संघर्ष वाहिनी बागेश्वर अपनी पूर्व घोषणा के अनुसार बागेश्वर जिला मुख्यालय में धरने पर बैठी

संघर्ष वाहिनी बागेश्वर अपनी पूर्व घोषणा के अनुसार आज बागेश्वर जिला मुख्यालय में धरने पर बैठ गई है। जिस समय संघर्ष वाहिनी धरने पर बैठी थी तब उनका मांग पत्र 13 बिंदुओं का था लेकिन जब प्रशासन के लोग आंदोलन के समक्ष आए और कहा कि आप यहां आंदोलन नहीं कर सकते हैं ऐसा विधान 2024 में बन चुका है और एक कागज जो स्पष्ट नहीं है आंदोलन कार्यों को सोंपा गया तब आंदोलनकारियों ने 14वीं मांग यह बना ली कि जब तक सार्वजनिक सहमति से आंदोलन स्थल चिन्हित नहीं होता है तब तक आंदोलन स्थल चिन्हीकरण को लेकर 20024 में जारी किए गए फरमान को वापस लिया जाए।

फिलहाल संघर्ष वाहिनी 14 सूत्रीय मांग पत्र को लेकर बागेश्वर के जिला अधिकारी कार्यालय पर अनिश्चित कालीन धरने पर बैठी गई है। संघर्ष वाहिनी ने इस धरने को शुरू करने से पहले विभिन्न माध्यमों से जिला प्रशासन और सरकार को जो ज्ञापन भेजा था, उस ज्ञापन में जो मांगें उठाई गईं थी वे शासन की उदासीनता और प्रशासनिक फेलियर की ओर इशारा करती हैं ।

आन्दोलन कहता है कि विकास के नाम पर जो योजनाएं पास हुई हैं उन योजनाओं को पूरा करें । संघर्ष वाहिनी बताती कि महनर बूंगा बाईपास की सड़क तो काट दी गई है लेकिन नालियों का निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ है तथा सड़क में डामरीकरण किया जाना जानबूझकर छोड़ दिया गया है। जब कोई भी सड़क स्वीकृत होती है तो उसमें डामरीकरण तक की स्वीकृति मिलती है। अगर महिनर बूंगा वाली सड़क मैं डामरी कारण की मांग की जा रही है का मतलब प्रशासन पर सीधे-सीधे आरोप है कि उसने अधूरा काम छोड़ा है।

इसी प्रकार बागेश्वर जनपद के मल्लादनपुर में फुलवारी गांव के लोग एक महीने से धरने पर बैठे हुए हैं उनकी मांग है कि 30 वर्ष से गांव के लोग अपने गांव के फुलवारी खाईधार तोकों को मोटर सड़क से जोड़ने की मांग उठाए हुए हैं लेकिन उनकी मांग को सुनने की जगह उनके साथ छल किया जा रहा है। संघर्ष वाहिनी ने कहा है कि फुलवारी को सड़क से वंचित रखने के लिए जितना भी छल किया गया है वह बहुत हो गया है अब फुलवारी के लिए 8 किलोमीटर की छोटी सी सड़क स्वीकृत कर दी जाए।

संघर्ष वाहिनी ने अपने घोषणा पत्र में मांग की है कि विगत महीनों में बागेश्वर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महेंद्र सिंह करायत के नाम पर जो सड़क है उसका विस्तार कनगाड़छीना तक किए जाने की मांग क्षेत्र में उठी थी, उस आंदोलन को खत्म करने के लिए उस मांग पर सहमति भी शासन प्रशासन की ओर से दी गई थी लेकिन अभी तक उस मोटर मार्ग के विस्तार पर तेज गति से कार्रवाई शुरू नहीं की गई है। जनता को दिए गए आश्वासन के अनुसार इस मोटर मार्ग के विस्तार की स्वीकृति की गतिविधि को तेज किया जाए।

संघर्ष वाहिनी ने अपने घोषणा पत्र में बागेश्वर की लाइफ लाइन माने जाने वाले गोमती और सरयू नदी के कमजोर पड़ गए पुलों का नये सिरे से निर्माण किये जाने की मांग भी उठाई है।

संघर्ष वाहिनी ने अपने मांग पत्र में बागेश्वर चिकित्सालय से संबंधित दो बिंदु भी उठाए हैं पहले बिंदु में संघर्ष वाहिनी मांग करती है कि जिन चिकित्सकों का तबादला विगत महीनों में किया गया था उन चिकित्सकों के स्थान पर नए प्रतिस्थानी भेजे जाएं या नए चिकित्सकों की नियुक्ति की जाए। चिकित्सालय से संबंधित दूसरी मांग में संघर्ष वाहिनी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि लाखों लाख रूपयों की कीमत से चिकित्सालय में नए वार्ड बनाए गए थे लेकिन वार्डों में ताले लटके हुए हैं । वाहिनी का मानना है कि जब वर्ड बन चुके हैं तो इन वार्डों को सीएमएस को हस्तांतरित किए जाए ताकि उन वार्डों में भी मरीज रखे जा सकें।

संघर्षवाहिनी ने अपने मांग पत्र में कठायत बड़ा गांव में नए निर्माणों की वजह से बनी उस समस्या को भी उठाया है जिस समस्या के रहते हुए बरसातों में घरों के अंदर पानी भर जाता है या फिर वृहद रूप से पानी का भराव बन जाता है।

संघर्ष वाहिनी के मांग पत्र में सबसे महत्वपूर्ण जो मांग है और जिस मांग के साथ पूरे जनपद के लोग जुड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं वह है बाघ भालू बंदरों के आतंक से बागेश्वर नगर के लोगों को मुक्ति दिलाने की मांग। संघर्ष वाहिनी का मानना है कि उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे बाघ भालू और बंदरों की संख्या को लेकर सरकार हाथ पैर हाथ धरे बैठी है, ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार बाघ भालू और बंदरों की बढ़ती हुई संख्या से खुश है और चाहती है कि इस बड़ी हुई संख्या सू डर कर ही सही लेकिन लोग पहाड़ छोड़कर चले जाएं। ऐसे रंगीन आरोप के साथ संघर्ष वाहिनी ने कहा है कि यदि सरकार बाघ भालू बंदरों से अपनी जनता को निजात नहीं दिलवा सकती है तो संघर्ष वाहिनी इस मुद्दे को राजनीतिक मुद्दा बनाएगी और वह विधानसभा चुनाव में लोगों से आह्वान करेगी कि जब तक बाघभालू बंदरों की समस्या है तब तक लोग वोट का बहिष्कार करें।

संघर्ष वाहिनी ने जो भी मांग पत्र तैयार किया है उस मांग पत्र का अध्ययन करने के बाद यही आभास होता है कि शासन प्रशासन अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रहा है वह सिर्फ सत्ताधारी दल के राजनीतिक हित के लिए सरकार द्वारा निर्देशित निर्देशों के पालन से बाहर नहीं निकलना चाहता है। वरना जो भी बिंदु मांग पत्र में हैं उन बिंदुओं में बाघ भालू बंदरों के बिंदु को छोड़ कर अन्य सभी बिंदु जिला स्तर के हैं जिन्हें हल किया जाना कठिन नहीं है।

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