बागेश्वर जनपद में फेणी नाग पर्वत, शिखर पर्वत और हरी नाग पर्वत के मध्य जो क्षेत्र फैला है उस क्षेत्र की आकृति नाग के फन का आकार बनाती है। इसी फनाकृति के बीच का भू-भाग नाकुरी कहलाता है।
शिखर पर्वत केि दक्षिणी भाग में काली नाग, पिंगई नाग, बेरीनाग, बासुकी नाग, धौली नाग, फेड़ी नाग, हरी नाग नाम से नाग मन्दिरों की एक श्रृंखला है। ये सारे नाग मन्दिर शिखर पर्वत से कम ऊँचाई पर स्थित हैं। शिखर पर्वत पर स्थित मूल नारायण मन्दिर सहित सभी नाग मन्दिरों में शिलाओं की पूजा होती हैधौलीनाग लिंग के रूप में स्थापित हैं ।
इधर दो तीन दशकों से कुछ मन्दिरों में मूर्तियाँ रख दी गई हैं लेकिन मुख्य पूजा शिलाओं की ही होती है। नागपंचमी पर इन मन्दिरों में छोटे बड़े मेले लगते हैं। इन सारे मन्दिरों में पर्यटकों की आवाजाही लगी रहती है। प्रादेशिक व राष्ट्रीय स्तर पर नाग देवताओं की इस श्रृंखला का नियोजित प्रचार प्रसार नही हो सका है जिस कारण नाग देवताओं को मानने वाले लोग यहाँ तक नही पहुँच पाते हैं।
बागेश्वर जनपद में धौलीनाग से फेणी नाग होते हुए हरी नाग पर्वत के बीच दो दिवसीय पथारोहण कार्य क्रम चलाया जा सकता है। इस पथ भ्रमण में फेणी नाग पर्वत से पातल, स्याकोट, जलमानी होते हुए मुहोली गाँव आना होगा। जलमानी से मुहोली तक खड़ी चढ़ाई पर बनी सीढ़ियों का पुरातन काल किसी को पता नही है। दन्तकथाओं में इन सीढ़ियों को पाण्डवों द्वारा बनाया गया बोला जाता है। चढ़ाई खत्म होने पर दो बड़े वृत्ताकार चबूतरे बने हैं। बड़े चबूतरे के चारों ओर बिरखम्ब गड़े हैं जो कत्यूरी शासनकाल से होने की ओर ध्यान खींचते ही है। वैसे ये बिरखम्ब कब से गड़े हैं किसने और क्यों गाड़े हैं पर पर पुरातन ज्ञाता ही कुछ बता सकते हैं। पर्यटन विभाग चाहे तो इस दिशा में सार्थक पहल कर सकता है।
इन चबूतरों से करीब एक किमी० की दूरी पर मुहोली में तीन शिवालयों का समूह है। बागेश्वर बैजनाथ और जागेश्वर के शिवालयों से भी मुहोली के शिवालयों का शिल्प अलग है। मुहोली का नौला और मूलनारायण मन्दिर के पुरातन पर बिलकुल भी काम नही हुआ है।
मुहोली में मौजूद शिल्प डेड़ हजार साल पीछे ले ‘ही जाते हैं। मुहोली के शिवालय से करीब एक किलो मीटर आगे सनेती इण्टर कालेज के समीप एक शिववालय और है इस शिवालय को टोटा शिवालय नाम से बोला जाता है। टोटा देवाल से करीब एक किमी० पर सनेती की नन्दा देवी का मन्दिर है। सनेती की नन्दा देवी की भी बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ प्रति दूसरे वर्ष नाकुरी का प्रख्यात नन्दा देवी का मेला लगता है। सनेती की नन्दा अष्टमी अलग-अलग गाँवों से आने वाली आरों (आरतियों) के लिये प्रख्यात है। आरतियों के अलावा सनेती के मेले में हुड़के की थापों पर गाई जाने चाली चाचरियों पर झूमने वाले चाचरियारों के चर्चे पूरे कुमाऊ में होते हैं। सनेती के मेले की आरतियाँ और चाचरियाँ ही तो हैं कि लोग नाकुरी को रंगीली नाकुरी भी कहते हैं।
सनेती से कुरोली बाफिला गाँव होते हुए सुरकाली गाँव पहुँचने पर वैष्णवी देवी का भव्य मन्दिर पड़ता है। इस मन्दिर से करीब दो किमी० पर हरीनाग फन फैलाये हुए मिलते हैं। इस पथारोहण में जगह जगह चाय नास्ते की दुकाने तो मिलती हैं पर रात्रि विश्राम के लिये सराय या होटल नही हैं। यदि यह भ्रमण कार्यक्रम वाहनों से किया जाये तो एक दिन में धौली नाग, फेणी नाग तथा हरी नाग मन्दिरों का भ्रमण किया जा सकता हैं।
पुरातन छात्रों या पुरातन जिज्ञासुओं के लिये नाकुरी पट्टी में आठवीं से बारहवीं शदी के पुरातन का बहुत बड़ा खजाना बिखरा पड़ा है। फेणीं नाग से हरी नाग के पथा रोहण में नाकुरी की पुरातन सभ्यता को देखने समझने का मौका शैलानियों को मिलता है। नाकुरी में सनेती मन्दिर से थोड़ा आगे चलकर एक स्थान है जहाँ से शिखर व संन्गाड़ के लिये मार्ग फटते हैं इस स्थान पर भी बिरखम्ब गड़ा हुआ है।
नाकुरी में ही हरतशिया का प्राचीन शिवालय भी है जिसका शिल्प अन्य शिवालयों से बिल्कुल अलग है।
नाकुरी में पचार का धोवी नौलिंग मन्दिर अलग किस्से कहानियों से जुड़ा है। धोबी नौलिंग के नौले को पवित्र नौला माना जाता है। इस नौले से सिर्फ नौलिंग देवता की पूजा के लिये ही पानी निकाला जाता है।
संन्गाड़ का नौलिंग मन्दिर नाकुरी का प्रख्यात मन्दिर है। यहाँ प्रति वर्ष राम नवमी को दिन-रात का मेला लगता है। मेला पशु बलि के लिये जाना जाता है, बलि सिर्फ बकरों की दी जाती है।




