आज के बागेश्वर जिले में भले ही कत्यूर पट्टी कुछ ग्राम पंचायतों की एक पट्टी है लेकिन सातवीं सताब्दि से पन्द्रहवीं सताब्दी तक कत्यूर पट्टी कत्यूरी राजाओं की राजधानी रही है। यही बजह है कि कुमाऊ के इतिहास की जानकारी रखने और चाहने वालों, ऐतिहासिक तथ्यों की खोज करने वालों और पुरातन सभ्यता की जानकारी रखने और चाहने वालों को कत्यूर प्राचीन काल से ही अपनी ओर आकर्षित करता रहा है।
कोट भ्रामरी का मन्दिर, आदिबद्री नाथ का मन्दिर व मन्दिर के शिलालेख, बैजनाथ का शिवालय समूह, कमल तालाब, तैलीहाट के मन्दिर, तैलीहाट में मौजूद शिलालेख तथा हिमालय की सुन्दर छटाओं के दर्शन, लहलहाती हुई कृषि पट्टी कत्यूर क्षेत्र की ऐसी ऐतिहासिक व प्राकृतिक धरोहरें हैं कि इस क्षेत्र में पर्यटक खुद व खुद खिंचे चले आते हैं।
बागेश्वर जनपद में बैजनाथ ऐसा पड़ाव है जहां से हरिद्वार ऋशिकेष, देव प्रयाग, केदार नाथ, बद्रीनाथ व हेमकुण्ड साहिब के लिये मोटर मार्ग मुड़ता है तो बैजनाथ से ही कौसानी होते हुए अल्मोड़ा व रानीखेत राम नगर, हल्द्वानी का मोटर मार्ग कटता है तथा बागेश्वर होते हुए पिण्डारी ग्लेशियर, कफनी ग्लेशियर, सुन्दर ढुंगा, नामिक ग्लेशियर, बेरीनाग, पिथौरागढ़ का रास्ता भी बैजनाथ से खुलता है। बैजनाथ में ही कत्यूरी काल का शिल्प बैजनाथ शिवालय समूह और तैली हाट में सत्य नारायण और राक्षल देवता के नागर शिल्प के पुरातन मन्दिर भी है। बैजनाथ शिवालयभारत के उन चन्द शिवालयों में सुमार है जहां शिव लिंग के साथ पार्वती की मूर्ति विराजमान है। काले पत्थर पर तराशी गई पार्वती की मूर्तिपर्यटकों को खूब भाती है ।
बैजनाथ के समीप ही ग्वालदम मोटर मार्ग पर डंगोली पड़ाव है। डंगोली पड़ाव कोट भ्रामरी देवी के मन्दिर और यहाँ लगने वाले दो दिवसीय नन्दा अष्टमी मेंले के लिये प्रख्यात है। उत्तराखण्ड में प्रति बारह वर्षों में चलने वाली राज जात में सामिल होने वाली कुमाऊ की टोलियों का एक महत्वपूर्ण पड़ाव कोट भ्रामरी मन्दिर है । इस मन्दिर में भ्रामरी देवी के साथ ही नन्दा देवी की मूर्ति भी विराजमान है। मन्यता है कि यहाँ कत्यूरी राजाओं का किला हुआ करता था।

गरुड़ के गढ़सेर गाँव में चैदहवीं सदी में बनाया गया बद्रीनाथ मन्दिर अपने शिलालेखों के लिये जाना जाता है। इस मन्दिर में विष्णु प्रतिमा चार बाजुओं वाली है। मन्दिर का इतिहास यहाँ हर कोई बता देता है।
कत्यूर के प्रचीन और प्रमुख गाँवों में तैलीहाट गाँव सुमार है। बैजनाथ मन्दिर से थोड़ा चलकर इस गाँव में पहुँचा जाता है। कत्यूरी शासन काल में राज सत्ता की चहलकदमी का केन्द्र स्थल यह गाँव रहा था। कत्यूरी राजाओं ने नगरों, मन्दिरों, नौलों का निर्माण करवाया था। तैलीहाट में नागर सभ्यता का शिल्प यहाँ के मन्दिरों और चबूतरे के रूप में विद्यमान है। मन्दिरों की मूर्तियाँ पुरातन विभाग ने अलग-अलग स्थानों में रखवा दी हैं सिर्फ मन्दिरों के भवन ही तैली हाट में मौजूद हैं । यदि मन्दिरों में मूर्तियाँ भी रखी होती तो बैजनाथ शिवालय समूह की तरह यहाँ भी धार्मिक पर्यटकों का आगमन बना रहता।
कत्यूर घाटी हिमालय की अद्भुत छटाओं के अलावा सुहाने मौसम और यहाँ की उपजाऊ जमीन के लिये भी प्रख्यात है।




