लीती गाँव बिचला दानपुर का प्राचीन गाँव है। नन्दा अष्टमी पर गाँव के नन्दा देवी के मन्दिर में होने वाली पूजा बड़े मेले का रूप लेती है। उत्तराखण्ड में क्षेत्रीय मेलों का पारम्परिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्वरूप छरित हुआ है लेकिन लीती गांव ने अपने मेले के पारम्परिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्वरूप को बचा कर रखा है। इस पूजा के लिये ग्रामीण तीन दिन का पथारोहण कर नन्दा हिमनद पर स्थित नन्दा कुण्ड से ब्रह्म कमल के फूल लाते हैं। जो लोग देवी कुण्ड तक जाते हैं वे बताते हैं कि कुण्ड हिमालई क्षेत्र में है जो बहुत लुभावन है। देवी कुण्ड के अलावा हीरामणी ग्लेशियर के बारे में भी यहाँ के अनवाल दावा करते हैं कि यदि ठीक ठाक पैदल मार्ग बना दिये जायें तो बिचला दानपुर को साहसिक पर्यटन का हब बनाया जा सकता है। नामिक ग्लेशियर को जाने वाले पर्यटक मानते हैं कि बिचला दानपुर की तरफ से नामिक ग्लेशियर तक जाना अधिक सुगम है।
बिचला दानपुर में गोगिना गाँव पिथोरागढ़ के नामिक गाँव के ठीक सामने का गाँव है। दोनों गांवों के मध्य बह रही राम गंगा गांवों की विभाजन रेखा है। बागेश्वर से नामिक तक जाने वाले पथिक गोगिना से ही नामिक गाँव में प्रवेश करते हैं। बागेश्वर में पर्यटन व्यवसाय को बढ़ाने के लिये इस ओर ठोस ध्यान अभी तक नही दिया है।
वनों और वनस्पतियों का अध्ययन कर रहे छात्रों तथा शोध क्षत्रों के लिये धरम घर से शिखर पर्वत होते हुए खड़लेख शामा लीती रांतिर केठी गोगिना तक अद्भुत पथा रोहण बनता है। यह क्षेत्र हिमालयी मिश्रित सघन वनों का क्षेत्र है तथा राम गंगा नदी का उद्गम क्षेत्र भी है। पहाड़ पर जो पारम्परिक पशुपालन और पारम्परिक खेती हुआ करती थी वह इस क्षेत्र में अभी चलन में है।
बिचला दानपुर से लगे नाचनी में राम गंगा नदी पर कैकिंग का प्रयोग भी प्रारम्भ में ज्ञानधुरा कैम्प से ही किया गया। इस दिशा में व्यापक स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाये जा सकते हैं।
किसी भी क्षेत्र में पर्यटन व्यवसाय के लिये विभिन्न प्रकार के भोजन तैयार करने तथा गाइड का प्रशिक्षण जरूरी प्रषिक्षण है। सरकार को ऐसे प्रशिक्षण प्राथमिकता के आधार पर करवाने चाहिये।
शामा से भनार के बजैण मन्दिर के रास्ते से सनगाड़ के नौलिंग मन्दिर होते हुए शिखर के मूलनारायण मन्दिर तक धार्मिक पथा रोहण की सुरूआत की जा सकती है। इस पथा रोहण में रात्रि पड़ाव शिखर में किया जा सकता है।
बिचला दानपुर प्रवासी पक्षियों का एक पड़ाव भी है। यदि इस क्षेत्र में वर्डवाचिंग के प्रशिक्षण कार्यक्रम नियमित रूप से चलवाये जायें तो में पक्षियों को देखने का व्यवसाय भी खूब पनप सकता है। ऐसी पहल से वर्डवाचिंग का एक नया क्षेत्र पर्यटन के लिये खुल जायेगा।
पर्यटन व्यवसाय के लिये भारी भरकम आवासीय निर्माण जरूरी नहीं होता है। हवादार पर ठण्ड से बचाने वाले हट और जरूरत पड़ने पर अस्थाई टैण्ट लगाकर पर्यटक आवासीय स्थल बन जाता है। टैण्ट बनाना और लगाना भी एक कला है जिसका प्रशिक्षण इस क्षेत्र में दिया जाना चाहिये।

