एक बहुत पुराना लोकप्रिय गढ़वाली गीत है, जो पहाड़ की महिलाओं के संकट-दर्द को प्रतिबिंबित करता रहा है। यह गीत शायद केशवानंद ध्यानी जी ने लिखा था, जिसे बहुत सारे लोगों ने अपनी-अपनी तरह से गाया था। इस गीत की पहली पंक्ति को उठाकर मैंने आज के संदर्भ में इस गीत को बनाने की कोशिश की थी। इसमें मेरा सहयोग दयाल पांडे ने किया था। जब अंकिता हत्याकांड की सीबीआई जांच को लेकर हमने मुख्यमंत्री आवास का घेराव और दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था तो, उस समय युवा लोकगायक रमेश उप्रेती के साथ मैंने इस गीत को गाया था।
आज ‘धुरंधर धामी’ के साथ गट्टू-भट्टू-सट्टू का फोटो देखकर लगा कि यह गीत फिर गाया जाना चाहिए।
रात घनघोर मांजी रात घनघोरा,
मैं कसिक रौनूं मांजी में लागीं छ डरा।
रीख-बाग खाणैंइन, हमूकैं गौंनूं मा,
शहरों में नौचण रई, अजय-गौतमा।
गट्टू-भट्टू-सट्टू उं लै, रात दिन घेरा,
मैं कसिक रौनूं मांजी मैं लागीं छ डरा।
बेटी बचाओ कुनि, बेटियों कै पढ़ाओ,
पढ़ी लिखी अंकिता कैं मारी की बगाओ
बेटियों कैं नोचि खानी, सब मिली बेरा,
मैं कसिक रौनूं मांजी मैं लागीं छ डरा।
आओ रे भाई-बंधु सब मिली जूली आओ,
जंगली-शहरी, सब भेड़ियों कैं भगाओ।
लट्ठ लियो हाथ और, मचे दियो शोरा
मैं कसिक रौनूं मांजी मैं लागीं छ डरा।
-चारू तिवारी





