हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी ग्रीष्मकाल लगते ही संपूर्ण उत्तराखंड में पेयजल के लिए त्राहिमाम करती हुई लंबी-लंबी लाइने लग ही रही हैं। पेयजल के लिए तैनात सरकारी महकमे हर संभव कोशिश में लगे रहते हैं कि पेयजल समस्या ना हो लेकिन पेयजल व्यवस्था है कि समस्या ग्रस्त बनी हुई ही है।
उत्तराखंड में जब हम छोटी उत्तर प्रदेश के रूप में पृथक राज्य नहीं बने थे और यहां पर सरकारी नियंत्रण उत्तर प्रदेश के हाथ में था तब भी पर्वतीय क्षेत्र के गांवों में पेयजल उपलब्ध करवाने के लिए सरकारों ने जो बन पड़ा वह किया । बागेश्वर जैसे जनपद में मंडल शेरा समूह पेयजल योजना एशिया की बड़ी चार परियोजनाओं में से एक परियोजना तब बनी थी जब हम उत्तर प्रदेश में थे।
यदि हम वर्ष 1980 से आज की तारीख तक पलट कर देखते हैं तो अलग-अलग वर्षों में अलग-अलग नाम की छोटे बड़े बजट की परियोजनाएं पहाड़ों पर चलती रही हैं। इन योजनाओं में स्वैप, स्वजल, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम, राजीव गांधी राष्ट्रीय पेयजल मिशन, अंतर्राष्ट्रीय पेयजल स्वच्छता दिवस के रूप में प्रति व्यक्ति 40 लीटर पानी वाली परियोजना, स्वजल धरा परियोजना आदि आदि तमाम परियोजनाओं के बाद वर्तमान में जल जीवन मिशन नाम से भारी भरकम परियोजना चल रही है। जल जीवन मिशन नाम की यह परियोजना हर घर जल हर घर नल के राजनीतिक नारे के साथ चुनाव मैदानों में भी खूब सुनी और बोली जाती रही है।
इन सभी परियोजनाओं में स्वजल नाम से चली परियोजनाएं दो अलग-अलग चरणों में जमीन पर उतारी गई । जब स्वजल फेज वन तथा फेज टू जमीन पर उतारी जा रही थी तब लोगों को विश्वास दिलाया गया कि कम से कम 25 वर्षों तक पहाड़ पर लोगों को पानी की दिक्कत नहीं आएगी ।
स्वजल परियोजना के समाप्त होते ही जल जीवन मिशन परियोजना जमीन पर उतरी गई जो अभी तक निर्वाध रूप से चल रही है और कितनी दूर तक और चलेगी कहां नहीं जा सकता है।
जल जीवन मिशन के भविष्य का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह परियोजना पूर्ण होने से पहले ही हांफने लगी है। योजना की हालत देख कर यह कहने और समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि पूर्व की परियोजनाओं की भांति जब जल जीवन मिशन परियोजना अंतिम चरण पूर्ण कर समाप्त हो रही होगी उसी दिन यह योजना भी इतिहास बन जाएगी । पानी जीवन जीवन की सबसे महत्वपूर्ण मांग है। इसलिए जिस दिन जल जीवन मिशन का काम समाप्त होगा उसी दिन से सरकार को कोई ना कोई नई परियोजना जमीन में उतरनी ही पड़ेगी।
उपरोक्त सभी परियोजनाओं में पर्वतीय क्षेत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण परियोजना स्वैप (सेक्टर वाइड अप्रोच प्रोग्राम) परियोजना थी। इस परियोजना का लक्ष्य प्राप्त जल स्रोतों से पानी उठाकर लोगों के घरों तक पहुंचाना ही नहीं था वरन् सूखते जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना भी था। इस परियोजना को जानने समझने वालों ने तब मांग उठाई थी कि सूखते जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने वाली इस परियोजना को कभी न समाप्त होने वाली परियोजना की तरह चलाया जाना चाहिए। सुधि जनों का यह विचार नक्कार खाने में तूती की आवाज ही साबित हुआ।
उपरोक्त सभी परियोजनाओं और योजनाओं में जल जीवन मिशन के अलावा शेष सभी योजनाएं निर्माण के पहले दिन से ही सरकार के बजट पर केंद्रित परियोजनाएं थी। जल जीवन मिशन एकमात्र ऐसी परियोजना है जिसमें पहले कदम पर सरकार सिर्फ घोषणा करती है कि वह हर घर तक नल और नल के माध्यम से जल पहुंचाएगी। घोषणा करने के बाद सभी विभाग टेंडर करते हैं तमाम ठेकेदार टेंडर उठाते हैं। इस योजना की शर्त है कि टेंडर उठाने के बाद योजना में जो भी सामग्री लगेगी वह ठेकेदार द्वारा स्वयं खरीदी जाएगी, सरकार सिर्फ उन कंपनियों को चिन्हित करेगी जिन कंपनियों में निर्मित पाइप, सॉकेट, टी, आदि आदि सामान खरीद जाना है। योजना पूर्ण होने के बाद मेजरमेंट के आधार पर ठेकेदार को भुगतान कर दिया जाएगा। यही इस परियोजना की विशेषता थी कि अंतिम घर तक नल और जल पहुंचने तक सरकार की जेब से एक भी पैसा नहीं लग रहा था।
इस परियोजना में सरकार ने राजनीतिक लाभ लेने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। नियमानुसार तो सबसे पहला काम जल स्रोत में पानी को टेप करना होना चाहिए था । पानी को टेप करके टेप पानी को अलग-अलग मार्गो से गांव तक पहुंचाना, गांव में संग्रहण टैंक बनाना, संग्रहण टैंकों से मोहल्ले के टैंक तक पानी पहुंचाने के बाद मोहल्ले के टैंक से घर-घर तक पानी पहुंचाया जाना चाहिए था।
विभागीय अधिकारियों ने सरकार के निर्देश पर सबसे पहला काम गांव में पेयजल लाइन बिछा कर हर घर तक पाइप पहुंचने का किया। क्योंकि पेयजल के स्रोत पर कोई काम नहीं हुआ था इसलिए पूर्व में बनी स्वैप या स्वजल या अन्य परियोजनाओं में जो पानी चल रहा था को ही घर-घर पहुंचा दिया गया। पुराने समय के स्वजल या स्वैप परियोजना के जो स्टैंड पोस्ट मोहल्लों ,गलियों, चैराहों में लगे थे उन्ही स्टैंड पोस्टों में थोड़ा बहुत पानी जो चल रहा था को ही हर घर तक बांटने की कोशिश का परिणाम यह रहा कि गांवों में झगड़ों की समस्याएं बढ़ गईं । ये झगड़े तभी रूकेंगे जब जल श्रोतों से पानी गांवों तक पहुंचेगा।
यहां बता दिया जाए कि हमारी सरकार बहादुरों ने हर घर तक जल हर घर तक नल पहुंचाने की जो उपलब्धि दुनिया भर में बताई उस उपलब्धि के तहत जिन ठेकेदारों ने अपने पैसों से पाइप, साकेट ,टी, एल्बो, सीमेंट आदि अन्य सामान खरीदा फिर मजदूर लगा कर योजनाएं बिछाई उन ठेकेदारों को अभी तक भुगतान नहीं किया गया है। बागेश्वर जैसे छोटे से जनपद में ही जल निगम, जल संस्थान, सिंचाई विभाग जो जल जीवन मिशन कार्यक्रम में लगे हुए हैं ने करीब 50 करोड़ के आसपास की धनराशि ठेकेदारों को भुगतान करनी शेष है। ठेकेदार बताते हैं कि कई ठेकेदार भुगतान न मिलने पर हार्ट अटैक से मर गए हैं। कई ठेकेदार भुगतान न होने की वजह से सड़क पर आ गए हैं। जल जीवन मिशन के कामों पर लगे ठेकेदारों की क्या स्थिति हो गई है पर और भी बहुत कुछ लोग बता रहे हैं जिस पर फिर कभी विस्तार के साथ हिमालय के स्वर अपने पाठकों के बीच आएगा।
वर्तमान में जल जीवन मिशन के तहत जो परियोजनाएं चल रही है उन परियोजनाओं में योजना पूरी होने तक सरकार की ना हींग लग रही है और ना ही फिटकरी ही लग रही है और रंग चोखा आ रहा है।

