किसी ने मुझसे कहा, अल्मोड़ा चलो। पर भीमताल-हल्द्वानी रोड की दुर्दशा यात्रियों से जानकर हिम्मत बोल गई। वही जाम, बाबा के कैंची धाम का—छह-छह घंटे का।
भूस्खलन हिमालय में एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। नदी किनारे रोड बनाओगे तो सैंड स्टोन की चट्टानें मिलेंगी, जो कच्ची हैं।
अंग्रेज़ों के जुल्म, उनकी ईस्ट इंडिया कम्पनी का राग छोड़ो, पर उनमें दिमाग तो था ही। उन्होंने जब हल्द्वानी-नैनीताल रोड बनाई, तो समझ से बनाई। हम चील चक्कर मोड़ की गाथा कहते तो अभिभूत हो जाते। नैनीताल जैसी भारी बारिश में वह कभी नहीं टूटी।
अब तो खैर, गुलाब घाटी में मलुवा ही मलुवा है। उसका गर्मा-गर्म हलुवे का ठेकेदारों के लिए जलुवा ही जलुवा है। इसीलिए अंग्रेज़ों ने अल्मोड़ा-क्वारब की तरफ से रोड नहीं बनाई। उनके सर्वे में यह कच्चे भूस्खलन और सैंड स्टोन का मामला था। इसलिए रानीखेत से होकर ही अल्मोड़ा रोड जाती थी, आज भी उस रोड में एक भूस्खलन तक नहीं मिलेगा।
चलो, आज़ादी के बाद फिर क्वारब से भी रोड बनी, पर चौड़ीकरण का भूत—आर्मी की सुरक्षा के नाम पर—ऐसा सवार हुआ कि ठेकेदारी और नोटों के लिए प्रशासकों व तकनीशियनों पर ऐसा छाया कि पेड़ बेदर्दी से काटे गए।
हमारी वर्तमान शिक्षा क्राइम है। बच्चों के सिलेबस से प्रकृति और जंगल का चैप्टर ही फाड़ दिया गया है। गढ़वाल से लेकर कुमाऊँ तक ऐसी ब्लास्टिंग हुई कि सारा हिमालय, पहाड़ काँप गया। जोशीमठ दरक गया। कलियासौड़, व्यासी, क्वारब—सब परमानेंट भूस्खलन के क्षेत्र हो गए। खूब मलुवा आया, नदी में फेंक दिया गया। अरे, चंडीगढ़ की सड़क देखिए। खूब चौड़ी है, पर पेड़ बचाकर बनाई गई है। क्या यह तकनीक उत्तराखंड सरकार के पास नहीं है? कोई संगठन नहीं है जो तीन साल से बर्बाद कुमाऊँनी प्रवेश द्वार—हल्द्वानी, भीमताल, कैंची, अल्मोड़ा रोड—की दुर्दशा पर आंदोलन कर सके!
हद ही हो गई। कैंची धाम के भक्तों के नाम पर यह दुर्दशा है कि छह-छह घंटों का जाम यात्रियों को झेलना पड़ता है। अब तो सुना है, बर्बाद करने के लिए अच्छी-खासी रानीखेत रोड की भी बारी आने वाली है। उसका भी चौड़ीकरण होने वाला है। बाबा, बहुत हो गया। यह सब कोई चमत्कार पेंडिंग नहीं था।
गढ़वाल में कभी हम जब जीएमओयू से आते थे, तो कलियासौड़ पर ठिठक जाते थे। अब कुमाऊँ में वह क्वारब बन गया है। कभी तीन घंटे का सफर, अब छह घंटे का। क्या है यह उत्तराखंड प्रशासन, सरकार? जिसे हमने “कोदा-झंगोरा खाएँगे, उत्तराखंड बनाएँगे” के नारे लगाकर, गला फाड़-फाड़कर पाया था। कद्दू बनाएंगे, तुमसे 10 साल से हल्द्वानी-अल्मोड़ा सड़क तो बनवाई नहीं जा रही। सारा प्रशासन इसका अल्टरनेटिव निकाल नहीं पाया। वीकएंड कहकर भरमाया। यही नहीं कर पा रहे, हाँक रहे हो ईरान-तूरान की!
-डाॅ. प्रभात उप्रेती

