पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह जिनका नाम दुनिया के महानतम् अर्थशास्त्रियों में भी सुमार था ने अपने कार्यकाल में भारत के ग्रामीण समाज के लिए भोजन का अधिकार और काम का अधिकार नाम से दो महत्वपूर्ण कानून बनाईं और इन दोनों कानूनों को महात्मा गांधी रोजगार गारंटी तथा खाद्य सुरक्षा योजना नाम से दो महत्वपूर्ण योजनाएं बना कर जमीन पर उतारा भी।
ऐसे समय में जब डॉक्टर मनमोहन सिंह को लगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में आम आदमी की क्रय शक्ति कमजोर होती जा रही है तथा जिसका सीधा प्रभाव ग्रामीण क्षेत्र के उस बाजार पर पढ़ रहा है जो बाजार कहीं ना कहीं राष्ट्रीय बाजार को जिंदा रखता है तब अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने जिन योजनाओं को जमीन में उतरा उन योजनाओं में कानूनी रूप से ऐसी रोजगार दिया ही जाना था जो योजना अभियंताओं के मेजरमेंट तथा तकनीकी आधारों पर केंद्रित नहीं थीं । उस योजना का मकसद था कि लोग कुछ भी काम कर के सरकार से मजदूरी लें और जो मजदूरी उनको मिलती है उस मजदूरी से अपनी जरूरत की चीज ग्रामीण बाजार से खरीदें।
डॉ सिंह जानते और समझते थे कि परिवार के मुखिया को सिर्फ सौ दिन का रोजगार देकर यदि 12-14 हजार रुपया साल उसके घर तक पहुंचाया भी जाएगा तो वह रुपया पेट भरने के लिए पर्याप्त नहीं होगा । डॉक्टर सिंह यह भी जानते थे की एक परिवार को खाने के लिए प्रति व्यक्ति न्यूनतम 15 से 20 किलो तक का राशन प्रति माह मिलना ही चाहिए। इसी आधार पर डॉक्टर सिंह ने भारत के समाज को भोजन का कानूनी अधिकार दिया और इस कानूनी अधिकार को जनता को सोंपते हुए खाद्य सुरक्षा योजना को जमीन पर उतारा गया। खाद्य सुरक्षा योजना के तहत सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों से कोई भी व्यक्ति महीने में 15 से 20 किलो तक राशन ₹2 किलो चावल और डेढ़ रुपया किलो गेहूं सस्ती से सस्ती कीमत पर खरीद सकता था।
मनरेगा और खाद्यान्न सुरक्षा योजना का बड़ा आन्तरिक संबंध यही था कि मनरेगा से जो न्यूनतम मजदूरी किसी व्यक्ति को मिलेगी उस मजदूरी के पैसे से वह अपने ही गांव की दुकानों से भरपेट राशन तथा अन्य पारिवारिक दैनिक जरूरतों को खरीद सकेगा।
इसमें कोई दोहराए नहीं है कि जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार थीं उन राज्यों में भी इन दो महत्वपूर्ण योजनाओं को जमीन पर उतारने में सरकारों ने बहुत ईमानदारी का परिचय नहीं दिया । यदि सरकारें ईमानदारी से इस योजना को समझ रही होतीं तो इन दोनों योजनाओं में भ्रष्टाचार को प्रवेश करने से रोकने के हर संभव हथकण्डे अपनाती लेकिन कांग्रेस के मुख्यमंत्री और सरकारों की जिजीविषा और संकल्प बहुत कमजोर थे। परिणाम यह हुआ कि विपक्ष की ओर से तब के गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेंद्र मोदी ने मंचों में आकर कहा कि यह दोनों योजनाएं भ्रष्टाचार से कूट-कूट कर भरी हुई हैं । और सच भी यही था कि मनरेगा और खाद्य सुरक्षा योजना में कांग्रेसी सरकारों ने जिस भ्रष्टाचार को चरम तक बढ़ने दिया वही भ्रष्टाचार उन राज्यों में कांग्रेस को खतम कर गया जिन राज्यों में इन दो योजनाओं की बदौलत कांग्रेस मजबूत हो सकती थी।
विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के नेता अपनी सरकार द्वारा लाई गई खाद्य सुरक्षा कानून और मनरेगा कानून की अच्छाइयों को और समाज में इन योजनाओं की जरूरत को जनता के बीच नहीं ले जा पा रही है तो कारण जब उनकी सरकार थी तब उन्होंने ही इन योजनाओं को कमजोर करने के लिए हर हथकण्डे अपनाये थे।
मनरेगा रोजगार परक योजना थी इस योजना में यदि सरकार ने प्रतिदिन की मजदूरी ₹150 स्वीकृत की थी तो वह पूरा का पूरा ₹150 रोजगार के रूप में जनता के पास पहुंचना चाहिए था लेकिन कांग्रेस की सरकार ने उत्तराखंड में कुछ ऐसी चाल चली की कुल स्वीकृत धनराशि में से ₹40 प्रतिशत सीमेंट सरिया रोड़ा बजरी लोहा लक्कड़ रंग पेंट आदि आदि सामान बाजार खरीदने के लिए अलग कर दिया गया और सिर्फ ₹60प्रतिशत ही मजदूरी के लिए छोड़ा गया। इसके विपरीत मनरेगा योजना चीखकर कहती थी कि उन्ही योजनाओं को जमीन में उतार जाए जिस योजनाओं में बाजार से कोई भी सामान ना खरीदना पड़े तथा पूरा का पूरा स्वीकृत बजट रोजगार के रूप में जनता तक पहुंचे।
इसी प्रकार खाद्य सुरक्षा योजना के तहत केंद्र से इफरात में गेहूं चावल और दालें राज्यों को मिलता था । उस दौर के अखबार खाद्यान्न योजना के भ्रष्टाचार की खबरों से भरे पटे मिलते थे । यानी जो योजनाएं जनता में सरकार की तारीफ के पुल बांधती वही योजना जनता में सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के सवाल उठाकर सरकार को कमजोर करने का काम कर रही थी। परिणाम स्वयं कांग्रेस की सरकारों की अदूरदर्शिता भ्रष्ट नियत की वजह से डॉक्टर मनमोहन सिंह कि यह शानदार योजनाएं धूल धूसरित हो गईं ।
आज की तारीख में भी कांग्रेस पार्टी जनता के बीच में जाकर जनता को सिर्फ
इतना सा नहीं समझ पा रही है कि वर्तमान सरकार ने सिर्फ 80 करोड लोगों को महीने का 5 किलो मुफत का राशन देने के नाम पर सवा करोड़ लोगों से प्रति माह 20 से 25 किलो राशन छीन लिया है ।
इस में दो राय नहीं कि यदि इस लूट को कांग्रेस जनता का सवाल बनाने में कामयाब हो जाती है तो भाजपा की वर्तमान सरकार के लिये बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकती है।





