402 साल पहले धर्म प्रचार के लिए तिब्बत जा रहे पुर्तगाली पादरी
एंटोनियो डी एंड्रेड बद्रीनाथ के प्राकृतिक सौंदर्य देखकर भौचक्के रह गए। लेकिन अपने धार्मिक दुराग्रह के कारण बद्रीनाथ से जुड़ी कथाओं को मनगढंत बताकर पुजारियों से सवाल जवाब करने लगे। उन्होंने तिब्बत सीमा से लगे गढ़वाल के अंतिम गांव माणा का जनजीवन, खानपान और महिलाओं की स्थिति का भी विवरण दिया है। पेश है उनकी तिब्बत यात्रा की अगली कड़ी-
बद्रीनाथ मंदिर एक पहाड़ी की तलहटी में स्थित है, जहाँ से स्वच्छ जल के कई झरने निकलते हैं। इनमें से एक, इतना गर्म पानी का झरना है कि, हाथ थोड़ी देर के लिए भी उसकी गर्मी सहन नहीं कर पाता है। यह गर्म पानी, तीन भागों में बँटता है और ठंडे पानी के साथ मिलकर तीन तालाबों में तीर्थयात्रियों के स्नान के काम आता है। यात्री मानते हैं कि, इन तालाबों में स्नान से आत्मा शुद्ध हो जाती हैं और वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। उनके जीवन में इससे बड़ा सौभाग्य कुछ नहीं कि, वे इस जल में स्नान कर सकें।
मंदिर ठीक उसी स्थान पर बना है जहाँ से झरना फूटता है। यह स्थान वहाँ के ब्राह्मणों ने चुना है, जिन्होंने इसके साथ हजारों मनगढ़ंत कहानियाँ जोड़ी हैं। उनमें से एक यह है कि अग्निदेव, खुद के द्वारा संसार में किए गए अनेक अनिष्टों- घर और संपत्ति जलाना, खेत और वृक्ष नष्ट करने के पापों से पछताकर, बद्रीनाथ के पास पाश्चाताप के लिए पहुंचे। बदरीनाथ ने कहा कि, वह उनके साथ यहीं रहे। ऐसा करके वह सभी पापों से मुक्त हो जाएंगे। अग्निदेव ने बदरीनाथ की इस कृपा को वरदान माना और उनके चरणों में बस गये। इसीलिए इस झरने से इतना गर्म पानी निकलता है। मैंने पुजारी से पूछा कि, अग्निदेव, बदरीनाथ के चरणों में शांत बैठे हैं तो अभी भी संसार में वही अनिष्ट क्यों कर रहे हैं, जैसा पहले करते थे। पुजारी ने कहा, जो अग्नि अभी संसार में विचरण कर रही है, वह अग्नि के पंद्रह भागों में से केवल एक भाग है। और शेष चौदह भाग बद्रीनाथ के चरणों में शांत हैं।
पुजारी यह भी कहते हैं कि, बदरीनाथ, जिस किसी वस्तु को छूते थे, वह सोने में बदल जाती थी। चाहे वह लकड़ी हो, पत्थर हो, या कोई अन्य वस्तु। परंतु एक लोहार ने ज्यादा सोना पाने के लिए लोभ वश, लोहा बद्रीनाथ के चरणों मेें बैठे अग्निदेव पर डाल दिया और फिर गरम लोहा बदरीनाथ को छुआ दिया। इससे बदरीनाथ को इतना क्षोभ हुआ कि उन्होंने फिर कभी चीजों को सोने में नहीं बदला।
मंदिर के कोष में बेशकीमती चढ़ावा
बदरीनाथ मंदिर में जो चढ़ावा आता है, अनगिनत है। कहा जाता है कि, मंदिर के कोष में सोना चाँदी, मोती और बेशुमार रत्न हैं। साल के तीन महीनों को छोड़कर बाकी समय मंदिर भारी बर्फ से ढका रहता है। इस समय आसपास के गाँव रहने योग्य नहीं होते। ग्रामीण तीन-चार दिन की यात्रा कर बर्फविहीन निचले क्षेत्रों में चले जाते हैं।
यहां की सारी जमीन श्रीनगर के राजा के अधीन हैं, पर यहां के लोग भिन्न जाति के हैं। उनकी भाषा भी भिन्न है। वे कच्चा मांस खाते हैं। वे जैसे-जैसे वे भेड़ की खाल उतारते जाते हैं, वैसे-वैसे उसे खाते जाते हैं। चर्बी और भेड़ के पैरों की हड्डी की मज्जा, उनकी पहली पसंद है। आँतों को पानी में ठीक से धोकर, छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर, तुरंत खा लेते हैं। कुछ मांस वे पकाते जरूर हैं, पर पहले उबाल से ज्यादा नहीं। वे कहते हैं कि ज्यादा पकाने से मांस का स्वाद और तासीर खत्म हो जाती है। वे बर्फ को वैसे ही खाते हैं जैसे हम रोटी या मिठाई। मैंने एक, दो-तीन साल की बच्ची को बर्फ का टुकड़ा खाते देखा और सोचा कि इससे उसे नुकसान होगा। मैंने उसे किशमिश दिलवाई, जो राजा ने हमें भेजी थी। उसने किशमिश मुंह में डाली और तुरंत थूक दी और बर्फ के लिए रोने लगी।
स्त्रियाँ पहनती है पत्तियों के गहने
यहां के लोग बलवान और स्वस्थ हैं। भारत के पेट-दर्द जैसे रोग इन्हें नहीं होते। स्त्रियाँ खेत जोतती और बोती हैं, और पुरुष ऊन कातते हैं। स्त्रियाँ कानों में ताड़ के पत्तों जैसी पत्तियों के गहने पहनती हैं। इन गांवों में अंतिम, जिसे माणा कहते हैं, में हम कई दिन इस प्रतीक्षा में रुके रहे कि, दर्रे की बर्फ पिघल जाए। दर्रे को साल में केवल दो महीनों में ही पार किया जा सकता है। शेष दस महीने व्यापार संभव नहीं होता।
इस अंतिम गाँव से कुछ विशाल चोटियां चढ़नी होती हैं, जिन्हें वर्ष के उन दो महीनों में, बीस दिनों में पार किया जाता है। वहाँ कोई बस्ती नहीं है। न कोई वृक्ष, न घास। केवल बर्फ की चट्टानें हैं, जिन पर निरंतर बर्फ गिरती रहती है। जब बर्फ पिघलती है, जमीन कुछ स्थानों पर खुली दिखाई देती है। वहाँ बर्फ इतनी सघन होती है कि उसके ऊपर चलनाआसान होता है परंतु न तो लकड़ी मिलती है, न कुछ ऐसा, जिससे आग जलाई जा सके। इसलिए भुने हुए जौ का आटा, पानी में डमिलकर एक गाढ़ा घोल बना लिया जाता है और उसे बिना पकाए ही पी लेते हैं। इसी तरह वे उस मरुस्थल में सफर करते और जीवित रहते हैं। फिर भी बहुत-से लोग वहाँ मर जाते हैं। वे कहते हैं कि उस खुली भूमि से कुछ विषैली भाप निकलती है, जिससे किसी व्यक्ति को, बिना पैर या हाथ में दर्द हुए, ऐसी मूर्छा आ जाती है कि, पंद्रह मिनट से कम समय में उसकी मौत हो जाती है।
राजा के आदेश के बावजूद तिब्बत को निकले
जैसे ही बर्फ पिघलती है, बद्रीनाथ का राजा (श्रीनगर का राजा) तुरंत तिब्बत के राजा से, जिसे वह एक निश्चित कर देता है, व्यापार के लिए काफिलों को तिब्बत में प्रवेश की इजाजत मांगता है।
कुछ दिन हम दर्रा खुलने की प्रतीक्षा करते रहे, ताकि, पहले काफिले के साथ तिब्बत में प्रवेश कर सकें। इसी बीच हमें खबर मिली कि, श्रीनगर का राजा, हमें वहीं रोकने का आदेश भेज रहा है। यह जानकर बड़ी वेदना हुई कि, इतनी कठिनाइयों का सामना करने के बाद भी हम तिब्बत में प्रवेश नहीं कर पाएंगे। ऐसे में मैंने दर्रा खुलने का इंतजार किए बिना गुप्त रूप से, आगे बढ़ने का फैसला कर लिया। मैंने अपने भाई को इस गाँव में छोड़ दिया और एक दिन अल सुबह दो ईसाई युवकों और एक स्थानीय पहाड़ी मार्गदर्शक के साथ माणा दर्रे के लिए निकल पड़ा।
क्रमशः जारी





