साहसिक और प्राकृतिक रुचि वाले पर्यटकों के लिये आपार सम्भावनाओं से अछा-गछा है बागेश्वर जिले का मल्ला दानपुर

मल्ला दानपुर हिमालय का निकटस्त का भू-भाग है। पशुपालन और कृषि यहाँ का मुख्य आर्थिक आधार है। हिमालयी रामदाना और उगल की दुर्लभ होती जा रही खेती यहाँ उपजाई जाती है। सांस्कृतिक अनुष्ठानों से भरपूर मल्ला दानपुर अपनी परम्पराओं को बखूबी सहेजे हुए है।

विश्व-विख्यात पिण्डारी, कफनी और सुन्दर ढुंगा ग्लेशियर मल्ला दानपुर को मिली प्राकृतिक विरासत हैं। हिमालय की संरचना को देखने-समझने की मनुष्य की इच्छा ही है कि लोग बीहड़ से बीहड़ मार्गों की परवाह किये बिना हिमनदों तक पहुँचते आये हैं। शैलानियों के रूप में पिण्डारी ग्लेशियर तक पहुँचने का सिलसिला ब्रिटिश काल में शुरू हो गया था। वर्तमान में देश की पर्यटन व्यवसाय की कई कम्पनियाँ पिण्डारी तक पर्यटकों को घुमाने के काम से जुड़ी हैं। इन कम्पनियों में कुमाऊ मण्डल विकास निगम भी पिण्डारी तक पर्यटकों को लाने का व्यवसाय करता हैं।

पिण्डारी हिमनद तक पहुँचने का प्राचीन मार्ग सोंग से लोहार खेत, धाकुड़ी होते हुए खाती गांव तक पहुँचने का था । अभी खाती गांव तक मोटर मार्ग पहुंचने के साथ ही प्राचीन पैदल पथ पर पथारोहण वाले पथिक ही दिखाई देते हैं। पैदल चलने के उत्सुक पथिकों के लिये धाकुड़ी कैम्प 2680 मीटर पर है। धाकुड़ी से 8 किमी० पर 2246 मीटर पर खाती पड़ाव है।

खाती से आगे 11 किमी० आगे 2592 मीटर पर द्वाली कैम्प है। द्वाली से 5 किमी० आगे 3200 मीटर पर फुरकिया है। फुरकिया से 7 किमी० आगे 3750 मीटर पर पिण्डारी हिमनद का जीरो पोइण्ट है। पिण्डारी ग्लेशियर की बड़ी खूबी यह है कि पिण्डारी तक पहुँचना अन्य ग्लेशियरों की बनिस्पत काफी सरल है।
साहसिक पर्यटन व्यवसाय की कई सम्भवनायें मल्ला दानपुर में हैं। क्षेत्रीय लोगों के लिये स्थाई रूप से पर्यटन व्यवसाय की तकनीकि के शिक्षण प्रशिक्षण का कोई इन्तजाम सरकार ने नहीं किया है। क्षेत्रीय लोग बाहरी पर्यटन व्यवसाइयों के व्यवसाय पर ही निर्भर हैं। कई गाँवों में पेइंग गैस्ट व्यवसाय भी लोगों ने शुरू किये है।

मल्ला दानपुर में सरयू नदी के उद्गम क्षेत्र में भद्र तुंगा और सहश्रधारा में धार्मिक पर्यटन व्यवसाय बढ़ाने के लिये कई नौजवान प्रयास कर रहे हैं । नौजवानों के प्रयास में सबसे बड़ी समस्या यही है कि देश दुनिया से पर्यटकों को यहाँ तक लाने में क्षेत्रीय लोगों को कैसे महारथ मिले। अभी तक पर्यटकों को यहाँ तक लाने का मुख्य काम प्रदेश, देश और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के पर्यटन व्यवसायियों के ही कब्जे में ही है।

स्वतः स्थापित पर्यटन स्थलों के अलावा अन्य नई सम्भावनाओं पर मल्ला दानपुर में ठोस काम नही हुआ है। मल्ला दानपुर के समाज में स्थापित धार्मिक यात्राओं के सहारे कई नये कुण्डों, सहायक ग्लेशियरों, बुग्यालों तक पहुँचा जा सकता है। दानपुर में बकरी पालन का काम बड़े स्तर पर होता है। बकरी पालकों के अनवालं हिमालय, हिमालय के तालाबों, बुग्यालों और मार्गों के सबसे पहले और सबसे बड़े जानकार होते हैं। इन अनवालों के ज्ञान के सहारे मल्ला और बिचला दानपुर में पथा रोहण के लिये दर्जनों नये स्थल खोजे और तैयार किये जा सकते हैं।

विश्वविद्यालयों में आपदा, भू-गर्भ विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, वनों और नदियों के अध्ययन से जुड़े आचार्यों-प्राचार्यों की सहायता लेकर मल्ला दानपुर व बिचला दानपुर को इन विषयों के छात्रों के लिये खुली प्रयोगशाला आसानी से स्थापित किया जा सकता है। ऐसी स्थापना के बाद क्षात्रों के रूप में पर्यटकों की बड़ी संख्या खुद ही दानपुर पहुँचने लगेगी।

बागेश्वर जनपद में पिण्डारी का नाम पर्यटन के छेत्र में विश्वव्यापी तो है पर कुआरी, बदियाकोट, सोराग, झूनी, और गांसी गाँवों को केन्द्र में रखकर कई महत्वपूर्ण पथारोहण पथ, छुपे हुए कुण्डों और बुग्यालों तक आसानी से बागेश्वर के पर्यटन मानचित्र में जोड़े जा सकते हैं।

बदिया कोट और सोराग के नौजवान चाहें तो अपने भेड़ पालन के लिये उपयोगी शम्भू बुग्याल को अपने क्षेत्र का अति कमाऊ पर्यटन स्थल बना सकते हैं। शम्भू बुज्ञाल तक अति जिज्ञासु पर्यटक जाते भी रहते हैं। सोराग, शमडर, कुआरी, बोर बलड़ा और बदियाकोट के भेड़ पालकों की आवाजाही शम्भू ग्लेशियर तक नियमित होती रहती है।

यदि राज्य सरकार या केंद्र सरकार कुछ 100 करोड रुपए का बजट एक अच्छी योजना के तहत स्वीकृत कर दे तो मल्लादनपुर में सुंदर दूंगा क्षेत्र भारत में सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित किया जा सकता है । सुंदर दूंगा तक पहुंचने के लिए खाती से 7 किलोमीटर दूरी पर जातोली गांव है। जातोली गांव के आगे फिर आबादी क्षेत्र समाप्त हो जाता है। जातोली से करीब 12 किलोमीटर आगे कठलिया पड़ता है।

सुंदर दूंगा परिक्षेत्र में कठलिया एक ऐसा पड़ाव है जहां से एक मार्ग 12 किलोमीटर आगे मैकतोली के लिए कटता है। दूसरा मार्ग सुखराम ग्लेशियर के लिए कटता है और तीसरा मार्ग देवीकुंड तक पहुंचाता है।

जातोली से आगे रास्ते बहुत अच्छे नहीं हैं यही वजह है कि सिर्फ अति साहसी पर्यटक की आगे को बढ़ते हैं। यदि जातोली से कठलिया के बीच में कुछ स्थानों पर खड़ी चट्टानों से हो कर गुजर रहे मार्ग को चैड़ा कर दिया जाए तो कठलिया तक हर कोई पर्यटक आसानी से पहुंच सकेगा।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x