क्या कॉकरोच महंगाई, वोट चोरी, भ्रष्टाचार , बढ़ाए जा रहे अडानी के साम्राज्य के खिलाफ कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन के पक्ष में भी जुबान खोल पाएंगे

बीते दिवस काकरोचों के जंतर मंतर पर प्रदर्शन में दिखाई दिए मुख्य चेहरों में सोनम वांगचुक, अभिजीत दीपके, विजेता दहिया, आशुतोष रंका और सौरभ राय किसी न किसी रूप में नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल के नजदीकी रहे ही हैं। इन चेहरों ने नरेंद्र मोदी की खुली आलोचना भी कभी नहीं की है। मन्च पर इन चेहरों के साथ शामिल रहे कम्युनिस्ट पार्टी माले के राष्ट्रीय संयोजक दीपांकर भट्टाचार्य ही थे जिन्होंने कभी भी नरेंद्र मोदी की तारीफ नहीं की है तथा हर सम्भव मन्च से मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना ही की है। यही एक वजह भी है कि दीपांकर भट्टाचार्य के जंतर मंतर पर कॉकरोच की गैदरिंग में दिखाई देने पर राष्ट्रीय स्तर पर सवाल भी उठे हैं।

एक वर्ग इस सवाल के साथ भी खड़ा दिखाई दे रहा है कि राहुल गान्धी काकरोचों से दूरी क्यों कर बनाए हुए हैं। विगत के बारह सालों में भारत में पेपर लीक की जितनी भी वारदातें हुई हैं उन सभी वारदातों का राहुल गान्धी सड़क और संसद में खुला विरोध करते रहे हैं। जब काकरोच दिल्ली में कुछ घण्टों का प्रदर्शन करने आये थे उस दिन भी यूथकांग्रेस और कांग्रेस का छात्र संगठन पंजाब और हरियाणा की सड़कों पर शिक्षा मन्त्री के स्तीफे के लिये प्रदर्शन कर रहे थे और पुलिस दमन पर उतारू थी। दो चार दिन पहले खड़ी हुई काकरोच पार्टी से सवाल तो पूछा ही जाना चाहिये कि कांग्रेस द्वरा चलाए जा रहे आन्दोलन के समर्थन में काकरोच है कि नहीं।

राहुल गांधी भाजपा की नफरत की राजनीति के खिलाफ मोहब्बत के पैगाम नारे के साथ देशभर में घूमे , राहुल गांधी की इस राजनैतिक यात्रा में इंडिया गठबंधन के तृणमूल के अलावा अन्य सहयोगियों का समर्थन तो था लेकिन समर्थक समर्पित रूप से शामिल नहीं थे । आवारा हो चुकी महंगाई, वोट चोरी, एस आई आर के जरिये वोटर लिस्टों में गड़बड़, पेपर लीक, महंगाई , गैस सिलेंडर की कम्ी, पैट्रोल की किल्लत, भ्रष्टाचार , निरंकुश हो रही आपराधिक प्रवृत्तियों, माफिया राज, बढ़ाए जा रहे अडानी के साम्राज्य के खिलाफ राहुल गांधी जिस आन्दोलन को देश भर में चला रहे हैं उस आन्दोलन में कम्युनिस्ट पार्टियां ,आम आदमी पार्टी ,तृणमूल कांग्रेस या इंडिया गठबंधन कहां खड़ा है पर सवाल भी उठे ही हैं। काकरोचों से भी पूछा ही जाएगा कि इन मुद्दों पर काकरोच का मत क्या है।

पिछले चुनावों में दिल्ली में आम आदमी पार्टी को हुए राजनीतिक नुकसान, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की निर्मम पिटाई, बिहार में दीपांकर भट्टाचार्य की कम्युनिस्ट पार्टी को हुए भारी नुक्सान, उतर प्रदेश में बसपा से उसके वोटरों का मोहभंग होने के असल कारण सर्व विदित हैं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव उहापोह की स्थिति में हैं कि ममता बनर्जी , अरविंद केजरीवाल, दीपांकर भट्टाचार्य की जैसी हालत के लिए तैयार रहें या फिर कांग्रेस से समझौता करें। कांग्रेस भी जानती है कि देश के राज्यों में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और पाने के लिए पूरी सत्ता है।

इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस का जो जनाधार कॉर्पोरेट के नियंत्रण वाले मीडिया के संरक्षण में लोक पाल आन्दोलन के नाम से हुई अरविंद अन्ना नौटंकी की वजह से तेजी से गिर चुका था वह धीरे-धीरे पटरी पर आ चुका है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण यह है कि 14 साल पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में अरविंद और अन्ना हजारे की नौटंकी का सीधा प्रहार कांग्रेस पर था आज की तारीख में जंतर मंतर पर काकरोचों के प्रदर्शन का राजनीतिक प्रहार कांग्रेस पर हो ही नहीं सकता है । इन दो दिनों में सबसे बड़ा सवाल देश भर में पूछा जा रहा है कि क्या कॉकरोच आवारा हो चुकी महंगाई, वोट चोरी, एस आई आर के जरिये वोटर लिस्टों में गड़बड़, पेपर लीक, महंगाई , गैस सिलेंडर की कमी , पैट्रोल की किल्लत, भ्रष्टाचार , निरंकुश हो रही आपराधिक प्रवृत्तियों, माफिया राज, बढ़ाए जा रहे अडानी के साम्राज्य के खिलाफ कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन के पक्ष में भी जुबान खोल पाएंगे या नहीं!

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