सरकार के प्राथमिक तथा जूनियर विद्यालयों की ओर पीठ क्यों कर रहे हैं ग्रामीण अभिभावक?

यूं तो उत्तराखंड के सम्पूर्ण पर्वतीय क्षेत्र में दो तीन प्रतिशत प्राथमिक तथा जूनियर जमात की पाठशालाओं को सूची से हटा दिया जाए तो शेष पाठशालाओं में शिक्षा का स्तर एक जैसा ही है। और इसी बुरी स्थिति की वजह से लोगों ने अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में भेजने की जगह है बे तादाद संख्या में खुल गये सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत समितियों के उन विद्यालयों में भेजना शुरू कर दिया है जिन विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक सरकारी पाठशालाओं में तैनात शिक्षकों की भांति पूर्ण रूप से प्रशिक्षित होते भी भी हैं कि नहीं का कोई उत्तर नहीं मिलता है।

उप शिक्षा अधिकारी कपकोट के अधीन विद्यालयों की एक सूची सूत्रों से हिमालय के स्वर को प्राप्त हुई थी । यह सूची पाठशालाओं में बच्चों की संख्या को लेकर चौंकाने वाली है ।

उप शिक्षा अधिकारी कपकोट के नियंत्रण में 225 प्राथमिक पाठशालाएं हैं । कुछ गिनी चुनी प्राथमिक पाठशालाओं को अगर छोड़ दें तो शेष पाठशालाओं में छात्रों की संख्या चिंता करने वाली इसलिए है । 54 पाठशालाओं में छात्रों की संख्या 5 से कम है, 37 पाठशालाओं में छात्रों की संख्या 6 से 10 के बीच है तथा 41 पाठशालाओं में छात्रों की संख्या 11 से 15 के बीच में है, 21 पाठशालाओं में छात्रों की संख्या 16 से 20 के बीच में है। इन 225 विद्यालयों की सूची में मात्र दो विद्यालय हैं जिसमें सम्मानजनक छात्रों की संख्या मिलती है । प्राथमिक पाठशाला कपकोट जहां 298 छात्र है तथा प्राथमिक पाठशाला बड़ी पन्याली में 106 छात्र हैं।

यहां बता दिया जाए कि राज्य बनते समय प्राथमिक शिक्षा का जो ढांचा हमको उत्तर प्रदेश से मिला था वह देश की बेहतरीन शिक्षा व्यवस्था में से एक था। पाठशालाओं की कोई कमी नहीं थी और पाठशालाओं में छात्रों की संख्या की कोई कमी नहीं थी । छात्रों को पढ़ने के लिए जो शिक्षक नियुक्त थे वह पूरी तरह से दक्ष शिक्षक हुआ करते थे ।

सरकारी पाठशालाओं में सभी नियुक्त शिक्षक अभी भी पूरी तरह से दक्ष हैं फिर भी अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय में भेजने से क्यों कतरा रहे हैं यह बड़ा सवाल है। इस संबंध में जब गांव के सुधि जनों से बातचीत की गई तब उन्होंने माना कि शिक्षा विभाग के आला अफसर और स्वयं शिक्षक भी समाज से दूर होते चले गए हैं, और जो विश्वास शिक्षा विभाग के आला अफसर और शिक्षक समाज में बैठा सकते थे वह नहीं बैठा पा रहे हैं।

सुधिजन यह भी मानते हैं कि पाठशालाओं में मध्यान्ह भोजन बनाने की व्यवस्था प्रारंभ करने के बाद भी शिक्षा के स्तर पर बुरे प्रभाव सामने आए हैं। जागरूक लोग तो सरकार से यहां तक सवाल पूछ रहे हैं कि जब देश के प्रत्येक नागरिक को भोजन का अधिकार प्राप्त है तब पाठशाला में मध्यान्ह भोजन परोसने के क्या मायने हैं।

सुधिजन यह भी मानते हैं कि प्राथमिक तथा जूनियर विद्यालयों में शिक्षकों की तैनाती कानूनी प्राविधान के रूप से जनपद से बाहर के शिक्षकों की कर दी तो शिक्षा के स्तर में बहुत अधिक हद तक सुधार संभव है।

सुधिजनों का यह भी मानना है कि प्राथमिक तथा जूनियर विद्यालयों को पंचायती राज व्यवस्था के अधीन कर दिया जाना चाहिए। ऐसा करने के बाद शिक्षा के स्तर में सुधार होगा।

प्राथमिक तथा जूनियर स्कूलों को पंचायत राज के अधीन किए जाने का सुझाव देने वालों से जब पूछा गया कि आपकी क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत की बैठकों में चुने गए प्रतिनिधि बिजली पानी सड़क चिकित्सा और बजट को लेकर खूब सवाल पूछते हैं लेकिन शिक्षा के गिरते स्तर पर सवाल उठने से अक्सर बचते हैं ऐसी स्थिति में आप क्यों विश्वास करते हैं कि प्राथमिक तथा जूनियर शिक्षा को पंचायत के अधीन डाल दिए जाने के बाद शिक्षा का स्तर सुधरेगा।

इस प्रश्न के उत्तर में सुधि जनों ने बताया कि पंचायत राज की चुनावी राजनीति में क्षेत्रीय नागरिक होने के नाते शिक्षकों का भी पूरा दखल रहता है और यही एक कारण है कि हमारे प्रतिनिधि प्राथमिक जूनियर यहां तक की हाई स्कूल तथा इंटर कॉलेज में गिरते हुए शिक्षा के स्तर पर चुप्पी साधने में ही अपना राजनीतिक हित देखते हैं। वे कहते हैं कि जब नियम बन जाएगा कि प्राथमिक तथा जूनियर विद्यालयों में जनपद से बाहर के शिक्षकों की तैनाती ही होगी तब यह सवाल अपने आप नेपथ्य में चला जाएगा।

यहां ग्रामीण समाज ने सवाल यह भी उठाना चाहिए कि विधानसभा तथा लोकसभा में जिन प्रतिनिधियों को वे चुनकर भेजते हैं वे प्रतिनिधि सरकारी क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने की जगह सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत समितियों द्वारा खोले गए विद्यालयों के उत्सवों में उपस्थित होने पर गर्व महसूस क्यों करते हैं तथा ऐसी विद्यालयों पर दिल खोलकर सांसद और विधायक निधि लुटाने में शर्म महसूस करने की जगह है गर्व महसूस क्यों करते हैं।

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