उत्तराखण्ड के गांवों में पलायन की समस्या गांवों के विस्तार को रो जाने के साथ ही शुरू हो गई थी, पहाड़ पर कौन सा गांव कब बसा था के दस्तावेज भले ही हमारे पास नहीं है लेकिन हमारे पास इस बात के पुख्ता पर प्रमाण है कि पहाड़ों पर गांवों के विस्तार को कब, कैसे, क्यों, किस मानसिकता के तहत रोका गया तथा गांवों के विस्तार को रोकने के लिए क्या-क्या उपाय हुकूमतों द्वारा किए गए।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में गांव के विस्तार को रोकने के लिए जो सबसे खतरनाक लाइन खींची गई वह थी भूमि बंदोबस्त की लाइन थी। भूमि बंदोबस्त की इसी लाइन को आधार बनाकर कहा जा सकता है कि वर्श 1840 में बैटन द्वारा करवाए गए बन्दोबस्त ने पर्वतीय क्षेत्र में गांवों के विस्तार को रोक दिया। विस्तार रोकने के साथ-साथ हमारी छानाई संस्कृति भी धीरे-धीरे ,धीरे- धीरे समाप्त होती चली गई । हिमलय के समीप के ऊपरी क्षेत्रों के कुछ खास गांवों में वर्शा कालीन छानाई व्यवस्था के अवषेश बचे हैं जहां लोग अपनी बकरियों गाय भैंस चराने के लिए जाते हैं पर ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां नए गांवों का विस्तार हो ही नहीं सकता।
पहाड़ों पर पलायन की समस्या और बरसाती आपदाओं की समस्या को लेकर जब भी में विमर्ष होता है तब यह सुझाव सरकार को हमेषा दिया जाता है कि हमारे गांवों में अब अधिक विस्तार की क्षमता नहीं बची है तथा सीमित भू खंड में बहुत अधिक दबाव बढ़ने की वजह से भी भू कटाव भू फिस्लाव, भूस्खलन की समस्याएं बड़ी हैं। गैर राजनीतिक विचार धारा के लोगों तथा समाज हित में साचेने वाले सुधि जनों द्वारा समय-समय पर सरकारों को सुझाव भी दिया जाता रहा है कि सीमित भूखंडों में क्षमता से अधिक दबाव को खत्म करने के लिए ब्रिटिष काल में रोक दिए गए गांवों के विस्तार को खोला जाए तथा वर्तमान में जितने भी गांव हैं से 8 गुना गांव नए सिरे से बसाए जाएं ।
नए गांवों को बसाने के लिए विस्थापन शब्द का इस्तेमाल तो किया जाता है लेकिन विस्थापन शब्द की परिभाशा या इस परिभाशा से जुड़ी हुई कोई नियमावली नियम कानून हमारे पास नहीं है। बागेश्वर जनपद में करीब एक दर्जन गांवों को विस्थापित किए जाने की मांग बहुत लंबे समय से उठी हुई है। जब भी कोई बड़ी आपदा आती है तब सरकार विस्थापन की बात करती भी है ।
इसी वर्ष बागेश्वर जनपद के पौंसारी गांव में आई आपदा का निरीक्षण करने के लिए तथा आपदाग्रस्त लोगों से मिलने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री पौंसारी गांव पहुंचे थे, तब उनसे कहा गया कि पौंसारी को अन्यत्र विस्थापित कर दिया जाना ही अंतिम समाधान है। लोगों के सामने मुख्यमंत्री ने भी विस्थापन की मांग को सिर हिलाते हुए सहमति तो दी लेकिन ऐसी सहमति तब तक सिर्फ खानापूर्ति ही रहेगी जब तक उत्तराखंड राज्य की अपनी कोई विस्थापन नीति नहीं बनती है।
उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में विस्थापन की मांग तो बहुत पुरानी है लेकिन इस मांग के समाधान के लिए हमारी अपनी कोई विस्थापन नीति ही नहीं है। अभी तक जो विस्थापन व्यवस्था है उसमें जिस भी व्यक्ति को विस्थापित होना होता है उससे कहा जाता है कि इतनी धनराशि ले लीजिए और कहीं भी विस्थापित हो जाइए। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें जिंदा आदमी के लिये एक स्थान छोड़कर चले जाने का रास्ता तो खुलता हुआ दिखाई देता है लेकिन एक गांव के विस्थापन की व्यवस्था नहीं दिखती।
गांव का अर्थ सिर्फ वहां रहने वाला समाज नहीं होता है । गांव का मतलब होता है खेत, खलिहान, गोचर, पनघट, वन पंचायत, पीने का पानी, सिंचाई की नहरें, स्कूल, अस्पताल, पोस्ट ऑफिस, पशु चिकित्सालय, आंगनबाड़ी की व्यवस्था आदि आदि आदि। जब विस्थापन एक गांव के रूप में होगा तब विस्थापित समाज के साथ उसके तीज, त्यौहार, उत्सव, पूजा पाठ, सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकार भी समाज के साथ विस्थापित होंगे।
नए गांवों को बसाने या आपदा से जूझ रहे गांवों को विस्थापित करने के लिए सरकार के पास यह बहाना तो बचता ही नहीं है कि जमीन कहां से लाएं। पर्वतीय क्षेत्र में कुल भूभाग का 4 / 6 प्रतिशत ही यहां के लोगों के स्वामित्व में है। शेष 94 प्रतिषत से अधिक भूभाग किसी न किसी रूप में सरकारों के कब्जे में ही है। सरकारों के कब्जे के भूभाग का बहुत बड़ा हिस्सा तो चीड़ के खेत के रूप में स्थापित हो चुका है । चीड़ का खेत लीसा दोहन के जरिये कारपोरेट जगत के लिए तारपीन का तेल, बिरोजा उत्पादन का क्षेत्र तो है लेकिन यही चीड़ का खेत पहाड़ की पारिस्थितिकी के लिए सबसे बड़ा खतरा भी तो बन चुका है। ऐसे ही खतरों के रहते ही अब लोग चीड़ वनों को आग वन भी कहने लगे हैं।
चीड़ के खेत को खत्म करने के लिए बेहतर तरीका है कि चीड़ के क्षेत्र को कृषि पट्टी के रूप में विकसित करने के लिये लोगों को खुली छूट दे दी जाए। जब चीड़ के बड़े खेत कृषि खेत के रूप में विकसित होंगे तो स्वतह नए गांव भी बसेंगे और जो पुराने गांव हैं उनकी आबादी भी कम होगी, पलायन भी रुकेगा , बाढ़ भूस्खलन की समस्याएं भी बहुत हद तक समाप्त हो जाएंगी। हिमालय को बचााने और पलायन को रोकने के लिये इस से बेहतर उपाय तो और कुछ हो ही नहीं सकता है।

