मनोविज्ञान ने यह प्रश्न उठाया कि आखिर आदमी है क्या?
तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के प्रसार ने आदमी की हैसियत को मझधार में डाल दिया है। उसके होने के अर्थ ही बदल गए हैं। वह मानो अपने ही अस्तित्व से विस्थापित हो गया है। आदमी तो जैसे कहीं खो गया है।
फ्रायड, युंग और एडलर ने मनोविज्ञान के माध्यम से मानव के अवचेतन का द्वार खोला। उन्होंने बताया कि मनुष्य के भीतर कितनी गांठें, वर्जनाएँ और दबी हुई इच्छाएँ छिपी रहती हैं। इन्हीं के बोझ तले वह जीवन भर स्वयं को घसीटता रहता है। अपनी प्रतिभा, अपने होने की आकांक्षा और अपनी स्वतंत्र चेतना को वह धीरे-धीरे खो देता है।
हम जीवन भर समाज द्वारा आरोपित अवसादों में जीते और मरते रहते हैं। तब मरने के बाद क्या फर्क पड़ता है कि हमें जलाया जाए, दफनाया जाए या गिद्धों के लिए छोड़ दिया जाए? यदि जीते-जी सोचने और प्रश्न करने की आज़ादी ही न हो, तो मृत्यु के बाद के संस्कारों का क्या अर्थ रह जाता है?
राजनीति, दरअसल, मानव के अवचेतन से खेलती है।
यहाँ धर्म और तकनीक का उपयोग करते हुए योजनाबद्ध ढंग से सत्ता को स्थापित करने का प्रयास दिखाई देता है। एक ऐसी व्यवस्था गढ़ने की कोशिश होती है जिसमें विरोध और वैचारिक विविधता के लिए स्थान कम होता जाए। लोकतांत्रिक प्रश्नों और स्वतंत्र चिंतन को हाशिए पर धकेला जाने लगता है।
क्या यही ईश्वर में विश्वास है?
हमारी शिक्षा-व्यवस्था भी कहीं न कहीं भीड़ के मनोविज्ञान का बाज़ार बनती जा रही है। मानसिक रूप से असंतुलित नेतृत्व जब समाज की चेतना को भ्रम और भय में धकेलता है, तब चतुर लोग आम आदमी के अवचेतन को कुरेदकर उसकी भावनाओं से खेलना सीख जाते हैं। परिणामस्वरूप पूरी दुनिया अस्थिर और अशांत होती चली जाती है।
राजनीति मानव के अवचेतन में पड़ी गांठों से अपना खेल खेलती है। जन्म लेते ही मनुष्य के अवचेतन को संस्कारों, पूर्वाग्रहों और विभाजनों से प्रदूषित किया जाने लगता है। केवल जीवित रहने की अंधी इच्छा ही कई बार मनुष्य के विनाश का कारण बन जाती है।
आज की राजनीति ने विश्व-राजनीति में शक्ति-संतुलन का एक नया समीकरण स्थापित कर दिया है।
भय कायम करो। स्कूल में डर, नौकरी में डर। आदमी को दूसरी दुनिया के सपने दिखाओ।
आदमी जीवन भर कंडीशनिंग के भीतर जीता है और अंततः उसी में मर जाता है।
अब विश्व-राजनीति को देखिए। हाल के अंतरराष्ट्रीय संघर्षों ने वैश्विक शक्ति-संतुलन को बदलकर रख दिया है। शीत युद्ध के बाद जो विश्व-व्यवस्था बनी थी, वह अब नए तनावों और प्रतिस्पर्धाओं के दौर में प्रवेश कर चुकी है। अमेरिका, ईरान, इज़राइल, रूस और चीन के बीच बदलते संबंधों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के पुराने समीकरणों को चुनौती दी है। महाशक्तियों के निर्णयों का प्रभाव केवल उनके अपने देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया उसकी कीमत चुकाती है। भारत जैसे देशों को भी अनेक बार जटिल कूटनीतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
इन बड़ी राजनीतिक घटनाओं ने विश्व-राजनीति का पूरा परिदृश्य बदल दिया है। महाशक्तियों के बीच टकराव, नेताओं की महत्वाकांक्षाएँ और युद्ध की घोषणाएँ पूरी दुनिया की दिशा बदलने की क्षमता रखती हैं। किसी भी व्यक्ति या नेतृत्व के अवचेतन में बैठी हुई ग्रंथियाँ कभी-कभी पूरी मानवता को संकट में डाल सकती हैं।
हम अपने मनोवैज्ञानिक अनुमान में स्वयं को कितना सहज मानते हैं? जबकि हमारी पूरी दिनचर्या हमारे अवचेतन की उन्हीं अदृश्य गाँठों से संचालित होती रहती है।
अब अपने पहाड़ को देखिए। हम स्वयं को भोला, सीधा और सरल समाज कहकर गर्व करते रहे हैं। हम कहते रहे कि उत्तराखण्ड देवभूमि है, यहाँ जातिगत विभाजन अपेक्षाकृत कम है। किंतु इतिहास और लोककथाएँ इस सरलता के भीतर छिपी अनेक सामाजिक विडंबनाओं की भी गवाही देती हैं। महिलाओं के साथ भेदभाव, विधवाओं के प्रति अमानवीय व्यवहार और संपत्ति से वंचित करने जैसी घटनाएँ हमारे सामाजिक इतिहास का हिस्सा रही हैं।
पहाड़ का जीवन अत्यंत कठिन था। संघर्ष इतने गहरे थे कि अनेक बार लोग निराशा और सामाजिक दबाव के कारण असाधारण त्रासदियों का शिकार हुए।
जातिगत भेदभाव भी समय-समय पर हिंसक रूप में सामने आता रहा है। आज भी ऐसी घटनाएँ देखने को मिलती हैं जहाँ जाति के कारण प्रेम, विवाह या सामाजिक संबंध हिंसा का कारण बन जाते हैं। यह प्रश्न उठता है कि हम वास्तव में किस दिशा में जा रहे हैं? मीडिया भी अनेक बार इन घटनाओं को केवल सनसनी के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि उनके पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों पर गंभीर विमर्श कम होता है।
समाज स्वयं अपने मानदंड बनाता है। जातिवाद हमारे अवचेतन में इतनी गहराई से बैठा हुआ है कि प्रगतिशील कहलाने वाले लोग भी कई बार उससे मुक्त नहीं हो पाते।
अब लोकतंत्र का अवलोकन कीजिए। क्या वास्तव में दुनिया में लोकतंत्र अपने आदर्श स्वरूप में मौजूद है? लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है; वह तर्क, संवाद, असहमति और वैचारिक स्वतंत्रता का तंत्र है। यदि विचार-विमर्श ही समाप्त हो जाए, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है।
यदि लोकतंत्र है, तो एक प्रभावी और स्वतंत्र विपक्ष भी होना चाहिए। जनता के सामने वास्तविक विकल्प होने चाहिए। यदि सभी राजनीतिक दल अंततः एक जैसी राजनीति करने लगें, तो लोकतंत्र का अर्थ सीमित हो जाता है। जब जनता के प्रश्नों का उत्तर देने के बजाय केवल भावनाओं का प्रबंधन किया जाए, तब लोकतंत्र अपनी आत्मा खोने लगता है।
राजनीति के बारे में कहा जाता है कि मैकियावेली आज भी जीवित है। उसने सत्ता की राजनीति में छल, शक्ति और रणनीति को महत्त्व दिया था। वहीं चाणक्य की नीति भी सत्ता-संतुलन और विभाजन की राजनीति का उल्लेख करती है। प्रश्न यह है कि क्या आधुनिक लोकतंत्र केवल सत्ता-प्राप्ति की तकनीक बनकर रह जाएगा, या वह जनकल्याण और नैतिक उत्तरदायित्व का माध्यम भी रहेगा?
हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि विकल्प लगातार सीमित होते जा रहे हैं। क्या समाज और राजनीति ने हमें बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता दी है? या हम जीवन भर केवल स्वीकृति और आज्ञाकारिता का अभ्यास करते रहे हैं—”हाँ सर, हाँ सर…”
जब राजनीतिक दल लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने हितों के अनुसार ढालने लगते हैं, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे तानाशाही की दिशा में बढ़ सकता है।
जनता भी हमेशा निष्पक्ष नहीं होती। वह अपने ही पूर्वाग्रहों, आशंकाओं और विभाजनों में उलझी रहती है। उसे कभी भय दिखाया जाता है, कभी मृत्यु का, कभी किसी शत्रु का। भय राजनीति का सबसे प्रभावी औजार बन जाता है।
इसी प्रकार के विचारों के बीच मनुष्य जीवन भर उलझा रहता है।
हाल के वर्षों में परीक्षा-पत्र लीक जैसी घटनाओं ने भी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जब प्रशासनिक संस्थाएँ भी पारदर्शिता बनाए रखने में असफल दिखाई देती हैं, तब समाज का विश्वास कमजोर होता है। कई बार जनाक्रोश को भी इस प्रकार नियंत्रित किया जाता है कि मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं और केवल घटनाओं का राजनीतिक उपयोग शेष रह जाता है।
आज साफ़ और स्वतंत्र मन वाला व्यक्ति कहाँ मिलेगा? लगभग हर व्यक्ति के अवचेतन में कोई-न-कोई गाँठ मौजूद है, जो उसके पूरे जीवन को प्रभावित करती रहती है।
विश्व-राजनीति में भी शक्ति-संतुलन निरंतर बदल रहा है। कभी सोवियत संघ का प्रभाव समाप्त हुआ, आज चीन एक उभरती हुई शक्ति के रूप में सामने है। अमेरिका, यूरोप और पश्चिम एशिया के बदलते संबंधों ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अनिश्चित बना दिया है।
ऐसी मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल से भरी इस वैश्विक चेतना का भविष्य क्या होगा? क्या यह दुनिया मानवीय चेतना को बचा पाएगी? कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित होते इस युग में मनुष्य कब तक अपने विवेक और स्वतंत्र सोच को सुरक्षित रख सकेगा?
हथियारों से लैस यह संसार कब तक भय के झूलों में झूलता रहेगा? और कब वह ऐसा समय देखेगा, जब मनुष्य फिर से शांति, संवेदना और जीवन के गीत गा सकेगा?
डॉ 0 प्रभात उप्रेती


