उत्तराखंड में बागेश्वर जनपद के बागेश्वर नगर की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान 100 वर्षों तक कुली बेगार के खिलाफ अनवर चले आंदोलन के अहिंसक तरीके से सफल होने के साथ जुड़ी हुई है।
मनुष्य को गुलाम बनकर काम करवाने का ही एक क्रूर रूप कुली बेगार व्यवस्था भी थी। उत्तराखंड में ब्रिटिश हुकूमत को कुलियों से बेगार करवाने की व्यवस्था गोरखों से उपहार के रूप में मिली थी। तमाम ऐतिहासिक दस्तावेजों से प्रमाण मिलते हैं कि कुली बेगार की शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ 1822 के बाद से ही छोटे छोटे स्तर पर विद्रोह शुरू हो चुके थे।
वर्ष 1916 में कुमाऊं परिषद ने गठन के बाद कुली बेगार व्यवस्था के खिलाफ अलग-अलग टुकड़ों में चल रहे आंदोलन को एक स्वरूप में लाने का काम कुमाऊं परिषद ने किया और वर्ष 1921 में बागेश्वर नगर में सरयू नदी के तट पर लगने वाले मकर संक्रांति मेले के अवसर पर दस हजार लोगों की भीड़ के साथ थोकदारों द्वारा कुली बेगार प्रथा के रजिस्टरों को सरयू नदी में प्रवाहित करने के साथ ही इस शोषणकारी प्रथा का अंत कर दिया गया।
जब महात्मा गांधी को बताया गया कि बागेश्वर में वहां के लोगों ने अहिंसात्मक तरीके से कुली बेगार प्रथा का अंत कर दिया है तब गांधी जी ने कहा था कि वे बागेश्वर जरूर जाएंगे। 1929 में गांधीजी बागेश्वर आए भी थे।
कुली बेगार आंदोलन की सफलता का एकमात्र साक्ष्य बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर बना हुआ वह डाक बंगला है जिस डाक बंगले की ओर 13 जनवरी 1921 को संकेत करते हुए आंदोलन के नेता बद्री दत्त पांडे ने कहा था कि “वहां उस डाक बंगले में कमिश्नर डायबलिस टिके हुए हैं और कुछ सरकार परस्त लोग भी वहां मौजूद हैं जो छल कपट करके आंदोलन को कुचल देना चाहते हैं, चाहे मेरे टुकड़े-टुकड़े ही क्यों न कर दिये जाएं या मुझे गोली ही क्यों ना मार दी जाए पर मैं इस आंदोलन को झुकने नहीं दूंगा।” बद्री दत्त पांडे के इस भाषण के बाद वहां मौजूद दस हजार लोग आंदोलन के समर्थन में सीना तान कर खड़े हो गए थे।
उस जन सभा के साथ ही आंदोलन में रजिस्टर लेकर पहुंचे थोकदारों द्वारा कुली बेगार के रजिस्टरों को सरयू नदी में बहा दिया गया। दूसरे दिन 14 जनवरी को आंदोलनकारी श्री हरगोविंद पन्त, श्री बद्रीदत्त पांडे और श्री चिरंजी लाल को डाक बंगले में बुला कर आंदोलन वापस लेने के लिए दवाब डाल गया लेकिन आंदोलनकारी टस से मस भी नहीं हुए। दो दिनों की इन दो घटनाओं के प्रमाण तब छपने वाले शक्ति समाचार पत्र मैं प्रकाशित खबरों के अलावा अल्मोड़ा पुलिस डिपार्टमेंट की फाइल 1151/1921 मैं मौजूद हैं।
1929 मैं जब गांधी जी बागेश्वर में पहुंचे तब उन्होंने भी इसी डाक बंगले में प्रवास किया था के साक्ष्य चनौदा गांधी आश्रम में मिले थे। स्वतंत्र भारत में इस ऐतिहासिक डाक बंगले को तोड़ कर भव्य व्यवसायिक भवन बनाने के कई प्रयास तो हुए लेकिन जनता के विरोध के बाद उन प्रयासों को रोकना पड़ा है।
पूर्व में इस डाक बंगले को इसी स्वरूप में संरक्षित रखने के लिए चले आंदोलन के साथ हुए एक समझौते के अनुसार जिला पंचायत बागेश्वर इस डाक बंगले को कुली बेगार आंदोलन के प्रतीक साक्ष्य के रूप में संरक्षित करेगी। वर्तमान में इस डाक बंगले में जिला पंचायत का कार्यालय चलता है। पूर्व सदन में पारित प्रस्ताव के अनुसार वर्तमान सदन इस डाक बंगले की मरम्मत भी करवा रहा है।
