ठीक उस समय पर जब हम जंगलात के आंदोलन से जुड़े तिलाड़ी के ऐतिहासिक आन्दोलन की शहादत को याद कर रहे हैं तब पौड़ी जनपद के वनाधिकारी द्वारा राजशाही अन्दाज में ग्रामीणों को जेल भेजने का बयान दे कर हमारे समाज के जख्मों पर नमक मिर्च छिड़कने का काम किया है।
वन अधिकारी महोदय तथा उत्तराखंड की धामी सरकार को याद रखना चाहिए कि उत्तराखंड के इतिहास में तिलाड़ी को याद करने का मतलब है, प्रतिकार की एक सशक्त धारा को याद करना। एक ऐसे समय और व्यक्तियों को भी याद करना जो अपनी थाती को बचाने के लिये लड़ने और सच के साथ खड़े होने की ताकत से भरे हैं। उत्तरकाशी की यमुना घाटी में स्थित बडकोट के पास है तिलाड़ी का मैदान है।
टिहरी रियासत ने जनता के जंगलों के हक-हकूकों को छीनने के लिये दमनकारी नीतियों का सहारा लिया था। इसके खिलाफ जनता तिलाड़ी के मैदान में रणनीति बनाने के लिये सभा कर रही थी। लोगों का गुस्सा भी बढ़ रहा था। दमनकारी नीतियों, नौकरशाही, बेगार, बढ़े हुए करों से भी यह क्रोध जुड़ा था।
तिलाड़ी के शहीद (30 मई, 1930)
- अजीत पुत्र काशी सिंह
- झूना सिंह पुत्र खड़ग सिंह
- गौरू पुत्र सिनकया
- नारायण सिंह पुत्र देबू सजवाण
- भगीरथ मिस्त्री पुत्र जुल्मू
- हरीराम पुत्र रूपराम
तिलाड़ी के आंदोलनकारी (जेल में शहीद)
- गुन्दरू पुत्र सागरू
- गुलाब सिंह ठाकुर
- ज्वाला सिंह पुत्र जमना सिंह
- जमन सिंह पुत्र लच्छू
- दिला पुत्र दलपति
- मदन सिंह
- लुदर सिंह पुत्र रणदीप



