हिमालय ,हिमालय की नदियों और हिमालय के समाज को बचाने के लिए उगाने ही होंगे मिश्रित वन चीड़ के (आग के) खेतों में

इधर दो-तीन दिन से पहाड़ों पर वातावरण में तपिश बढ़ने के साथ ही चीड़ के खेतों के रूप में मौजूद जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं।

पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकूमत ने और बाद में ब्रिटिश हुकूमत ने पहाड़ों पर मौजूद मिश्रित वनों को समाप्त कर चीड़ के खेत में बदलने के लिए जिस विज्ञान का सहारा लिया उस विज्ञान में फायर लाइन काटने की व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण हुआ करती थी। चीड़ का विज्ञान कहता है कि चीड़ के खेत में चीड़ के अलावा किसी भी प्रकार की वनस्पति जीवित नहीं होनी चाहिए। इसी विज्ञान के आधार पर जंगलों में फायर लाइन काटने कि व्यवस्था को जरूरी वार्षिक कार्यक्रम बनाकर जमीन पर उतर गया।
प्रतिवर्ष एक या दो बार चीड़ के वनों में फायर लाइन काटने से सिर्फ गिरे हुए चीड़ के पत्ते ही जलकर नष्ट नहीं होते हैं बल्कि वह सारी वनस्पतियां नष्ट हो जाती हैं जो मिश्रित वनों को तैयार करने में सहायक होती हैं और इन वनस्पतियों के नष्ट होने के बाद चीड़ को पनपने और विकसित होने मदद मिलती है।

यदि वन विभाग चीड़ के खेतों में वर्ष में एक, दो या तीन बार फायर लाइने नहीं काट रहा है तो इसका मतलब यही हुआ कि वन विभाग चीड़ वनों के उस विज्ञान को नकार रहा है जिस विज्ञान में फायर लाइन कटा जाना अनिवार्य होता है। यदि वन विभाग फायर लाइन काटे जाने की अनिवार्यता को नकार रहा है तो इसका मतलब यही हुआ कि वन विभाग चीड़ के वनों को बेतरतीब लगने वाली आग के हवाले होने देना चाहता है।

यहां एक सवाल सामने आता है कि क्या वन विभाग अपनी वार्षिक कार्य योजना के अनुसार फायर लाइन काटने हेतु बजट की व्यवस्था नहीं कर पा रहा है या फिर सरकार ही वन विभाग को फायर लाइन काटने हेतु प्र्याप्त बजट उपलब्ध नहीं करवा रही है।इन दोनों ही स्थितियों में जंगल में लगने वाली आग की जिम्मेदारी वन विभाग और सरकार की ही है।

हिमालय के स्वर द्वारा समय-समय पर करवाए गए अध्ययनों के बाद चैंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं कि पहाड़ के लोग वन विभाग के अधिक से अधिक राजस्व कमाने के वन प्रबंधन के तौर तरीकों से इतने अधिक नाखुश हैं कि वे वन विभाग को किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं करना चाहते हैं तथा वन विभाग को समाप्त कर वनों का स्वामित्व जनता को लौटाये जाने के पक्ष में हैं।

यहां बता दिया जाए कि 1970 के बाद बहुत चालाकी के साथ जनता के स्वामित्व वाले पंचायती वन प्रबंधन के जंगलों को ग्राम वनों के नाम पर जनता से छीन कर वन विभाग को सौंपा दिया गया था। सरकार की इस जन विरोधी कार्यवाही के बाद जनता में जबरदस्त आक्रोश फैलता चला गया। पंचायती वनों के साथ ही सिविल सौयम वन जो सीधे-सीधे राजस्व विभाग के नियंत्रण में हुआ करते थे को भी छीन कर वन विभाग के हवाले कर दिया गया।

आज की तारीख में पहाड़ के जंगलों को आग मुक्त रखने के लिए चीड़ के खेत को मिश्रित वनों में तब्दील किया जाना ही शेष विकल्प है। सामाजिक विज्ञान के सहारे क्रमबद्ध तरीके से वन विभाग को धीरे-धीरे समाप्त करना ही होगा।

इस क्रम में पहले कदम पर वन पंचायत अधिनियम बनाकर पंचायती वनों ,सिविल सोयम वनों और गांव के आसपास के प्रथम व द्वितीय श्रेणी के वनों को गांवों की वन पंचायतों में शामिल किया जाए।
वन विभाग या फिर सरकार इस जरूरी काम को कभी भी नहीं करेगी. सिर्फ जनता ही अपने वोट की ताकत से इस जरूरी प्रयोग को जमीन पर उतरने के लिए सरकार को मजबूर कर सकती है।

यहां इतिहास को दोहरा ही दिया जाए कि स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान करीब सौ सालों तक पहाड़ पर चला ज्रंगलात का आन्दोलन तथा 1970 से 1980 के बीच उत्तराखण्ड के पहाड़ों पर चला जंगलात का आन्दोलन पहाड़ पर जल जंगल जमीन का स्वामित्व सिघौली सन्धि से पूर्व की तरह यहां के समाजों को लौटाने की मांग का जन आन्दोलन था।

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