साहसिक और धार्मिक पर्यटन का अनूठा संगम बागेश्वर

मनुष्य में उत्सुकता जन्मजात गुण है। इसी गुण के वशीभूत मनुष्य अपने चारों ओर के इतिहास, भूगोल, समाज, समाजान की संस्कृतियों को जानने समझने के लिये निकल पड़ता है। उत्तराखण्ड हजारों सालों से धार्मिक, साहसिक, प्राकृतिक पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है।

उत्तराखण्ड के बागेश्वर जनपद से पर्यटकों का रिश्ता काफी पुराना है। कत्यूर, कमस्यार, दुग, नाकुरी, खरही, तल्ला, मल्ला, बिच्चला दानपुर पट्टियों में फैले बागेश्वर जनपद में गुरु गोविन्द सिंह, एठकिन्षन, महात्मा गान्धी, अथाथो घुम्मक्कड़ जिज्ञासु राहुल सांकृत्यायन का बागेश्वर तक पहुँचना बागेश्वर का आकर्षण ही था। गान्धीजी को सवतन्त्रता संग्राम की कुली बेगार घटना ने आकर्षित किया तो बाबा राहुल सांकृत्यायन को कत्यूरी काल का निर्माण और सिलालेख यहाँ तक खींच लाये थे। बागेश्वर का बागेश्वरी चर्खा भी गान्धीवादी पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है।

विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना चुके पिण्डारी, सुन्दर ढुंगा, कफनी ग्लेशियरों को छूने के लिये हजारों पर्यटक हर साल बागेश्वर आते हैं और साहसिक पर्यटन करते हैं। आत्म शान्ति के लिये कौसानी का पर्यटन करना सैलानियों को बहुत भाता है। बिचला दानपुर में शामा, ज्ञानधुरा, पोंढुंगा और गोगिना मल्ला दानपुर में तप्त कुण्ड और सहस्रधारा, शम्भु बुज्ञाल, पिण्डारी, कफनी और सुन्दर ढुंगा कमस्यार में भद्र काली, नाकुरी में सन्गाड़ और शिखर (शिखर नाकुरी और बिचला दानपुर की भौगोलिक सीमा पर स्थित है) तक हजारों धार्मिक सैलानी आवागमन करते हैं। देश और विदेशों में अपना स्थान बना चुके इन ख्याति प्राप्त स्थलों के अलावा बागेश्वर में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये सैकड़ों धार्मिक, साहसिक, प्राकृतिक, ऐतिहासिक, पुरातन और शिक्षाप्रद स्थल और भी हैं।

हल्द्वानी से 176 किलो मीटर की यात्रा वाहन से करने के बाद बागेश्वर जिला मुख्यालय पहुँचा जाता है। सरयू और गोमती नदियों के संगम पर बसे बागेश्वर नगर का नाम बाघ के नाम से विकसित हुआ है।

बागेश्वर से 5 किमी० उत्तर में बालीघाट नामक स्थान पर सरयू नदी में लाहुर और पुंगर नदियों का संगम त्रिवेणी बनाता है। यदि बालीधाट से बागेष्वर के मध्य पाँच किमी० क्षेत्र में सरयू नदी में मिलने वाली जल धारायें बागेश्वर को पंचतरणी भी बनाती हैं। बागेश्वर नगर भीलेश्वर और नीलेश्वर पर्वतों के बीच बसा है। नीलेश्वर पर्वत पर चण्डिका के रूप में देवी विराजमान हैं। दोनों पर्वतों की तलहटी पर शिव शक्ति बागनाथ के रूप में धुनी जमाये हुए हैं।

बागेश्वर का बागनाथ शिवालय कत्यूरी काल की शिल्प धरोहर हैं। यहाँ सावन के महीने में पर्यटक विशेष पूजा-पाठ भी करते हैं। शिवालय परिसर में ही यहाँ की पुरातन मूर्तियों का संग्राहलय भी है जो पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहता है।

बाबा बागनाथ धाम के ठीक सामने पूर्व दिशा में त्रिजुगी नारायण का प्रचीन बैणी माधव मन्दिर है। बागेष्वर नगर में सरयू गोमती के संगम के स्नान का धार्मिक महत्व सरयू महात्म्य संहित कई धर्मिक पुराणों में वर्णित है।

नदी की घाटी में बसे और एक हजार मीटर की ऊँचाई को छू रहे बागेश्वर की विशेषता यह है कि यहाँ कई स्थानों से हिमालय की नन्दा चोटी के दर्शन होते हैं।

बागेश्वर धार्मिक नगरी है। सूर्य के दक्षिणायन पक्ष से उत्तरायण पक्ष में उतरने पर पड़ने वाली मकर संक्रान्ति पर बागेश्वर में सरयू गोमती के संगम पर स्नान को जीवन का पवित्र स्नान माना गया है। इस पवित्र दिन उत्तराखण्ड सहित देश के अनेक भागों से लोग बागेश्वर में पवित्र स्नान करने आते हैं। उत्तरायण पक्ष पर बागेश्वर में एक सप्ताह तक सांस्कृतिक और व्यावसायिक मेला लगता है। इस मेले में हाथ से बने ऊनी गलीचे, कालीन, लोइयाँ, हाथ से बनी लोहे की कढ़ाइयाँ, हिमालय के समीप के गाँवों में मिलने वाले कुत्तों के बच्चे, काँवर गाय की पूँछ, और हिमालयी जड़ी बूटियाँ, सुगन्धित जड़ियाँ, वन्य मसाले पर्यटकों को खूब आकर्षित करते हैं। मेले को अधिक आकर्षित बनाने के लिये मेला आयोजक निरन्तर प्रयास करते रहे हैं। मेले के उद्घाटन से पूर्व निकलने वाली झांकियाँ पर्यटकों को खूब भाती हैं। यह मेला सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक और व्यावसायिक सरोकारों के महासंगम के रूप में पर्यटकों को खूब भाता है।

पर्यटकों के लिये बागेश्वर महत्वपूर्ण पड़ाव है। यदि पर्यटक चाहें तो बागेश्वर में प्रातः का नास्ता करने के बाद मनकोट, काण्डा, विजयपुर, कमेड़ी देवी से धरमघर तक वाहन से यात्रा कर के आच्छादित वन क्षेत्रों का भ्रमण करने के साथ ही हिमालय की नन्दा पीक तथा पंचाचूली पीक को अलग अलग स्थानों से अलग अलग रूप में देख सकते हैं। इस वाहन भ्रमण में पर्यटक कोट मन्या स्थित कस्तूरा मृग विहार भी घूम सकते हैं। यह मृग विहार मिश्रित सघन वन क्षेत्र में है।

लेखन के क्षेत्र या पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले पर्यटकों के लिये 4-5 घण्टे के इस भ्रमण में जहाँ बहुत कुछ जाने समझने को मिलेगा वहीं कोटमन्या से ढाई कि० मी० पर कार्कीनगर में गान्धी वादी लेखिका समाज सेवी सरला देवी के आश्रम हिमदर्शन कुटीर में कुछ समय बिताने का मौका भी मिलेगा। सरला देवी का गान्धी जी के सानिध्य में आने से पहले का नाम कैथरीन मैरी हाइलामन था। सरला देवी ने पर्यावरण संरक्षण या विनाश तथा रिवाइव अवर डाइंग प्लानेट नामक ग्रन्ध कार्कीनगर के हिमदर्शन कुटीर में ही रहते हुए लिखे थे। बागेश्वर से धरम घर का भ्रमण करने के साथ ही पर्यटक चैकोड़ी तक घूम कर बागेश्वर लौट सकते हैं। पथिक चाहें तो लौटते समय बागेष्वर से करीब 10 कि0 मी0 पहले मनकोट में पर्वतीय गाँवों में बनने वाले डुबुक, जौले, टपकिया, पयो, भात का लुत्फ भी ले सकते हैं। बागेश्वर से मनकोट के मध्य करीब 8-10 किलो मीटर पर इस प्रकार के व्यन्जन बनाने और परोसने वाले साफ सुथरे और सस्ती दरों वाले होटल गांव वालों ने ही खोले हैं।

भोजन और कुछ समय आराम करने के बाद पर्यटक चाहें तो वाहन से एक घण्टे का सफर करके पन्द्रह पाली के समीप गौरी उड़ियार का भ्रमण कर सकते हैं। वैसे यह भ्रमण दूसरी रोज सुवह किया जाये तो पर्यटक सुबह का स्नान पवित्र गौरी कुण्ड में भी कर सकते हैं। गौरी उड़ियार प्राचीन काल से ही तप स्थली के रूप में जाना जाता रहा है। अभी भी गाहे बगाहे साधू सन्त गौरी अडियार में अल्प कालीन तप करने के लिये यहाँ प्रवास करते हैं। गौरी उडियार छोटी सी गुफा है। इस गुफा के अन्दर प्रकृति का जो सुन्दर रचना संसार है उस रचना को सैलानी एकटक हो देखते रह जाते हैं। शिव लिंगों, कुण्डों, देवताओं की आकृतियों से अछी गछी इस गुफा में देवी के गौरी रूप की उपस्थिति मानी जाती है। गौरी उडियार की तस्वीरें आगे के पृष्ठों में अलग से दिखाई गई हैं।

गौरी उडियार से लौटने के बाद सूर्यास्त काल में पर्यटक चण्डिका पर्वत पर स्थित चण्डिका देवी के दर्शन करने के बाद बागेश्वर जिला मुख्यालय होते हुए अपने प्रवास स्थल में पहुँच सकता है। चण्डिका पर्वत से बागेश्वर तथा मण्डल सेरा की रमणीयता पर्यटकों को काफी भाती है। चण्डिका से आगे जिला मुख्यालय होते हुए जब पर्यटक बागेश्वर नगर में उतरते हैं तो सरयू नदी के दोनों किनारों पर फैले गागेश्वर और दूर पर फैली हिमालय की लम्बी श्रंखला को देखने का लाभ उठा सकते हैं।

बागेश्वर नगर से एक दिवसीय लघु पथा रोहण करके कुकड़ा मईया शिखर पर भी पर्यटक घूम सकते हैं। मान्यता है कि कुकड़ा मइया का आशीर्वाद साक्षात होता है। कुकड़ा मइया से दिखने वाले विहंगम दृश्य पथिकों को खूब भाते हैं।

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