युवाओं के राष्ट्रव्यापी आन्दोलन की लहर ने जहां सत्ता पक्ष को गहरा और दीर्घकालिक झटका दिया है वहीं इस आन्दोलन ने देश में नई राजनैतिक संभावनाओं के द्वार भी खोल दिए हैं ।
सत्ता पक्ष जहां इस चोट से उभरने के लिए तरह तरह के प्रयास कर रहे हैं वहीं इस आन्दोलन को बदनाम करने और इस आन्दोलन के हासिल को नीचा दिखाने के लिए ..Gen G की भाषा को निशाना बना रहे हैं । जैसे कि वहां इसके सिवा कुछ और दर्ज करने को हो ही नहीं ।
जंतर मंतर में और 20 तारीख के संसद मार्च के दौरान हम वहां थे । उस दौरान इस पहलू पर नजर गई । उसपर अपनी बात यहां कही है ।
भले ही आने वाले दिनों में इस संघर्ष के और आगे बढ़ने पर नए विचार नए विमर्श भी आयेंगे..
अभी तक जो लगा वो यहां बात में रखा है- ( अतुल सति )
गालियां जेरे बहस हैं, जिनका आई टी सेल पिछले 12 बरस से तमाम विरोध के स्वरों को गाली से ही खामोश कर रहा था, वे भी गाली पर विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं.
गाली की इस सारी बहस में कवियत्री श्रुति कुशवाहा जी की यह कविता गौरतलब है :
गाली उन चुनिंदा चीज़ों में थी
जिसे समाज ने स्त्री के लिए आरक्षित रखा
स्त्री ने सबसे पहले खाई गाली
सबसे अंत में भोजन का निवाला
इतने सलीके से रची गई गालियाँ
माँ के लिए माँ की
बहन के लिए बहन की
अवधान इतना कि न छूटा कोई स्त्री-अंग
न छूटी नीची जात
पुरुष को जब-जब क्रोध आया
उसने कहा “तेरी महतारी की…”
दलित बस्ती अपनेआप में गाली थी
पंडतजी ने उनके बच्चों को नाम दिया कलुआ
दुखिया, भिखारी, मंगतू, कचरा
उनकी स्त्रियों को गाली के साथ किए अश्लील इशारे
बामन टोले और ठाकुर हवेली की स्त्रियाँ भी
गालियों में समान भागीदार थीं
स्त्री हर जाति में दलित है
स्त्री-अंग गालियों की शोभा हैं
गालियाँ इस संस्कारी देश की सांस्कृतिक धरोहर हैं
फिर किसी दिन एक स्त्री ने चौराहे पर दे दी गाली
उसी दिन इस देश की मर्यादा संकट में आ गई – (इन्द्रेश मैखुरी)




