15 वर्ष पूर्व यूपीए की सरकार में मजबूत कद काठी वाली नेता सोनिया गांधी ने देश में घटती कृषि भूमि को लेकर चिंता व्यक्त की थी। कांग्रेस के छत्रपों ने भारत में तेजी से घटती कृषि भूमि की चिंता को जन मुद्दा बनाने में तो कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई लेकिन अमेरिका द्वारा संचालित उस विश्व कॉर्पोरेट के कान खड़े हो गए जो भारत की औद्योगिक नीतियों के रहते हुए भारत के विशाल कृषि भू भाग को कारपोरेट की बपौति मानता रहा है।
विश्व कॉर्पोरेट की चिंता जायज थी कि यदि भारत जैसे विशाल बाजार वाले देश में कृषि भूमि को कृषि विकास के लिए संरक्षित करने वाले कानून बनवाने में सोनिया गांधी कामयाब हो जाती हैं तब कॉर्पोरेट की कंपनियां अपना साम्राज्य कहां खड़ा करेंगी।
यही वह दौर भी था जब सिंगूर में टाटा नैनो कार के लिए बड़ी फैक्ट्री लगाना चाहता था तथा बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टि की सरकार अपने तमाम मूल सिद्धांतों से बाहर निकल कर जनता के गुस्से से बेपरवाह टाटा के साथ खड़ी हो कर अपनी सरकार का बलिदान देने के लिए तैयार हो गयी । बंगाल में जनता के इसी गुस्से को पड़कर ममता बनर्जी ने बंगाल में कम्युनिस्टों से सरकार छीन ली थी ।
तब टाटा को नैनो कार की फैक्ट्री लगाने के लिए गुजरात में जमीन मिल गई थी तथा स्वयं टाटा ने कहा था कि मोदी देश के लिए अच्छे प्रधानमंत्री साबित होंगे । नैनो कार का भारत में जो हस्र हुआ उस पर फिर कभी।
जब यह सारी घटनाएं घट रही थी तब विश्व आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा था। भारत में डॉक्टर मनमोहन सिंह के रूप में विश्व विख्यात अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे। जिस आर्थिक सिद्धांत के सूत्र से डॉ मनमोहन सिंह ने विश्व के विकसित देशों की परवाह किए बिना भारत की अर्थव्यवस्था को धूल धूसरित होने से बचाया वह अमेरिका द्वारा संचालित विश्व कॉर्पोरेट की चिंता का कारण बन चुका था।
इस चिंता से निपटने का एक ही रास्ता विश्व कॉर्पोरेट के पास था कि भारत में डॉक्टर मनमोहन सिंह के सूत्रों पर खड़ी अर्थव्यवस्था को कैसे भी छिन्न भिन्न किया जाए। ऐसा भी नहीं है कि डॉ मनमोहन सिंह की नीतियों से सिर्फ विश्व कॉर्पोरेट ही डरा था बल्कि भारत में कांग्रेस पार्टी के अंदर मौजूद एक बहुत बड़ा वर्ग भी डॉक्टर मनमोहन सिंह के स्थान पर राहुल गांधी को लाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहता था तो दूसरा वर्ग राहुल गांधी को पप्पू साबित कर किसी तीसरे को मनमोहन सिंह की जगह प्रधानमंत्री देखना चाहता था।
उसी दौर में विश्व कारपोरेट सुनियोजित तरीके से भारत में स्थापित मीडिया को कॉर्पोरेट के कब्जे में लाया तथा नये नये खबरी चैनल भी खड़े किये गए। इन्हीं खबरी चैनलों के माध्यम से धार्मिक तथा मनोरंजन चैनलों को भी हांका जाने लगा।
खबरी चैनलों , धार्मिक चैनलों तथा मनोरंजन चैनलों पर कब्जे के बाद सरकार में मौजूद नामचीन अधिकारियों का इस्तेमाल डा0 मनमोहन सिंह के खिलाफ किताबें लिखवाने या फिर विकास और अर्थव्यवस्था से सम्बंधित सरकार विरोधी अनाप.-शनाप बयान बाजी करवाने के रूप में किया गया। क्योंकि मीडिया कॉर्पोरेट के कब्जे में आ चुका तो सरकार विरोधी किताबें, ऊंची कुर्सियों पर बैठे अधिकारियों से बुलवाए गए झूठ पर आधारित बयान और आंकड़े, भ्रष्टाचार के मुद्दे मीडिया की बहसों के केंद्र में आ गए।
मीडिया की ताकत से सरकार के खिलाफ देश के प्रदेशों में माहौल बनाने में कामयाब कॉर्पोरेट ने तब गैर सरकारी संगठन के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी परियोजना के लिए संघर्षरत अरविंद केजरीवाल को उनके कुछ विश्वास पात्र दोस्तों के साथ अवतरित करवा कर एन जी ओ क्षेत्र के ही एक अन्य शातिर किस्म के व्यक्ति को गांधी बता कर वह गैंग तैयार किया जिस गैंग ने देश में लोकपाल बिल लागू करवाने के नाम पर दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार विरोधी मंच स्थापित किया।
14 वर्ष पूर्व दिल्ली के रामलीला मैदान में चलाए गए आंदोलन के उस मंच को अन्ना और अरविंद सुनियोजित परियोजना की तरह संचालित कर देश के नगरीय और शहरी क्षेत्र में सरकार विरोधी हवा खड़ी करने में कामयाब हो रहे थे तो दूसरी ओर स्कूलों में पी टी क्लासों में करवाई जाने वाली कसरतों मैं दक्ष रामदेव नाम के आर्य समाजी को भारत का कॉरपोरेट मीडिया योग गुरु के रूप में स्थापित कर आंदोलनकारी के रूप में डा0 मनमोहन सरकार के खिलाफ सड़क पर उतार कर ग्रामीण भारत में सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में कामयाब हो गया था।
15 वर्ष पूर्वविश्व कारपोरेट द्वारा डॉ मनमोहन सिंह की सरकार को गिराने के लिए मनगड़न्त और झूठ की बुनियाद पर तैयार किये गये आरोप प्रत्यारोपों के बल पर खड़े किये गये आंदोलन की बदौलत 2012 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार को उस स्थिति में उखाड़ फेंका गया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने की हैसियत भी कांग्रेस की नहीं रही थी।
डॉ मनमोहन सिंह के बाद देश को आरएसएस समर्थित भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी सरकार मिली। नरेंद्र मोदी के विषय में सर्वविदित है कि जब उन्हें प्रतिपक्ष या सवाल पूछने वाले लोग और संगठन ही सहन नहीं है तो अपनी पार्टी के अंदर अपने राजनीतिक प्रतिद्वन्दियों को वे कैसे सहन कर लेंगे। कई उदाहरण दिए जा सकते हैं कि उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी सिर्फ पार्टी की राजनीतिक लाइन से ही बाहर नहीं हुए वरन् राजनीति के मैदानों से ही बाहर हो गए या कर दिये गये।
नरेंद्र मोदी जब केंद्र की सत्ता में स्थापित हुए तब उनके साथ गुजरात मॉडल शब्द जोड़ा गया । गुजरात में विकास का कौन सा मौडल नरेन्द्र मोदी के मुख्यमन्त्री रहते हुए था यह तो देश आज तक नहीं जान पाया है लेकिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलने वाला या नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने वाले के खिलाफ उनके गुजरात के अनुयाई चील कौवों की तरह टूट पढ़ते थे वाला मॉडल नरेन्द्र मोद के प्रधान मन्त्री बनने के बाद पूरे देश में अवश्य फैलाया गया।
मोदी से सवाल पूछने वाले को या मोदी की असफलता को सार्वजनिक करने वाले को देशद्रोही, पाकिस्तानी, वर्णशंकर, धर्म विरोधी और पता नहीं क्या.क्या ठहराने को प्रतिबद्ध चीखने चिल्लाने वालों की एक बड़ी फौज पूरे देश में गली मोहल्लों से लेकर खुले मैदानो तक स्थापित कर दी गई। लखनऊ से गृहमंत्री अमित शाह का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें गृहमंत्री साफ साफ शब्दों में अपने कार्यकर्ताओं को बता रहे थे कि सरकार से सवाल पूछने वालों तथा सरकार के खिलाफ बोलने वालों को कैसे-कैसे डराना और धमकाना है ।
देश भर में बैठाई गई अराजकता से लबालब यह फौज सिर्फ सोशल मीडिया में ही नहीं वरन राष्ट्रीय स्तर के मीडिया, फिल्मी दुनियां, विश्वविद्यालयों, सामाजिक तथा सांस्कृतिक इदारों तक में स्थापित की गई थी जो बड़े पैमाने पर अभी भी अपना काम कर ही रही है।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से करीब एक डेढ़ वर्ष पूर्व जब राहुल गांधी ने पार्टी के अंदर के ढुलमुल लोगों और विपक्ष के खिलाफ अपने तेवरों को अधिक कर्कश किया तथा कारपोरेट के प्रति मोदी सरकार की प्रतिबद्धता, मोदी सरकार की राष्ट्रीय औरविश्व पटल पर विफलताओं को देश के सामने आंकड़ों के रूप में मैटेरियल एविडेंस की तरह रखना शुरू किया तथा देश भर में यात्राएं कर नौजवान कर्मकारों , प्रशिक्षित तथा अप्रशिक्षित मजदूरों, मकेनिकों, दस्तकारों, ग्रहणियों, छात्रों से खुला संपर्क करते हुए अपनी पार्टी के नौजवानों तथा अपनी पार्टी के छात्र संगठन को सड़कों पर उतारना शुरू किया तो देखते देखते 12 वर्षों से चुप्पी साध कर बैठे समाज ने मोदी और उनकी सरकार से सवाल पूछने शुरू कर दिए।
जब जनता की ओर से सरकार से सवाल पूछे जाने लगे तथा सरकार की विफलताओं पर सवाल भी उठाए जाने लगे तब तैयार किया गया आईटी सेल और गोदी मीडिया ने प्राप्त प्रशिक्षण के अनुसार चील कौवों की तरह चिल्ल-पों करना शुरू तो किया लेकिन इस बार सरकार और आरएसएस की आशा के विपरीत लोगों की तरफ से भी चैंकाने वाले प्रति उत्तरों से सोशल मीडिया अछते और गछते हुए सरकार पर भारी पड़ने लगी।
ऐसी ही परिस्थितियों के बीच लोकसभा के चुनाव के खण्डित परिणामों के बाद जब मोदी सरकार अल्पमत की सरकार के रूप में स्थापित हुई तब बड़े स्तर पर स्थितियां बदलनी ही थी।
लोकसभा चुनाव के बाद चुनाव आयोगए ईडीए सीबीआई जैसे संवैधानिक संस्थानों पर राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों के सरकार, आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी की ओर से जो और जिस प्रकार के उत्तर सामने आए उन उत्तरों पर देश के नौजवान विश्वास नहीं कर पाए और ना ही कर पा रहे हैं।
भले ही भाजपा आरएसएस और सरकार समर्थक समय-समय पर विपक्ष को चुप करवाने तथा देश के नौजवानों को डराने के अंदाज में नेपाल श्रीलंका बांग्लादेश के जन विद्रोह को भारत में नहीं होने देंगे जैसे संवाद उछलते रहे लेकिन सरकार भाजपा और आरएसएस तीनों समझ रहे थे कि सत्ता के खिलाफ देश भर में उबाल उठ रहा है।
ऐसे ही उबाल को समाप्त करने का एक तरीका यह था कि एक कृत्रिम उबाल सरकार के खिलाफ खड़ा किया जाए जिसे सरकार अपने तरीके से खत्म करके देश को बता सके कि नौजवानों के अंदर के गुस्से को उसने समझ लिया है और समाप्त कर दिया है।
ऐसे ही प्रयोग के लिये कॉकरोच शब्द की उत्पत्ति, अमेरिका से इस शब्द को लेकर राजनीतिक विशात का बिछाया जाना सोनम वांगचुक का कॉकरोच के पक्ष में बयान देनाए कॉकरोच की पहली जंतर मंतर रैली के लिये अनुमति पत्र हवाई जहाज के रनवे पर जा कर दीपके को सोंपा जाना, पहली जंतर मंतर रैली में सोनम वांगचुक का उपस्थित होना इस राजनीतिक आशंका को मजबूती ही दे रहा था कि आन्दोलनद कीविशात किसी शातिर हाथ में है।
इस विशात को बिछाने वालों को शायद अंदाजा नहीं था कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में मजबूती के साथ खड़ा आइसा संगठन बिछाई गई विशात की भीड़ में शरीक होकर विशात के मकसद पर पानी फेर कर आंदोलन को प्रगतिशीलता की ओर मोड़ देगा।
किसान आंदोलन 7 महीने चला था 750 के करीब किसानों ने शहादत दी थी तब जा कर सरकार झुकी थी। जंतर मंतर पर 50 दिन आंदोलन चला और इस आंदोलन के एक मोड़ पर आकर सरकार झुकी और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लिया गया, बावजूद इसके छात्रों का आक्रोश थम ही नहीं रहा है।
इसमें कोई दोराय नहीं है कि जंतर मंतर पर करीब कारीब 50 दिन चला छात्रों का आंदोलन पूरे देश के उन छात्रों और नौजवानों का आंदोलन बन चुका है जो नौजवान शिक्षित हैं और जानते हैं कि थोड़ी सी भी हिंसा आंदोलन के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
भारतीय जनता पार्टी आरएसएस और मोदी सरकार भी इस बात को समझ चुके हैं कि उनके खिलाफ गुस्सा देश भर के नौजवानों में फैल चुका है। सरकार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि लोग राष्ट्रीय सुरक्षा और धार्मिकता के उस कृत्रिम डर से बाहर निकल चुके हैं जिस डर को सुनियोजित तरीके से पूरे देश में फैलाया गया था। सरकार की चिंता यह भी है कि ग्रामीण भारत के अभिभावक आंदोलन के साथ तेजी से जुड़ रहे हैं।
डर के साए में पहुंच चुकी सरकार को लेकर सबसे अधिक चिंता भारत में स्थापित हो चुके कॉरपोरेट की है कि यदि सरकार की साख पूरी तरह से खत्म हो जाती है और लघु इंडस्ट्री के पैरोकार राहुल गांधी का विचार भारी पड़ जाता है तब उसका क्या होगा।




