बोतल बंद पानी की कम्पनियों ने कब्जा जमा लिया है सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में

उत्तराखंड में सार्वजनिक कार्यक्रमों में पिलाए जाने वाले पानी की व्यवस्था पर नीले हरे काले लाल ढक्कनो वाले बोतल बंद पानी ने कब्जा कर लिया है। कंपनियां समाज की जरूरत के हिसाब से अपना उत्पाद चुनती है, उत्पाद को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए बाजार निर्धारित करती हैं । अपने व्यावसायिक तौर तरीकों से कंपनी यदि बोतल बंद पानी को हमारे तीज, त्योहार, शादी, जनेऊ, नामकरण जैसे कार्यक्रमों तक पहुंचाने में कामयाब हो गई है तो यह उनका अपना व्यवसायिक तरीका है।

कंपनियों के मुनाफा कमाने वाले उनके तरीकों के सामने एक सवाल तो बनता ही है कि हमारा जल कल विभाग जो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से स्थापित है वह पानी की शुद्धता की गारंटी देने के क्षेत्र में कहां खड़ा है।

उत्तराखंड में जलकल विभाग जल निगम और जल संस्थान के नाम से जाने जाते हैं । ये दोनों विभाग जनता को यह विश्वास क्यों नहीं दिला पा रहे हैं कि जो पानी वह आपके घर तक पहुंचा रहे है वह 100% शुद्ध पानी है और बोतल बंद पानी की वनिस्पत बहुत बेहतर पानी है ।

जल महकमों के एक महत्वपूर्ण सम्मेलन में इसी बात को हिमालय के स्वर ने जब उठाया तब उत्तर मिला था कि जो पानी नल के माध्यम से घरों तक पहुंचाया जाता है वह शुद्ध पानी है। पानी की शुद्धता पर तो यहां तक कहा गया कि 1 लीटर पानी पर 25 पैसे तक व्यय आ रहा है।

सेमिनारों में कई सवालों के जवाब जवाब खुद सवालों के घेरे में दिखाई देते हैं। फिर भी सवाल तो अपनी जगह पर है ही कि जिस विभाग को शुद्ध पेयजल पहुंचाने का दायित्व सौंपा गया है वह विभाग सार्वजनिक तौर पर घोषणा क्यों नहीं कर रहा कि उनके द्वारा घरों तक पहुंच जाने वाला पानी पूरी तरह से शुद्ध और स्वास्थ वर्धक है। लोग शादी – बारात, नामकरण, जनेऊ संस्कार आदि किसी भी पारिवारिक या सामाजिक कार्यक्रम में विश्वास के साथ जल संस्थान/जल निगम द्वारा घरों तक पहुंचा जा रहे पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।

उत्तराखंड मैं जगह-जगह प्राकृतिक रूप से मौजूद जल स्रोतों के आसपास ही लोगों ने गांव बसाये थे। सदियों से पानी के जिन स्रोतों पर हमारे गांव जिंदा है अचानक उस पानी पर से लोगों का विश्वास क्यों हटा, क्यों लोग पानी शुद्ध करने के लिए बिजली या गैर बिजली से चलने वाले संसाधनों पर भरोसा करने लगे। इस सवाल पर ईमानदारी से चर्चा हो जाए तो यही तर्क सामने आएगा कि कंपनियों ने अपने उत्पादों को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए जो रास्ते अपनाए उन रास्तों में सबसे महत्वपूर्ण रास्ता यही था कि सबसे पहले जनता के दिमाग में शक पैदा कर दो कि जिस पानी को वो पी रहे हैं वह पानी उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। जब कंपनियां यह खेल खेल रही थी या अभी भी खेल रही हैं तब हमारे सरकारी महकमे या हमारी सरकार जनता को कंपनियों के ऐसे प्रचारों से बचाने के लिए क्या प्रयास कर रहे हैं यह सवाल हर तरफ उठाना ही चाहिए।

ऐसी स्थिति में जब कंपनियां बोतल बंद पानी को गांव-गांव तक पहुंचने में कामयाब हो गई हैं तब सरकार द्वारा हर धर तक शुद्व पानी पहुंचाने के नाम पर चलाई गई/ चलाई जा रही स्वैप, स्वजल, हर घर जल हर घर नल, जल जीवन मिशन जैसी महा बजट वाली योजनाएं असफल क्यों हुई पर हुई गंभीरता से चिंतन मनन और शोध करना ही चाहिए कि ये बड़ी-बड़ी योजनाएं बोतल बंद पानी के कारोबार वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों के कु चक्र के कारण तो असफल नहीं हुई हैं।

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