स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आज़ादी का नाम नहीं है। सच्ची स्वतंत्रता तब है, जब हमारा मन भय से स्वतंत्र हो, हमारी बुद्धि अज्ञान से स्वतंत्र हो, हमारा हृदय घृणा से स्वतंत्र हो और हमारा जीवन अहंकार एवं स्वार्थ से स्वतंत्र हो। भारतीय संस्कृति कहती है—
“वसुधैव कुटुम्बकम्”
अर्थात पूरी पृथ्वी हमारा परिवार है। यही वह भूमि है जिसने हमें सत्य, अहिंसा, करुणा, योग, ध्यान, सेवा और सह-अस्तित्व का संदेश दिया। हमारे ऋषियों ने कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी यात्रा बाहर की नहीं, बल्कि अपने भीतर की यात्रा है।
यदि हम जाति, भाषा, क्षेत्र, धर्म, अहंकार और स्वार्थ के छोटे-छोटे बंधनों में बंधे हैं, तो हमें अभी एक और स्वतंत्रता की यात्रा करनी है—आंतरिक स्वतंत्रता की यात्रा। भारत विश्व के सामने अपनी संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान और आध्यात्मिक विरासत के साथ जिम्मेदारी की एक नई पहचान बना रहा है।
ज्ञान जब संस्कार से जुड़ता है, तो संस्कृति बन जाती है।
स्वतंत्रता जब जिम्मेदारी से जुड़ती है, तो राष्ट्र निर्माण होता है। इसलिए हमें पुनः ऐसा भारत बनाना है जहाँ विकास के साथ संस्कार हों, विज्ञान के साथ विवेक हो, आधुनिकता के साथ संस्कृति हो और अधिकारों के साथ कर्तव्य की भावना भी हो।
आज संकल्प लेना चाहिए कि—
नफरत नहीं, प्रेम बाँटेंगे।
भेदभाव नहीं, समानता अपनाएँगे।
अज्ञान नहीं, ज्ञान फैलाएँगे।
स्वार्थ नहीं, सेवा को जीवन का आधार बनाएँगे।
— डॉ. राकेश नेगी अनंत
वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर राजनीति विज्ञान विभाग / सचिव ह्यूमन राइट सेल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड ।




