पंचायत राज व्यवस्था की जितनी अधिक उपेक्षा उत्तराखंड में राजनैतिक दल और सरकारें कर सकते हैं कर रहे हैं

गांवों को उनकी अपनी सरकार सौंपने का जो स्वप्न राजीव गांधी ने देखा था वह स्वप्न वास्तव में बहुत अधिक सुंदर था। संविधान में जो संशोधन किया गया उस संशोधन की भाषा परिभाषा काबिले तारीफ थी, लेकिन जब पंचायती राज को जमीन में उतरा गया तो वे प्रांत जहां कांग्रेस की सरकारें थी ने पंचायती राज को जितना अधिक कमजोर किया जा सकता था कमजोर करने के तोड़ वहां की सरकारों ने निकाले। जब राज्यों में कांग्रेस की सरकारें ही पंचायती राज को कमजोर करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही थीं तो भारतीय जनता पार्टी की सरकारों से क्या उम्मीद की जा सकती थी। जहां कम्युनिस्ट सरकारें थीं वहां कम्युनिस्टों ने पंचायती राज को जमीन पर उतारने के लिए निश्चित रूप से ईमानदारी भी बरती और पारदर्शिता भी ।

उत्तराखंड में पंचायती राज को मजबूत स्वरूप तब दिया जा सकता था जब पंचायत राज एक्ट बना था। उत्तराखंड में शुरुआती दौर में पंचायत राज एक्ट था ही नहीं। वर्ष 2016 में हरीश रावत ने मुख्यमंत्री रहते हुए पंचायत राज एक्ट बनाया तो सही लेकिन एक ऐसा एक्ट प्रदेश के हवाले किया जिस एक्ट में हर कदम पर कोशिश की गई है कि पंचायत पर किसी भी प्रकार से प्रशासन का वर्चस्व बना रहे।
पुख्ता प्रमाणों के साथ कहा जा सकता है कि इतना अधिक हल्का-फुल्का पंचायत राज एक्ट उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार ने उत्तराखंड के ग्रामीण समाज को थमाया है कि पंचायत में वह क्रांतिकारी परिवर्तन संभव है ही नहीं जैसा परिवर्तन राजीव गांधी चाहते थे।

हांडी में भात कच्चा है या पका यह परखने के लिए सिर्फ चावल का एक दाना ही दबा कर देखा जाता है। इसी सूत्र के आधार पर उत्तराखंड में पंचायतों की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण इकाई जिला पंचायतों की स्थितियों परिस्थ्तिियों को देखा जाए तो बागेश्वर की जिला पंचायत ऐसी जिला पंचायत है जिसका अपना दफ्तर भी नहीं है। बागेश्वर में कुली बेगार आंदोलन के एकमात्र साक्ष्य के रूप में मौजूद डाक बंगला ही जिला पंचायत द्वारा अपने कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

चार वर्ष पूर्व अपर मुख्य अधिकारी के रूप में नियुक्त राजेश कुमार के तबादले के बाद बागेश्वर में तैनात डीपीआरओ सुंदरलाल को अपर मुख्य अधिकारी का प्रभार सांेपा गया। प्रभार सौंपे जाने के कुछ महीनो के बाद सुंदरलाल का सेवा काल समाप्त होते ही सुंदरलाल के स्थान पर पहुंचे दूसरे डीपीआरओ वसंत कुमार को बागेश्वर जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी का प्रभाव सौंप दिया गया। कुछ महीनों के बाद बसंत कुमार के सेवा मुक्त होने के बाद जिला पंचायत बागेश्वर में ही कार्यरत एक अवर अभियंता सत्य प्रकाश कोटियाल जिनके पास जिला पंचायत बागेश्वर में अवर अभियंता के साथ ही मुख अभियंता तथा कनस्टि अभियन्ता का चार्ज भी था को जिला पंचायत में अपर मुख्य अधिकारी का प्रभार सौंप दिया गया। कुछ महीनों के बाद कोटियाल स्वास्थ्य की वजह से लंबी छुट्टी पर चले गए तब बागेश्वर के उद्यान अधिकारी को अपर मुख्य अधिकारी का प्रभार दे दिया गया। कुछ महीनों के बाद उद्यान अधिकारी का सेवाकाल समाप्त होने के बाद यहां तैनात अभियंता अनिल जोशी को अपरमुख्य अधिकारी का प्रभार सोपा गया। इसी महीने अपर मुख्य अधिकारी जोशी की पूर्णकालिक अपर मुख्य अधिकारी पद पर प्रोन्नति होने के साथ ही बागेश्वर से तबादला हो गया। श्री जोशी के तबादला होने के बाद से अब तक अपर मुख अधिकारी का पद खाली पड़ा है।

यहां बता दिया जाए की बागेश्वर जिला पंचायत में कार्य अधिकारी, कनिष्ठ अभियंता, अभियंता तथा अपर मुख्य अधिकारी के पद पर कोई भी नियुक्ति नहीं है। इस स्थिति पर कहा ही जा सकता है कि किसी जिला पंचायत की इससे अधिक अपेक्षा और क्या की जा सकती है।

यहां यह भी बता दिया जाए की जनपदों में जिला पंचायत तथा नगर पंचायत के चुने गए सदस्यों से जिस जिला नियोजन समिति का गठन होता है उस नियोजन समिति का प्रदेश में चुनाव ही अभी तक चुनाव आयोग द्वारा नहीं करवाया गया है। जब नियोजन समिति के सदस्यों का चुनाव ही नहीं करवाया गया है तब जिला योजना से सम्बन्धित बैठकें कैसे बुलाई जा सकती हैं। ऐसे में जब जरूरी बैठकें ही नहीं बुलाई जा सकती हों तब जनपद में पंचायत राज और ग्रामीण विकास कितना अधिक प्रभावित हो रहा होगा का अंदाज हमारे पाठक लगा सकते हैं।

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