समाज के दिलों में भर दिए गए सत्ता के डर को समाप्त करने में कामयाब रहा है छात्र नौजवानों का जन्तर-मन्तर आंदोलन।

7 मई 2026 को एन टी ए को व्हिशलब्लोअर के माध्यम से जानकारी मिली कि 3 मई को आयोजित नीट परीक्षा का पेपर लीक करवाया गया था। इसी जानकारी के सार्वजनिक होते ही एन टी ए ने नीट को परीक्षा को निरस्त करवा दिया।

7 मई से ही कांग्रेस ने विभिन्न सोशल मीडिया अकाउंटों के माध्यम से नीट परीक्षा के पेपर लीक करवाए जाने को लेकर विरोध शुरू कर दिया। इस बीच कांग्रेस ने नीट परीक्षा का प्रश्न पत्र लीक करवाए जाने तथा परीक्षा को निरस्त कर दिए जाने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा बनाने की मुहिम शुरू करते हुए घोषणा कर दी कि 17 जून से एनएसयूआई तथा युवक कांग्रेस पूरे देश में नीट परीक्षा पेपर लीक करवाए जाने तथा परीक्षाओं को निरस्त किए जाने को लेकर आंदोलन चलाएंगे।

ऐसे समय पर जब कांग्रेस पूरे देश में छात्रों को संगठित कर लामबन्द करने की योजना बना रही थी तब 15 मई 2026 को बेरोजगारों के संबंध में किसी सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगारों के लिये काकरोच शब्द का इस्तेमाल किया। यह लग बात है कि दो-चार दिन में स्वयं मुख्य न्यायाधीश ने खेद जताते हुए कहा कि उनका मंतव्य वह नहीं था जो लगाया जा रहा है।
15 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किये जाने के बाद उसी शाम सर्वोच्च न्यायालय के कई अधिवक्ताओं ने चीफ जस्टिस के बयान की निंदा भी की और सवाल भी उठाएं।

इसी दिन शायद भारतीय समयानुसार शाम के ही समय पूर्व में आम आदमी पार्टी के राजनीतिक कार्यकर्ता रहे अजीत दीपके ने व्यंग्यात्मक लहजे में ट्वीट किया कि यदि सारे कॉकरोच एक मंच पर आ जाएं तो क्या होगा।

15 तारीख की शाम तक यह सिर्फ एक वयंग था लेकिन अगले दिन कॉकरोच के नाम से बकायदा एक पैरोडी संगठन भी बन गया जो सोशल मीडिया के माध्यम से भारत में व्यापक रूप से प्रचारित प्रसारित कर दिया गया।

7 मई 2026 को नीट परीक्षा के पेपर लीक की खबर के साथ ही राहुल गांधी के आरपार की लड़ाई के मूड में आते ही कांग्रेस तथा कांग्रेस के छात्र संगठन सिक्रिय हो गया तथा देशभर में जिला स्तर पर छुटपुट कार्यक्रम भी शुरू कर दिए गए।

17 जून 2026 को राजस्थान के कोटा से कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने आधारिक रूप से आंदोलन का बिगुल भी बजा दिया तथा 30 जून को एनएसयूआई ने देश भर के 28 शहरों से शिक्षा मंत्री महेंद्र प्रधान के स्थीफे की मांग को लेकर गूंज के नाम से 40 दिवसीय जनसंपर्क का कार्यक्रम शुरू कर दिया। इसी क्रम में कांग्रेस समर्थित छात्र संगठन तथा युवा कांग्रेस संगठन ने 10 जुलाई को प्रयागराज 11 जुलाई को पटना तथा 14 जुलाई को दिल्ली में गंभीर चिंतन शिविरों के माध्यम से विरोध प्रदर्शन भी किये। यह पूरा का पूरा कार्यक्रम कांग्रेस संगठन का राजनीतिक कार्यक्रम था जो देश भर में एक साथ चला रहा।

दूसरी ओर अजीत दीपके जो अमेरिका में रह रहे हैं ने आह्वाहन कर दिया कि वे भारत आ रहे हैं और जंतर मंतर में एक बड़ा प्रदर्शन कॉकरोच पार्टी करेगी। इसी घोषणा के एक दिन बाद कॉकरोच पार्टी की ओर से कहा गया कि 6 जून को जंतर मंतर में प्रदर्शन किया जाएगा तथा देश भर के बेरोजगारों का आह्वाहन किया गया कि वे 6 जून को जंतर मंतर पहुंचे।

6 जून को दीपके हवाई जहाज से दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरे तब वहां दिल्ली पुलिस उन्हें जंतर मंतर में प्रदर्शन करने का इजाजती पत्र देने के लिए एयरपोर्ट के बाहर उनका इंतजार कर रही थी। पुलिस के इस इंतजार ने कई सवाल भी खड़े किये कि जिस जंतर मंतर में बैठने या प्रदर्शन करने के लिए इजाजत लेना बहुत अधिक टेढ़ी खीर है उस जंतर मंतर में प्रदर्शन की इजाजत का पत्र सौंपने के लिए दिल्ली की पुलिस एयरपोर्ट के बाहर इंतजार कर रही है।

6 जून को करीब 5 से लेकर 7हजार तक लोग जंतर मंतर में पहुंचे और कुछ घंटे का प्रदर्शन भी किया गया।

यहां बता दिया जाना चाहिए कि 6 जून को जब कॉकरोच जंतर मंतर में रैली कर रहे थे उसी दिन दिल्ली से लगे हरियाणा राज्य में युवक कांग्रेस तथा एनएसयूआइ के छात्र संयुक्त रूप से पेपर लीक का विरोध कार्यक्रम भी चला रहे थे जहां उन पर पानी की तेज बौछार तथा जबरदस्त लाठीचार्ज करके आंदोलन को खदेड़ने की पूरी कोषिस भी पुलिस कर रही थी।

देश के लिये यह चोंकाने वाला ही था की एक तरफ दिल्ली की पुलिस कॉकरोच को जंतर मंतर में प्रदर्शन करने की इजाजत का पत्र देने के लिए एयरपोर्ट पहुंची हुई थी तो दूसरी ओर हरियाणा में हरियाणा और पंजाब पुलिस एनएसयूआइ तथा यूथ कांग्रेस के नौजवानों के दमन के लिए हर संभव तरीका अपना रही थी।

पेपर लीक को लेकर सिर्फ एनएसयूआई ही देश भर में आंदोलन नहीं कर रही थी बल्कि वाम पंथी छात्र संगठन एसएफआई तथा आइसा भी सड़कों पर थी। 6 जून को आइसा तथा एसएफआई जंतर मंतर में कॉकरोच के आंदोलन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए दिखाई दिए।

जून के पहले पखवाड़े के अंतिम दिनों में खबर फैली की कॉकरोच 20 जून से जंतर मंतर में विधिवत रूप से अनिश्चित कालीन धरना प्रारंभ करेंगे। इस खबर के अनुसार कॉकरोच पार्टी ने 20 जून को जंतर मंतर पर डेरा डाल भी दिया। कॉकरोच के साथ ही एसएफआई तथा आइसा भी जंतर मंतर पर पहुंचे थे जो आंदोलन के साथ अंतिम समय तक बने रहे।

20 जून को जंतर मंतर पर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम बांगचुक जो दुनियां में एनजीओ के क्षेत्र में बहुत बड़ा नाम रखते हैं तथा सीपीआई (एमएल) के राष्ट्रीय सचिव दीपांकर भट्टाचार्य की मौजूदगी देश भर में राजनीतिक खबर के रूप में छपी और पढ़ी गई।

28 जून को जंतर मंतर पर चल रहा कॉकरोच का धरना जब क्रमिक अनशन में तब्दील हुआ तब क्रमिक अनशन पर सिर्फ सोनम ही नहीं बैठे बल्कि आइसा के 6 छात्र नेता भी अनशन पर बैठे।
आमरण अनशन के शुरुआती दौर में सोशल मीडिया या राष्ट्रीय मीडिया या राष्ट्रीय स्तर के गोदी मीडिया ने आमरण अनशन को सिर्फ सोनम पर ही केंद्रित रखा। आमरण अनशन पर बैठ आइसा के छात्र आठवें दिन के बाद उठाए जाने लगे लेकिन आयसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोहरा अनशन पर डटी रहीं।

इस बीच अचानक 16 जुलाई से सोशल मीडिया में नेहा बोहरा के स्वास्थ्य को लेकर चिकिस्कीय चिंता राष्ट्रीय चिंता के रूप में उभरने लगी तथा सोशल मीडिया नेहा बोहरा के जज्बे का मुरीद होता हुआ दिखाई देने लगा तो पूरे देश से नेहा बोहरा को लेकर चिंता भी उभरने लगी और नेहा को शाबाशी भी मिलने लगी। क्यों कि नेहा उत्तराखण्ड से हैं तो उत्तराखण्ड के सभी घरों में नेहा पर चर्चा होनी ही थी।
इस बीच वह गोदी मीडिया जो जेएनयू को बदनाम करने में गर्व महसूस करता है यकायक मुखरित हुआ और सोनम वांगचुक को लेकर चुप्पी तोड़ते हुए उसने खबरें बनानी और दिखानी शुरू कर तो दीं । इधर सोशल मीडिया में नेहा बोहरा को जिस प्रकार एक पढ़ने लिखन वाली, समझने वाली, सोचने वाली और निर्णय लेने वाली युवा छात्र नेता के रूप में स्थान मिल चुका था उस स्थान को जेएनयू विरोधी गोदी मीडिया कम कर नहीं सकता था।

18 जुलाई की सुबह बहुत ही नाटकीय अंदाज में सोनम वांगचुक को धरने से उठा कर स्वास्थ्य लाभ हेतु अस्पताल में भर्ती कर दिया गया। सोनम को उठाए जाने के बाद पुलिस ने कई दफा नेहा बोहरा को भी उठाने का प्रयास तो किया लेकिन छात्रों की जबरदस्त किले बन्दी के रहते पुलिस अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाई। 20 जुलाई को प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री शबाना आजमी, प्रभास राज, वकील प्रशांत भूषण तथा चिन्तक योगेंद्र यादव ने नेहा बोहरा को जूस पिलाकर अनशन तुड़वा दिया।

बेरोजगारों के नारे से शुरू हुआ कॉकरोच आंदोलन छात्रों का आंदोलन कैसे बन गया-


भारत की सरकारों के लिए अच्छी खबर यही रही है कि भारत में बेरोजगार संगठित नहीं है और उसे संगठित करना असंभव ही है। देश के सुधीजन पहले दिन से ही इस बात को मान रहे थे कि सिर्फ बेरोजगारों के सहारे जंतर मंतर में लंबा आंदोलन नहीं चलाया जा सकता है। 20 जून को जब जंतर मंतर में विधिवत रूप से धरना शुरू हुआ तो उस धरने में एसएफआई और आइसा की मौजूदगी ने देश और दुनिया भर के छात्रों का ध्यान जंतर मंतर की ओर आकर्षित करना ही था। 28 जून को जंतर मंतर पर आमरण अनशन पर कॉकरोच की शक्ल में बैठने वाले यदि सोनम वांगचुक थे तो छात्रों के पक्ष में बैठने वाले 6 छात्र नेता भी थे। छात्र नेताओं की यही उपस्थित बेरोजगारों के नाम से शुरू हुए आंदोलन को छात्रों के आंदोलन के रूप में बदलने में सफल रही।

वाम छात्र संगठनों की ढपली और जन गीत किसीको भी अपनी ओर आसानी से आकर्षित तो कर ही लेते हैं। यही आकर्षण इस आंदोलन को छात्र आंदोलन बनाने में अहम भूमिका भी निभा गया।

15- 16 जुलाई के बाद सोशल मीडिया का फोकस नेहा पर जाने के बाद चमत्कारिक परिवर्तन यह हुआ कि आंदोलन छात्रों की ओर थ ही़ देश ने इसको छात्रों का आंदोलन स्वीकार कर लिया था।
केंद्र सरकार क्यों झुकी-

जब तक यह आंदोलन कॉकरोच के बैनर के रूप में स्थापित था तब तक सरकार की चिंता में यह आंदोलन नहीं के बराबर था। सोनम वांगचुक को उठाए जाने पर देशभर से उतनी तीखी प्रतिक्रियाएं नहीं हुई जितनी तीखी प्रतिक्रियाओं की उम्मीद हम जैसे लोग लगाए हुए थे। इसके इतर नेहा को लेकर देशभर से जो प्रतिक्रियाएं नेहा के पक्ष में उठ रही थी उन प्रतिक्रियाओं के रहते सरकार की बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक था।

जेएनयू की छात्रा नेहा बोहरा जो आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी है के प्रति देश भर के छात्रों और नौजवानों का आकर्षण बढ़ना अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को चिंता में डाल चुका था। आरएसएस भी इस बात से चिंतित थी कि जिस जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तथा वहां सक्रिय वाम राजनीति को बदनाम करने के लिए भारतीय जनता पार्टी तथा उसके सभी घटक दलों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी को जेएनयू की एक छात्रा जो स्वयं वाम संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष है ने हाशिए में ला खड़ा किया है ।

इधर जेएनयू की छात्रा नेहा बोरा द्वारा स्वयं अनशन तोड़े जाने के बाद भाजपा, आरएसएस तथा विद्यार्थी परिषद की चिंता यह थी कि नेहा यदि आंदोलन के लिए किसी कार्यक्रम की घोषणा कर करने के बाद उस कार्यक्रम को सफल बनाने के नाम पर देश भर में दौरे पर निकल पड़ी तब छात्रों में व्याप्त गुस्से को विस्फोटक होने से रोका नहीं जा सकेगा। यह ऐसी स्थिति थी कि सरकार के पास एन केन आंदोलन को समाप्त करवाने के अलावा कोई रास्ता बचा ही नहीं था।

इस पूरी चिंता के बीच स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा एक प्रयोग यह भी किया गया कि वह सबसे पहले इंस्टाग्राम में आए, इंस्टाग्राम के माध्यम से उन्होंने छात्रों के नाम एक संबोधन तैयार किया और प्रचारित प्रसारित किया। इस इंस्टाग्राम संवाद के कुछ ही समय के बाद अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ ले रहे सोनम का अनशन तुड़वाने का एक कार्यक्रम भी बनाया गया। कुछ लोग अनसन तुड़वाने के लिए पहुंचे। सोनम साहब को भगवा और सफेद मफलर उड़ाए गए तथा घोषणा की गई कि स्वास्थ्य लाभ ले रहे सोनम साहब ने अनशन तोड़ दिया है। इस क्रिया के कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री ने सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता व्यक्त की और अनुरोध किया कि वह अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखें।

प्रधानमंत्री द्वारा किए गए इस पूरे प्रयोग के बाद देश मान बैठा था कि 10-12 घंटे के अंदर आंदोलन को समाप्त करने के लिए आंदोलन की मुख्य मांग देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लिया जाएगा। करीब 12-14 घंटे के बाद पूरे देश ने सुना, देखा, जाना कि सरकार झुक गई है और छात्रों की मांग मान ली गई है। छात्र भी इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए अपने-अपने घरों की ओर जा चुके हैं। नेहा ने कहा है कि आइसा सरकार की घोषणाओं पर नजर रखेंगे। कांग्रेस ने कहा है कि आंदोलन को समाप्त नहीं होने दिया जाएगा। भारतीय जनता पार्टी के वे नेता जो इस आंदोलन के खिलाफ किसी भी हद कर जाकर बयान बाजी कर रहे थे कौमा की स्थिति में बैठे हुए हैं।

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