जब सत्ताधारी दल के पास जनता के सामने विकास के सबूत परोसने के लिए कोई भी आंकड़े ना हों , तब समाज में मौजूद दरारें सकृय कर दी जाती हैं

उत्तराखंड में इसी पखवाड़े दलित समाज के उत्पीड़न से जुड़ी हुई तीन घटनाएं सार्वजनिक हुई हैं।
पहली घटना टिहरी जनपद में केतन हत्याकांड के रूप में सामने आई। घटना क्रम के अनुसार एक सवर्ण समाज की बालिका की किसी दलित समाज के बालक से करीबी बनी हुई थी। दोनों बच्चों की इस दोस्ती के विषय में बच्ची के पिता को मालूम पड़ता है । बच्ची के ही फोन से लड़के केतन को सुविधाजनक स्थान पर बुलाया जाता है । बालक जो दुनियादारी को शायद नहीं समझता था बिना सोचे समझे बुलाए गए गंतव्य पर पहुंच जाता है। और फिर केतन की क्रूरता के साथ हत्या कर दी जाती है ।

इस हत्याकांड में चैंकाने वाला यह है कि एक वर्ग सोशल मीडिया के माध्यम से हत्या के और हत्यारों के पक्ष में बयान बाजी कर रहा है । हत्यारों के पक्ष में की जा रही इस बयान बाजी के खिलाफ अभी तक उत्तराखंड पुलिस पूरी तरह से मौन साधे हुए है। पुलिस का मौन उतना ही चैकाने वाला है जितना इस बालक की हत्या का तरीका चैंकाने वाला है ।

दूसरी घटना अल्मोड़ा जनपद में शोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के एचओडी से जुड़ी हुई है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि राजनीति विज्ञान की एचओडी की कार्य प्रणाली लंबे समय से चर्चाओं में थी लेकिन कभी भी उनके खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर या फिर छात्र संगठनों के स्तर पर खुली कार्यवाही या आक्रोश सामने नहीं आया था।

इसी पखवाड़े अचानक किसी शोध छात्रा के माध्यम से एक प्रकरण सामने आता है। कुछ छात्र एच ओ डी तक पहुंच जाते हैं । निश्चित रूप से किसी के घर में जाकर यदि शोर सराबा हल्ला गुल्ला किया जाएगा तो घर के अंदर अन्य कोई मौजूद होगा तो आक्रोशित होगा ही । खबरों के अनुसार एच ओ डी का पुत्र आक्रोशित हो जाता है फिर यहीं से मामला तूल पकड़ लेता है । मामला तूल पकड़ते ही एच ओ डी को बर्खास्त करने की मांग शुरू हो जाती है । सुनने में आया है कि तत्काल प्रभाव से अगले आदेश तक एच ओ डी को उनके पद पर काम करने से रोक दिया गया है ।

तीसरी घटना चंपावत जिले की है। घटना के अनुसार कोई एक टैक्सी ड्राइवर जो दलित समाज से है लंबे समय से कम किराए पर लोगों को गंतव्य तक पहुंचाने का काम कर रहा था । इसी पखवाड़े सुनियोजित तरीके से अन्य टैक्सी ड्राइवरों और टैक्सी यूनियन के कुछ दबंगों को क्रोध आ जाता है। कम किराए पर यात्रियों की सेवा कर रहे दलित टैक्सी ड्राइवर को पकड़ा जाता है, मारपीट की जाती है, बेइज्जती करने के इरादे से जूते की माला पहना कर सार्वजनिक रूप से घुमाया जाता है। जितनी बेज्जती उस दलित टैक्सी ड्राइवर की हो सकती थी उतनी बेइज्जती की जाती है।

सिर्फ एक पखवाड़े में घटित ये तीन घटनाएं दलित समाज के उत्पीड़न को केंद्र में रख कर घटित हुई हैं । चुनाव का वर्ष है इसलिए विश्लेषक चिंता भी व्यक्त कर रहे हैं कि इस प्रकार की कई घटनाएं और सामने आ सकती हैं ।

विश्लेषकों की चिन्ता यह भी है कि जब सत्ताधारी दल के पास जनता के सामने विकास के सबूत परोसने के लिए कोई भी आंकड़े ना होे, जब सत्ताधारी दल भ्रष्टाचार के दलदल में गले-गले धंसा हो, जब सत्ताधारी दल को डर हो कि वह किस मुंह से जनता के बीच जाएगा तब इस प्रकार की घटनाएं अतीत में भी घटती रही हैं और यतीत में भी घट जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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