पहाड़ के पारंपरिक बीजों को बचाने के लिए यदि कोई योजना सरकार नहीं चला रही है तो यह पहाड़ का दुर्भाग्य ही

भारतवर्ष में कुछ प्रान्तों को छोड़ दें तो शेष भारत विभिन्न किस्म के धानों की खेती वाला भारत है। भारत के अंदर उत्तराखंड में पर्वतीय क्षेत्र का भूगोल भी विभिन्न किस्म के धान की फसलों का इतिहास अपने में संजोए रहा है।
जब भी हम उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र का इतिहास भूगोल अर्थव्यवस्था सामाजिक सरोकारों को तलाशने की कोशिश करते हैं तो एठकिंसन के गजेटियर के पन्ने अपने आप ही पलटने लगते हैं। एटकिंसन के गजेटियर के अनुसार उस दौर में जब एटकिंसन गजेटियर तैयार कर रहे थे तब ब्रिटिश कुमाऊं गढ़वाल में 48 प्रजातियों के लाल चावलों वाला धान बोया जाता था।

यह वह समय था जब पहाड़ों पर कृषि करने वाला कोई भी व्यक्ति भूमिहीन नहीं था। यही वह दौर भी था जब ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से कंपनियों का साम्राज्य उत्तराखंड में स्थापित तो हो चुका था लेकिन यहां की फसलों के बीजों पर आज की तरह कंपनियों का वर्चस्व स्थापित नहीं था।

वर्ष 1980-81 से पीछे मुड़कर जब हम देखते हैं तो पर्वतीय क्षेत्र में रासायनिक खादों और कंपनी के बीजों का कोई वर्चस्व नहीं था और ना उन रसायनिक खाद व दवाओं लिए कोई स्थान यहां था। उस दौर में विभिन्न किस्म के धानों के बीच संरक्षित रहते थे और बोए जाते थे।

तब के दौर के बहुत सारे बीज इतिहास बन चुके हैं या समाप्त हो चुके हैं। फिर भी कुछ बीज गांव वालों ने किसी तरह से बचा कर रखे ही हैं।

थापचिनी, जवाई,कर्पाव, साल,खजिया, बड़पासों, चम्याड़़, कत्यूर नामों के धानों के अलावा और भी कई किस्म के धान पहाड़ पर बोए जाते थे। विभिन्न लेखों, आलेखों, शोधों में शोधार्थियों और लेखकों द्वारा हमारे पारंपरिक धान बीजों के नाम संभाल कर रखे गए हैं जिन्हें आसानी से एकत्रित किया जा सकता है।

हमारे पाठकों ने अपने गांव में कई मौकों पर शिरौल खाए होंगे, जमाल धान को कूटने के बाद हलका भूनने कर शिरौल बनाए जाते हैं। च्यूड़ भी प्राय: उन सभी ने खाया ही होगा जो पहाड़ पर रहते हैं।

जिन घान के बीजों का जिक्र यहां किया गया है वे धान के बीच अब भले ही सीमित हो गए हैं या सिमट गए हैं लेकिन एक सुंदर इतिहास इन बीजों का रहा है। इन बीजों का इतिहास खत्म होने के बाद आज के दौर में हम सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान में 5 किलो राशन मुफ्त में पाने वाले नागरिक बन गए हैं । उस 5 किलो राशन में जो 2 किलो चावल हमें मिलता है वह किस धान का चावल होता है कोई नहीं बता सकता।

अभी जो धान की खेती पहाड़ पर शेष बची है उस खेती पर पूरी तरह से बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा तैयार किए जाने वाले बीजों का कब्जा करवा दिया गया है। वर्तमान समय में जो धान बीच के रूप में पहाड़ पर चढ़ाए जा रहे हैं उन बीजों में सनवा/ मदिरा वी एल 207 तथा आरपीआई 1 । उर्द 08, 09, 12, पैडी वीएल 88, पैडी 69, 70, 88, पूसा बासमती 1718 । रागी 379, 380, 400 अभी चलन में हैं। प्रत्येक तीन-चार साल के बाद धानों के बीजों और कंपनियों के नाम बदलते रहते हैं।

हमारे पुराने समय के पारंपरिक बीज रासायनिक खादों, रासायनिक दवाओं, कीटनाशकों के बूते पर नहीं बोए जाते थे, पूरी तरह से प्राकृतिक होते थे जिन्हें आज हम जैविक शब्द से पुकारते हैं।

वर्तमान समय में जो भी बीच पहाड़ पर चढ़ाए जा रहे हैं वे बीज सिर्फ एक फसल के लिए ही होते हैं। यदि कोई व्यक्ति गलती से इन बीजों की फसलों में से थोड़ा सा बीच बचा कर रख लेता है और अगले साल उस बीच को खेतों में बोता है तो खेतों में धान पैदा नहीं होता सिर्फ घास पैदा होती है।

पर्वती क्षेत्र में कंपनियों के जो बीज पहुंचाए जा रहे हैं उन बीजों को पहुंचाने का काम कंपनियां नहीं कर रही है बल्कि राज्य सरकार का कृषि विभाग कर रहा है। पहाड़ के हर सुधि किसान को एक सवाल सरकार से पूछना ही चाहिए कि क्या राज्य का कृषि विभाग हमारे पारंपरिक बीजों को बचाने के लिए कोई योजना परियोजना चल रहा है ? यदि ऐसी कोई योजना सरकार नहीं चला रही है तो यह पहाड़ का दुर्भाग्य ही माना जाना चाहिए।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x