाने की जरूरत क्याें आन पड़ी थी।
जब भी जिले स्तर पर या ब्लॉक स्तर पर या ग्रामीण स्तरों पर विकलांग सर्टिफिकेट बनाने हेतु सिविर लगते हैं तो बहुत सारे लोग जिनके विकलांग सर्टिफिकेट नहीं बन पाए होते हैं भीड़ के रूप में उम्मीद के साथ शिविर में पहुंचते ही हैं कि उन्हें विकलांग सर्टिफिकेट मिल जाएगा तो वे भी सरकारी योजनाओं में लाभ ले सकेंगे।
एसे शिविरों में अधिक से अधिक भीड़ को इकट्ठा करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के बजट से यंत्र और उपकरण बांटने का फैशन भी अभी चलन में है । ऐसी स्थिति में जब हर आदमी को स्वास्थ्य बीमा योजना के साथ जोड़ा जा चुका है तथा हर व्यक्ति की जेब में उसका आयुष्मान कार्ड पड़ा हुआ है तब स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से उपकरण बांटने के पीछे असल मकसद क्या होता है पर सवाल तो उठते ही हैं।
बागेश्वर में जो शिविर लगाया गया था उस शिविर में प्रायः विकास के सभी विभागों ने अपनी उपलब्धियों की प्रदर्शनी लगाई हुई थीं । ऐसी प्रदर्शनियां उत्तरायणी मेले में भी लगती हैं और गाहे बगाहे भी लगती रहती हैं। इन प्रदर्शनियों के लिए बजट भी विभागों के पास होता है जिसे खर्च भी करना ही होता है।
अब क्योंकि माननीय लोग जनता के बीच में आने से इस लिए डर रहे हैं कि वे जानता के सवालों के जवाब नहीं दे सकते हैं तब ऐसी स्थिति में ऐसे शिविरों के उद्घाटन का मुख्य अतिथि किसे बनाया जाए के लिए एक नया रास्ता खोला गया है कि ग्रामीण न्यायालयों से संबंधित शिविरों को भी सरकारी विकास योजनाओं के शिविरों के साथ जोड़ दिया जाए। सरकार को लगता है कि न्यायपालिकाओं के न्यायाधीशों को ही यदि मुख्य अतिथि बनकर ऐसे शिविरों में आने के लिए प्रेरित किया जाए तो सरकारी उपलब्धियों के सवाल भी न्यायाधीशों से लोग नहीं पूछेंगे।
न्यायाधीश भी हमारे ही व्यवस्था का हिस्सा हैं और उनको अधिक से अधिक जनता के बीच में आना भी चाहिए ताकि वे जान सकें कि जनता के बीच नागरिक प्रशासन की, पुलिस की और स्वयं सरकार की उपस्थिति किस प्रकार की है और किस प्रकार से जनता का शोषण हो रहा है। लेकिन सरकार द्वारा लगाए जाने वाले शिविरों तक ही अगर न्यायाधीश अपने आप को सीमित रखते हैं तब उम्मीद नहीं होती कि वह जनता से जुड़े हुए मुद्दों को देख सकेंगे, छू सकेंगे, समझ सकेंगे और कुछ सोच सकेंगे कि कैसे चीजों को सुधारा जा सकता है।
फिलहाल बीते रोज बागेश्वर में जो शिविर लगा उस शिविर में सबसे अधिक भीड़ विकलांगों की थी हर विकलांग जो कई कारणों से अपने सर्टिफिकेट नहीं बना पाए हैं इस उम्मीद से आए थे कि उनका सर्टिफिकेट बन जाएगा या उनको कोई इमदाद सरकार की ओर से मिलेगी। लेकिन बहुत सारे विकलांग ऐसे थे जो अंतिम समय में कहते हुए सुनाई दिए कि उनको गांव से बुलाया गया लेकिन ना तो उनका परीक्षण किया गया है और ना ही उन्हें कोई सर्टिफिकेट तथा यन्त्र व संयन्त्र ही मिले।


