अभी आपातकाल खत्म हुआ था। देश में ‘समग्र क्रान्ति’ के नारे से निकले राजनीतिक विकल्प ‘जनता पार्टी’ लोगों के बीच अपनी विश्वसनीयता बना चुकी थी। इसी का परिणाम था कि 1977 में हुये आम चुनाव में चैगुटे ने इंदिरा गांधी को हराकर सत्ता प्राप्त कर ली। हम लोग तब सातवीं में पढ़ते थे। हमारी गगास घाटी में न बिजली थी, न सड़क। हां, देश में एक बड़े राजनीतिक बदलाव और उसमें शामिल नेता घर-घर पहचाने जाते थे। हम पहली बार लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, राजनारायण, चैधरी चरण सिंह, हेमवतीनन्दन बहुगुणा, जार्ज फर्नाडीज, मधु लिमये, मधु दंडवते, कर्पूरी ठाकुर, किशन पटनायक, चन्द्रशेखर, अटलबिहारी वाजपेयी, बाबू जगजीवन राम सरीखे नेताओं के नामों से परिचित हो रहे थे। जनता पार्टी की सरकार आई तो उसने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से नये मंत्रिमंडल का एक बड़ा सुंदर पोस्टर जारी किया, जो स्कूलों में या सरकारी दफ्तरों में लगाया जाता था। इस पोस्टर में सबसे ऊपर राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी, उपराष्ट्रपति बीडी जत्ती और नीचे पूरे मंत्रिमंडल के सदस्यों के चित्र थे। मैंने उसे सबसे पहले बग्वालीपोखर के डाकखाने में दूर से देखा। बाद में वह हमारे विद्यालय में भी आ गया। मैंने अपने सामान्य ज्ञान के लिए उस पोस्टर के सारे नाम अपनी काॅपी में उतार लिये थे और अपने साथियों को उन नामों को बताकर अपनी देश-दुनिया की जानकारियों का लोहा मनवाता था। उन दिनों इस तरह की सूचनाएं हमारे जैसे दूर-दराज के क्षेत्रों के आम बच्चों के लिए दूभर ही होती थी। सूचनाओं का सबसे बड़ा साधन रेड़ियो था, वह भी सभी के पास उपलब्ध नहीं था। खैर, देश में बदलाव की उत्कंठा और उम्मीद से यह भवन ढाई साल में ही भरभराकर गिर गया।
उन दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक चर्चित नाम था शोबन सिंह जीना जी का। जिन्हें हम जनसंघ के संस्थापकों, भारतीय जनता पार्टी के जनकों, एक विद्वान अधिवक्ता, अध्येता, जनपक्षधर राजनेता के रूप में जानते रहे हैं। हमारी पुरानी पीढ़ी, हमारी पीढ़ी और हमारे बाद की पीढ़ी के लोगों ने उन्हें किसी न किसी रूप में देखा-जाना। कई तो उनके साथ रहे भी। कई तरह की वैचारिक भिन्नता के बावजूद शोबन सिंह जीना समाज के एक बड़े वर्ग में अपनी गहरी पकड़ रखते थे। उनकी विचारधारा से सहमत तो साथ थे ही, असहमत लोग भी उनके मुरीद रहे हैं। आज उनकी जयन्ती है। हम सब उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
शोबन सिंह जीना जी को जानने का रास्ता पिताजी के साथ बग्वालीपोखर पैदल स्कूल जाने के साथ खुलता है। पिताजी इस तरह के लोगों के बारे में बताते रहते थे। जब मौका लगता हमें रानीखेत ले जाकर बाहरी दुनिया भी दिखाते। उत्तर प्रदेश में 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी। रामनरेश यादव मुख्यमंत्री बने। शायद यह 1978 का वर्ष रहा होगा। पूरे इलाके में लोग आपस में चर्चा कर रहे थे। एक-दूसरे को बता रहे थे कि बिन्ता में सड़क पुल का उद्घाटन करने पर्वतीय विकास मंत्री शोबन सिंह जीना आ रहे हैं। द्वाराहाट और सोमेश्वर को जोड़ने वाला यह पुल उस समय हमारे इलाके में इतिहास का एक नया पड़ाव बना रहा था। शोबन सिंह जीना जी के बारे में बहुत सी कहानियां, बहुत सारे मिथक हमारे इर्द-गिर्द गढ़े जा रहे थे। उनके बारे में पहली बात हमने सुनी कि वे कोई भी बड़े से बड़ा मुकदमा जीत सकते हैं। हमारे यहां उन दिनों ऐतिहासिक रानीखेत तहसील थी, जिसे पाली परगना के नाम से जाना जाता था। आज भी रानीखेत तहसील को परगना पाली ही कहा जाता है।
हमारी गगास घाटी से रानीखेत तहसील में मुकदमे लड़ने वाले लोग झुंड के रूप में जाते थे। उनमें वादी-प्रतिवादी, पटवारी सब साथ होते थे। अगर किसी ने किसी को धमकाना हो तो एक जुमला था- ‘त्यैके पांगर डावक स्योव भैटूंल।’ अर्थात तुझे पांगर के पेड़ की छांव में बैठाऊंगा। इसका अर्थ यह हुआ कि रानीखेत तहसील परिसर में बहुत पुराने पांगर के पेड़ हैं, जिनके नीचे फरियादी बैठते थे। हमारे लिये मुकदमा, वकील और अदालत बहुत खतरनाक और डरावने होते थे। शोबन सिंह जीना के बारे में हमारे यहां के मुकदमेबाज कहते थे कि वे ‘मैंसमार’ को भी बचा लेते हैं। शायद वकालत में अल्मोड़ा में ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में शोबन सिंह जीना की तूती बोलती थी। जब पिताजी ने कहा कि हमें भी शोबन सिह जीना के इस कार्यक्रम में जाना है तो हमारे कौतुहल की सीमा नहीं थी। हम सारे स्कूल के बच्चे दो लाइनों की कतार में बग्वालीपोखर से गगास के किनारे-किनारे सात किलोमीटर दूर बिन्ता गये। बिन्ता में अपार जनसमूह इकट्ठा था। शोबनसिंह जीना आये। उन्हें पहली बार देखने का मौका मिला। बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व और ओजस्वी वक्ता। उनके चाहने वालों में कुछ लोग नहीं, बल्कि गांव के गांव थे।
शोबन सिंह जीना जी का जन्म अल्मोड़ा अल्मोड़ा जनपद के मल्ला स्यूनरा पट्टी के सुनौली में 4 जुलाई, 1909 में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही पास बसौली में हुई। बाद में हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा अल्मोड़ा से की। जीना जी बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने हमेशा उच्च अंक प्राप्त कर छात्रवृत्ति प्राप्त की। इसी से वे आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद गये और वहां से स्नातक और विधि स्नातक की परीक्षा पास की। जीना जी को पहाड़ से बहुत लगाव था, इसलिए इलाहाबाद में अपना स्वर्णिम भविष्य छोड़कर अल्मोड़ा आ गये और 1933 में अल्मोड़ा से ही अपनी वकालत शुरू की। एक प्रतिभाशाली वकील, अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदारी और प्रतिबद्धता से आगे बढ़ाने वाले जीना जी ने गहरे अध्ययन से अपने को गढ़ा। उन्होंने वकालत के अलावा इतिहास, साहित्य, भाषा, संस्कृति दर्शन, विज्ञान और पुरातत्व में अपने ज्ञान का बड़ा आकाश बनाया। इसके लिए उन्होंने न केवल गहरा अध्ययन किया, बल्कि दूरस्थ सीमांत क्षेत्रों की लंबी यात्रायें भी की। उन्होंने ज्ञान को विस्तार देते हुए अपने निवास ‘प्रेमालय’ में एक बहुत समृद्ध पुस्तकालय बनाया था। उनकी योग्यता को देखते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने राय बहादुर की उपाधि दी, लेकिन कभी इस पदवी के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाया।
शोबन सिंह जीना ने सामाजिक चेतना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया। पहले उन्होंने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत शिक्षा के प्रचार-प्रसार और आम लोगों को शिक्षित करने के मिशन के साथ की। उन्हें लगता था कि यहां के बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना पड़ता है। इसलिए उन्होंने वर्ष 1949 में अम्बादत्त पंत तथा मोहन लाल वर्मा के साथ मिलकर अल्मोड़ा में डिग्री कॉलेज की स्थापना की थी। उस समय यह काॅलेज आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध हुआ था। इन तीनों के प्रयासों से कॉलेज के लिए जमीन तथा वित्तीय संसाधन जुट सके। वर्ष 1972 में यह काॅलेज सरकार के अधीन आ गया। बाद में 1973 में जब कुमाऊं विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो इसे संघटक महाविद्यालय बनाया गया। अब यह उन्हीं के नाम पर एक विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है। इसी दौर में 1949 में शोबन सिंह जीना ने क्षत्रिय समाज मे शिक्षा के उत्थान के लिए ‘कुमाऊं राजपूत परिषद’ की स्थापना की। सामाजिक चेतना के लिए ‘कुमाऊं राजपूत’ नाम से एक समाचार पत्र भी निकाला। इस समय तक जीना जी एक बड़े अधिवक्ता के रूप में अपना विशिष्ट स्थान बना चुके थे।
शोबन सिंह जीना के राजनीतिक सफर की शुरुआत आजादी के साथ ही शुरू हो गई थी। एक विशेष राजनीतिक धारा के साथ उनका जुड़ाव हो गया था और उसी की विचार प्रक्रिया उन्हें अपने तरह से राजनीति के लिए तैयार कर रही थी। आजादी के बाद 1950 में जब संविधान को अंगीकार कर लिया गया तो पहला चुनाव 1952 में हुआ। इससे पहले 21 अक्टूबर, 1951 को जनसंघ की स्थापना हुई। शोबन सिंह जीना उसके संस्थापकों में रहे। वे अल्मोड़ा जनपद के जनसंघ के पहले अध्यक्ष रहे। वर्ष 1952 में उन्होंने ‘दीपक’ चुनाव निशान से पहला चुनाव लड़ा। इसके बाद उन्होंने 1971, 1977 में चुनाव लड़ा। आपातकाल के बाद जब 1977 में ‘जनता पार्टी’ अपने चुनाव निशान ‘हलधर किसान’ के साथ उतरी तो वे बारामंडल से विधायक चुने गये और रामनरेश यादव मंत्रिमंडल में पर्वतीय विकास मंत्री के रूप में कैबिनेट मंत्री बनाये गये। 1980 में जब भारतीय जनता पार्टी बनी तो वे उसके भी संस्थापक रहे। उत्तराखंड के तमाम सवालों को वह अपनी विचारधारा के अनुसार उठाते रहे। वर्ष 1989 में उनका निधन हो गया।
शोबन सिंह जीना जी को जानने-समझने का दूसरा दौर हमें तब मिला जब हम अल्मोड़ा आने-जाने लगे। उन दिनों अल्मोड़ा में दो बड़े भवन चर्चित थे- एक जागनाथ हाॅल और दूसरा दानपुर भवन। इन दोनों में हमारी दिलचस्पी इसलिए थी कि जागनाथ हाॅल सिनेमा घर था जो हम जैसे ग्रामीण परिवेश के बच्चों के लिए नई दुनिया को देखना था, दूसरा दानपुर भवन, जिसके दोमंजिले में बना हाथी हमारे कौतुहल को बढ़ाता। लेकिन इनके बीच हमारी चेतना को समृद्ध करने वाला सबसे महत्वपूर्ण स्थान था ‘प्रेमालय’ यह शोबन सिंह जीना जी का घर था। जागनाथ हाॅल को जाने वाले वाले रास्ते में नीचे को उतरती सीढ़ियों के बाद फूलों के गमले से सजी बड़ी कोठी और उसके अंदर पुस्तकों का बड़ा संकलन बताता था कि शोबन सिंह जीना ऐसे बनते हैं। कई बार ‘प्रेमालय’ में जाना हुआ। कई सालों बाद पता चला कि ‘प्रेमालय’ में कोई माॅल बनने जा रहा है। उस समय मैं ‘जनपक्ष आजकल’ का संपादन कर रहा था। मैंने अपने सहयोगी विनोद जोशी से इस पर रिपोर्ट करने को कहा। तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूडी जी को भी ‘प्रेमालय’ की महत्ता बताई, लेकिन वहीं हुआ जो हमारी विरासतों के साथ होता आया है। जब ‘प्रेमालय’ को ढहाया जा रहा था, तब हमने इस पर जो रिपोर्ट लिखी उसका सार है-
‘भारतीय जनता पार्टी हमेशा परम्परा और विरासत के संरक्षण की बात करती रही है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पहरेदारो से अपनी ही विरासतों का संरक्षण नहीं हो रहा है। कभी पहाड़ में जनसंघ के पुरोधा रहे शोबन सिंह जीना का अल्मोड़ा स्थित निवास ‘प्रेमालय’ जिस संवेदनहीनता और अदूरदर्शी सोच की भेंट चढ़ा, उसने एक विरासत एवं राजनीतिक विचार के केन्द्र को ध्वस्त कर दिया है। ‘प्रेमालय’ स्वर्गीय शोबन सिंह जीना का निवास ही नहीं, बल्कि आज की भारतीय जनता पार्टी की बुनियाद है। पहाड़ की पुरानी वास्तुकला से निर्मित यह बंगला समकालीन समाज को प्रतिबिम्बित करता था। मुख्य सड़क से घर के आंगन तक जाने वाली सीढियां इस घर को गरिमा प्रदान करती थीं। लकड़ी की बेहतरीन नक्काशी से बने दरवाजे और पत्थर की छत किसी संपन्न वकील का घर नहीं, बल्कि एक धरोहर होने का आभास कराती रहती थी। पटालों से बना आंगन इस भवन की गरिमा और बढ़ाता था। जनसंघ के संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने शोबन सिंह जीना के घर में आकर अपनी राजनीतिक गतिविधियां चलायीं। ‘प्रेमालय’ का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि जनसंघ की धारा के तमाम नेता यहां आकर राजनीतिक विमर्श करते रहे। जनसंघ के बड़े-बड़े नेता बाबा साहेब देवरस, डॉ. रज्जू भैय्या, कुशाभाऊ ठाकरे, बलराज मधोक आदि नेता ‘प्रेमालय’ का आतिथ्य स्वीकार चुके हैं। बाद में सुन्दर सिंह भंडारी, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, विजयाराजे सिंधिया के अलावा अधिकतर भाजपा नेताओं का ‘प्रेमालय’ ही अड्डा होता था। आपातकाल के खिलाफ बने चैगुटे की गतिविधियों का केन्द्र भी यह भवन रहा। वर्ष 1980 में जब भारतीय जनता पार्टी बनी, तो जीना अल्मोड़ा जनपद के पहले जिलाध्यक्ष बने। एक तरह से भाजपा संगठन की नींव का पत्थर भी ‘प्रेमालय’ रहा।
शोबन सिंह जीना ने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी अपनी आवाज उठायी थी। समाज, संस्कृति, राजनीति, इतिहास दर्शन के अलावा व पुरातत्व के अध्येता भी थे। इन सभी के दर्शन उनकी निजी लाइब्रेरी में देखने को मिलते थे। एक सफल अधिवक्ता के रूप में उन्होंने जो अमिट छाप छोड़ी, उसका भी प्रत्यक्षदर्शी ‘प्रेमालय’ रहा था। शोबन सिंह जीना के इस निवास को एक संग्रहालय के रूप में तब्दील करने की बात कई बार उठी। सरकार को कई संगठनों ने अपनी ओर से प्रतिवेदन भेजे। यहां संग्रहित अमूल्य पुस्तकें, जीना की राजनीतिक यात्रा के दस्तावेज, यहां हुयी बैठकों की स्मृतियां, जनसंघ से लेकर भाजपा की स्थापना के ऐतिहासिक क्षण, आपातकाल के खिलाफ मुखरित हुए स्वर, 1952 से लेकर 1988 तक के तमाम चुनावों की रणनीतियां, वन अधिनियम 1980 के खिलाफ बने प्रारूप, उत्तरांचल राज्य संघर्ष समिति की स्थापना आदि ऐसे पड़ाव थे, जिन्हें एक धरोहर के रूप में संजोया जा सकता था। दुर्भाग्य से अब यह एक माॅल बनने वाला है।’
शोबन सिंह जीना जी की राजनीतिक धारा से घोर असहमति और विरोध के साथ हम लोग बड़े हुये। वह जिस ‘जनसंघ’ और ‘भारतीय जनता पार्टी’ के संस्थापकों में रहे हैं वह युवाओं को किस दिशा में ले जा रही है, इस पर बड़ी बहस है। उनके खिलाफ एक लड़ाई भी है। बावजूद इसके शोबन सिंह जीना के उस पूरे लोकतांत्रिक चरित्र को जब हम याद करते हैं, जिसमें बहस की गुंजाइश थी। दूसरे विचार को सुन सकने की शक्ति थी। कई बार तो उन्होंने अपने विरोधियों के साथ खड़े होकर लोकतंत्र के पक्ष में आवाज उठाई। हमारे अग्रज और पहाड़ के सवालों पर हमेशा आंदोलित पीसी दा (पीसी तिवारी) बताते हैं- ‘एक बार किसी आंदोलन में पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी छात्रों पर लाठी चार्ज करने पर आमादा हो गये। जब जीना जी को पता चला कि छात्र-युवाओं पर पुलिस बल प्रयोग करना चाहती है तो उन्होंने प्रशासन के आगे खड़े होकर चेतावनी दी कि अगर तुमने बच्चों पर हाथ भी लगाया तो तुम्हारी खैर नहीं।’ ऐसे मनीषी को विनम्र श्रद्धांजलि।





