किसी शोध छात्र के लिए ढूंढ तो कुछ और रहा था, लेकिन कुछ ऐसे पत्र मिले जो आंदोलनकारियों के बीच होने वाले गहरे संवाद और एक-दूसरे के प्रति सम्मान को बताते हैं। मैंने 1994 में पत्रकारिता के साथ कंप्यूटर का अपना काम खोला ही था कि आंदोलन शुरू हो गया। मैं मुरादाबाद और पहाड़ दोनों जगह बराबर आंदोलन में सक्रिय हुआ। इंद्रमणि बडोनी, बिपिन त्रिपाठी, काशी सिंह ऐरी, त्रिवेंद्र पंवार, नारायण सिंह जंतवाल, पूरन डंगवाल जैसे नेताओं के साथ मेरे बहुत गहरे संबंध थे। मैं उन्हें जहां भी बुलाता वह आ जाते।
एक बार संयुक्त संघर्ष समिति ने 7 सितंबर, 1994 को जेल भरो आंदोलन की घोषणा की तो बिपिन दा और त्रिवेंद्र पंवार जी ने एक पोस्टर बनाने के लिए कहा। तब कंप्यूटर में आज की तरह डिजाइन नहीं मिल पाते थे। मैंने एक डिजाइनर असरफ से पोस्टर का स्कैच हाथ से बनवाया। 5000 पोस्टर छापे। इनमें आधे ऋषिकेश और आधे हल्द्वानी भेजे गये। तब त्रिवेंद्र पंवार ने पोस्टर मिलने पर धन्यवाद का यह पत्र मुझे भेजा था। हमारे क्षेत्र के पुराने आंदोलनकारी बचे सिंह बिष्ट ‘बचदा’ का पत्र भी मिला। रामपुर में पुलिस उपाधीक्षक रहे जोशी जी ने भी सहयोग करने के लिए पत्र भेजा।
मैंने पिछले दिनों उक्रांद के एक बड़े नेता जो कभी हमारे आदर्श होते थे उनको उनके स्वास्थ्य और आज की राजनीतिक हालात पर बात करने के लिए फोन किया। उन महोदय ने जिस उपेक्षा से यह कहकर फोन रख दिया कि कभी मिलते हैं। इसलिए मुझे आज त्रिवेंद्र पंवार याद आ गये, जो उम्र, अनुभव और संघर्षों में हमसे बहुत आगे होने के बावजूद न केवल हमेशा संपर्क बनाए रखते थे, बल्कि अगर उन्हें पता चले कि मैं देहरादून या ऋषिकेश के आसपास हूं तो कई बार खुद मिलने आ गये। बिपिन दा तो विधायक बनने के बाद भी जब दिल्ली आते थे मेरे ही साथ रहना चाहते थे, लेकिन मेरे पास एक ही कमरा था, बच्चे छोटे थे, इसलिए वह दिन में आते थे और रहने किसी और जगह जाते थे। मेरे पास आज भी अपना मकान तो नहीं है, लेकिन हमारे साथियों के पास बहुत सारे साधन हैं, उन्होंने अपने ‘अड्डे’ भी बना लिए हैं। अब बिपिन दा की तरह मेरी मोटरसाइकिल में तीन सवारी में बैठने वाले नेता भी नहीं हैं। अब तो महंगी कारों की खुली छतों से फूल-मालाओं से लदे लोग नीचे कहां देख पाते हैं। इसी बहाने अपने दिवंगत अग्रजों को याद कर उनसे बात कर लेते हैं, जीवित तो फोन भी नहीं उठाते।





