24 अप्रैल 1993 में 73वें संविधान संशोधन की ताकत से देश के गांवों को पंचायती राज व्यवस्था सोंपी गई थी। संविधान ने तो देश को पंचायती राज सोंप दिया था लेकिन देश के राज्यों ने गांवों में पंचायती राज व्यवस्था लागू करने में जी भर कर मक्कारी दिखाई है और बदमाशियां की हैं।
योजना समिति और जिला नियोजन एवं पुनरीक्षण समिति के बिना जनपदों में पंचायती राज व्यवस्था के कोई भी वैधानिक मायने नहीं होते हैं। संविधान में इसकी विधि सम्मत व्यवस्था के बावजूद पंचायतों के चुनाव संपन्न होने के 8 माह बाद भी विधिवत तरीके से यह दोनों समितियां पूरे राज्य में गठित नहीं हुई हैं। जब यह दोनों संवैधानिक समितियां ही गठित नहीं की गई हैं तब जिले में विकास का नियोजन किस प्रकार से किया जा रहा है। ऐसे सवाल का उत्तर सरकार नहीं दे सकती है।
जिला नियोजन एवं अनुश्रवण समिति (District Planning and Monitoring Committee – DPC) भारत के संविधान के अनुच्छेद 243ZD के तहत गठित एक संवैधानिक निकाय है, जिसका मुख्य कार्य जिले के ग्रामीण (पंचायतों) और शहरी (नगरपालिकाओं) क्षेत्रों के विकास के लिए एक एकीकृत योजना (Draft Development Plan) तैयार करना है।
74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर इसका गठन अनिवार्य है। यही समिति पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं को समेकित कर जिले के लिए एक एकीकृत मसौदा विकास योजना तैयार करती है। इस समिति में जिले के पंचायत और नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। अधिकांश राज्यों में सदस्यों का 4/5 भाग पंचायत और नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों में से चुना जाता है।
यह समिति ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों की योजनाओं को मिलाकर एक समग्र जिला योजना बनाने के साथ ही साझा मुद्दों, जैसे जल बँटवारा, बुनियादी ढाँचे का विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे साझा मुद्दों पर योजनाएं बनाती है। जिले में उपलब्ध प्राकृतिक और मानव संसाधनों का डेटाबेस तैयार करने का अधिकार भी इसी समिति को है। जनपदों के विकास के लिए निर्धारित इस वैधानिक समिति का गठन ही यदि सरकार नहीं कर रही है तो यह सरकार का जिम्मेदारी से भागना नहीं है क्या?





