नदियों का जलागम क्षेत्र ही उत्तराखंड का भूगोल है। यमुना गंगा और शारदा नदियां उत्तराखंड के वृहद जलागम क्षेत्रों से बनकर मैदानो की ओर उतरती हैं । भारत के बृहद भूभाग के लिए मीठे पानी का बहुत बड़ा और प्रमुख स्रोत ये तीन नदियां ही हैं को शायद उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार की सरकारें भी अनदेखा कर रही हैं।
हिमालय में ग्लेशियरों के नीचे से निकलने वाली जल की धारा हो या फिर वन क्षेत्रों से रिस कर निकलने वाली पतली-पतली जलधाराएं हों ढलानों की ओर बहते हुए आपस में मिलकर बड़ी-बड़ी नदियों का रूप लेती हैं।
यमुना और टौंस यमुना का निर्माण कर मैदानों की ओर निकलती है। भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, भिलंगना और पिंडर नदिया गंगा नदी का निर्माण करती हैं । सरयू, रामगंगा, धौली, गोरी, काली नदियां शारदा नदी के निर्माण की मुख्य नदियां है। ये सभी नदियां बहुत सारे छोटे-छोटे जल स्त्रोतों से मिलकर बड़ी नदी में बदलती हैं।
गंगा, यमुना और शारदा नदियों के वृहद जलागम क्षेत्र में सरकारों द्वारा बिछाए जा रहे अस्थाई विकास के जाल की वजह से नदियां बहुत बुरी स्थिति में आ गई हैं। यह बात राज्य बनने के बाद के 25 वर्षों में अलग-अलग तरीकों से से सरकार को बताया भी जाता रहा है, लेकिन सरकार इस गंभीर समस्या की ओर पलट कर भी देखना नहीं चाहती है। नदियों के संरक्षण संवर्धन के लिए बहुत सारे कानून बने तो हैं लेकिन जहां विकास की बात आती है या भ्रष्टाचार वाले विकास की बात आती है वहां नदियों के संरक्षण संवर्धन के कानून या तो नेपथ्य में चले जाते हैं या बहुत बौने हो जाते हैं।
किसी भी जलागम क्षेत्र में जब सड़क का निर्माण किया जाता है तब सड़क को काटकर फेंक दी जाने वाली मिट्टी बरसाती पानी के साथ ढलान की ओर आगे बढ़कर नदियों में मिलती है । जब बरसात के इसी पानी के साथ विकास का मालवा आगे को बढ़ता है तो वह बरसाती पानी के निकास मार्गों को ही प्रभावित नहीं करता है बल्कि नदियों को भी बुरी तरह से प्रभावित करता है।
जिस क्षेत्र में भी सड़कों का निर्माण होता है उन क्षेत्रों के तालाबों में विकास की मिट्टी मलुवे के रूप में भर जाती है तब तालाब वीहीन नदियां विनाश का कारण बनती हैं । यह शिकायत नदियों का विज्ञान चीख चीखकर करता भी है। कानून का पेट भरने के लिए बताया जाता है कि सड़कों के निर्माण के लिए डंपिंग जौनों की व्यवस्था होती है लेकिन यह डंपिंग जोन कहां होते हैं किसी को पता नहीं होता है।
बागेश्वर जनपद में सरयू नदी की प्रमुख सहायक नदियों पुंगर नदी और भद्रकाली नदी का निर्माण बहुत सारी छोटी-छोटी नदियों से मिलकर होता है। इन नदियों के जलागम क्षेत्र में बहुत बड़े पैमाने पर बड़ी-बड़ी खड़िया खदानों की स्वीकृति दी गई है। खड़िया खदानों का नियम है कि जब तक किसी खदान का डंपिंग जोन नहीं होगा तब तक खड़िया खदान की स्वीकृति नहीं दी जा सकती है। इसके विपरीत बागेश्वर जनपद में जितनी भी खड़िया खदानें सक्रिय हैं उनमें किसी भी खदान का अपना डंपिंग जौन नहीं है। यही वजह है कि खड़िया खदानों से निकलने वाली गाद ने नदियों का स्वरूप बर्बाद कर दिया है।
खनन क्षेत्र की छोटी बड़ी सभी नदियों के तालाब समाप्त होने से पुंगर नदी की जैव विविधता समाप्त हो गई है। यही स्थिति भद्रकाली नदी की भी है। यदि व्यापक स्तर पर अध्ययन किया जाए तो हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं की छोटी-छोटी जल धाराओं से मिलकर तैयार होने वाली सभी नदियों की जैव विविधता को विकास की वजह से खतरा हो गया है या फिर जैव विविधता पूरी तरह से नष्ट हो चुकी है लेकिन सरकारी इस महा पाप को देखना भी पसंद नहीं कर रही है। यहीं से सवाल उठता है की उत्तराखंड राज्य की सरकारें नदियों से दुश्मनी रखती क्यों है?




बहुत सुंदर प्रयास आपकी लेखनी निश्चित तौर पर आप सोशल मीडिया के माध्यम से भी देखने को और पढ़ने को मिलेगी🙏