कपकोट के आपदा पीड़ित कुंवारी गांव में फिर जगी पुनर्वास की उम्मीद न्यायाधीश के पद पर तैनात गांव की बेटी इंदिरा दानू ने गांव में भव्य मंदिर निर्माण करवा कर बगलामुखी देवी की मूर्ति में करवाई प्राण प्रतिष्ठा – (सुरेश पाण्डेय)

वर्ष 2013 की आपदा के बाद अस्तित्व के संकट से जूझ रहे कपकोट विकासखंड के दूरस्थ कुंवारी गांव में मंगलवार को आस्था, संस्कृति और नई उम्मीद का ऐतिहासिक संगम देखने को मिला। गांव में नवनिर्मित मन्दिरों में भगवती माता एवं बगलामुखी माता की मूर्तियों में धार्मिक अनुष्ठानों के और विधि-विधानों से प्राण प्रतिष्ठा का कार्य संपन्न हुआ।इस अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने गांव की सुख-समृद्धि एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

कुंवारी गांव वर्ष 2013 की आपदा के बाद लगातार भूधंसाव और भूस्खलन की मार झेल रहा है। गांव के अनेक मकान, गौचर भूमि, पनघट, मंदिर तथा अन्य धार्मिक एवं सार्वजनिक स्थल मलबे में समा चुके हैं। गांव के विस्थापन के प्रयास भी हुए, लेकिन आसपास की भूमि भी अस्थिर होने के कारण ग्रामीण लंबे समय से अनिश्चितता और कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

इसी बीच गांव की बेटी उत्तर प्रदेश में न्यायाधीश के पद पर कार्यरत इंदिरा दानू ने बताया कि उनके गांव में देवी मंदिर मलबे में दबने से वे अपने को असहज महसूस कर रही थीं । इसी असहजता की स्थिति से बाहर निकलने के लिए अपने पिता के संरक्षण व देख रेख में गांव में पुनः मंदिर का निर्माण करवा कर नये सिरे से देवताओं की मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा का कार्य सम्पन्न करवाया है ।
उन्होंने बताया कि पिछले लगभग एक वर्ष से ग्रामीणों की देख-रेख में भगवती माता एवं बगलामुखी माता के मंदिर का निर्माण कार्य चलता रहा।

प्राण प्रतिष्ठा समारोह में नंदा राजजात की एक समिति के महामंत्री भुवन चंद्र नौटियाल, पृथ्वी सिंह रावत, पूर्व जिला अध्यक्ष हरीश ऐठानी, पूर्व जिला पंचायत सदस्य सुरेश खेतवाल, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष कपकोट गोविंद बिष्ट सहित तीख , डौला, किलपारा, बदियाकोट तथा कुंवारी गांव के सैंकड़ों लोग उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के समापन पर न्यायाधीश इंदिरा दानू ने सभी ग्रामीणों, सहयोगियों एवं श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त करते हुए सभी के सुख, शांति और कल्याण की कामना की। इसके पश्चात श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।
कुंवारी गांव में आयोजित यह धार्मिक आयोजन केवल मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वर्षों से कठिनाइयों का सामना कर रहे ग्रामीणों के लिए नई आशा, एकता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन गया। (सुरेश पाण्डेय)

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