पहाड़ से पहाड़ को छीन कर सड़क छाप बनाने में अहम भूमिका निभाई है 20 सूत्रीय कार्यक्रम ने

1975 में जनता के टैक्स को केन्द्र में रख कर तैयार किया गया 20 सूत्रीय कार्यक्रम जमीन पर उतरा गया। इस कार्यक्रम को जमीन पर उतारते समय गांव की स्थितियों-परिस्थितियों, गांव की सभ्यताओं, गांव के तौर तरीकों को बिल्कुल भी ध्यान में नहीं रखा गया। योजना को जमीन पर उतरना ही है की षर्त पर 20 सूत्री कार्यक्रम को जमीन पर उतार दिया गया।

20 सूत्री कार्यक्रम के जमीन पर उतरने के बाद इस कार्यक्रम ने सबसे पहला प्रहार गांव के समन्वयात्मक स्वरूप पर किया। पहाड़ के गांवों की सबसे बड़ी ताकत श्रमदान परंपरा की थी । श्रमदान से गांवों के रास्तों का निर्माण व रखरखाव, मरम्मत, गांव की सिंचाई व्यवस्था, सिंचाई की पारम्परिक गूलों का रखरखाव , मरम्मत, गांव के पेयजल स्रोतों की साफ सफाई , मरम्मत, वर्षा काल से पूर्व गांव और गांव के आसपस के सभी सदाबहार तथा बरसाती जल निकास मार्गो में लगे अवरोधों को हटाना तथा बरसातों के बाद मार्गो के आसपास तथा सार्वजनिक स्थानों पर उगने वाले झाड़, झंकार, घास-फूस को काट छांटकर साफ सफाई का काम श्रमदान पर केंद्रित हुआ करते थे।

गांव के सयानो द्वारा या सयानो के नाम पर लगने वाली आवाज के अनुसार गांव के लोग बताए गए स्थान पर एकत्रित होते थे और गांवों में उपरोक्त वाले सारे कार्य श्रमदान के माध्यम से किए जाते थे।
20 सूत्रीय कार्यक्रम को जब विकासकरों के प्रबन्धन में जमीन पर उतर गया तब कार्यक्रम के साथ बजट भी ग्राम सेवक और गांव के प्रधानों के माध्यम से गांव तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई। गांवों में जो काम सामूहिक रूप से श्रमदान से होते थे वे सभी काम इस नई व्यवस्था में बजट आधारित हो गए । जैसे ही ये काम बजट आधारित हुए तो बजट के साथ भ्रष्टाचार भी गांवों में प्रवेश कर गया।

20 सूत्री कार्यक्रमों और अन्य राष्ट्रीय कार्यक्रमों के माध्यम से जब पेयजल व्यवस्था वाली योजनाएं गांव के अंदर प्रवेश कराई गईं तो उन योजनाओं को बनाने के लिए योजनाकारों का ध्यान उन पेयजल स्रोतों पर गया जिन पेयजल स्रोतों को केंद्र में रखकर गांव बसे थे और जिन पेयजल स्रोतों को गांव के लोग देवता की भांति पूजते और संरक्षित रखते थे।

जब गांव के लोगों ने संभावित खतरों को देखते हुए पारंपरिक पेयजल स्रोतों की संरक्षण के लिए आवाज उठाई तब लोगों की आवाज को यह कहकर कुचल दिया गया कि पानी राष्ट्रीय संपत्ति है और सरकार पानी को कहीं से भी कहीं तक ले जाकर लोगों में बांट सकती है। पेयजल योजनाओं के निर्माण के नाम से गांवों के पारंपरिक जल स्रोतों के साथ की गई छेड़छाड़ की वजह से कई स्त्रोत या तो भूमिगत हो गए या फिर सूख गए। परिणाम यह हुआ कि जिन गांवों में पीने का पानी समस्या ही नहीं थी वे गांव पेयजल समस्या से ग्रस्त होते चले गए।

पेयजल योजनाओं की तरह ही गांव में जो पारंपरिक सिंचाई व्यवस्था मौजूद थी पर ठेकेदारी पर अश्रित केनाल विभाग ने ध्यान देना शुरू किया। जलागम प्रबंधन के नाम पर या रवि खरीफ फसलों की सिंचाई के नाम पर गांवों की पारंपरिक गूलों को पक्की नहरों में बदलने का काम भी 20 सूत्रीय कार्यक्रम के बजट के माध्यम से किया जाने लगा। परिणाम पारंपरिक रूप से जिन जल धाराओं से जिन खेतों की सिंचाई पारंपरिक गूलों के माध्यम से हुआ करती थी तथा जिन गूलों का रखरखाव तथा मरम्मत श्रमदान के माध्यम से किया जाता था वे जल धराएं और गूलें नहर निर्माण के लिए ध्वस्त कर दी गईं। नहर निर्माण के लिए बेदर्द तरीकों से किए गए खुदानों की वजह से कई गांवों में सिंचाई वाली पानी की धाराएं भूमिगत हो गईं । नहरें बनने के कुछ ही महीनों के बाद टूटने फूटने लगीं । सरकारी फाइलों में नहरें बनने के बाद योजना आयोग की फायलों में बृहद भूभाग संचित भी दर्शाया जाने लगा, लेकिन जमीन पर पारंपरिक रूप से जो सिंचित खेत थे वे असिंचित हो गए।

20 सूत्री कार्यक्रम ने पहाड़ के गांवों से समन्वयात्मक सभ्यता छीन कर सफेद कालर भ्रष्टाचार को हमारे गांवों तक पहुंचाया । हमारी ग्रामीण सभ्यता की लूट यही तक सीमित नहीं रही वरन् 20 सूत्रीय कार्यक्रम लागू होने के साथ ही हमारे गांवों की न्याय पंचायत व्यवस्था भी गांवों से छीन ली गई। 20 सूत्री कार्यक्रम में ग्रामीण न्यायालय का सपना दिखा कर गांव में विधिक शिविर लगाने की परम्परा तो प्रारंभ हुई लेकिन हमारी न्याय पंचायतों के विधिवत होने वाले चुनाव रोक दिये गये। चुनाव रोकने के बाद ग्रामीण क्षेत्र की न्यायिक परेशानियां काले कोट और सफेद टाई वाली महंगी और तिकड़म बाजियों से अछी-गछी अदालतों के अधीन होनी ही थी और हो गईं।

आने वाले समय में यदि क्षेत्रीय राजनैतिक दल या नौजवानों के गैर राजनैतिक संगठन उत्तराखंड को एक बेहतर दिशा देना चाहते हैं तो उन्हें उन सभी कार्यक्रमों पर गहनता से विमर्श और शोध करना ही चाहिए जिन कार्यक्रमों ने उत्तराखंड की परंपराओं और उत्तराखंड की सामाजिक सभ्यताओं को कुचल कर यहां के समाज को हाषिये में धकेल दिया है। ऐसे सामाजिक अध्ययन ही पहाड़ों को सही दिषा में आगे लेजाने के रास्ते भी खोलेंगे।

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